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अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस पर विशेषः माता-पिता की खुशियों के लिए बेटियां सह लेतीं हैं सारे गम

Sun, 26 Sep 2021 12:48 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 26 Sep 2021 12:48 AM IST
सार

किसी ने नाम किया रोशन तो किसी ने परिवार के लिए खुशियां कर दी न्योछावर
 

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Special on International Daughter Day: For the happiness of parents, daughters bear all the sorrows
प्रतीकात्मक । - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
लखीमपुर खीरी। हाथों की लकीर बेटियां...उम्मीद की किरण बेटियां......मां-पिता की आन और शान बेटियां। इस तरह के अनगिनत शब्द और उपमाएं बेटियों के लिए यू हीं नहीं रचे गए हैं। वह माता पिता की मल्लिका हैं, दिल का टुकड़ा हैं। घर की दहलीज पार नहीं करती हैं, उनकी खुशियों के लिए हर गम सह लेती हैं।

इन्हें लक्ष्मी का वरदान और सरस्वती का मान ऐसे ही नहीं कहते। ज्ञान, विज्ञान एवं सेना से लेकर हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान के साथ-साथ वह अपने बाबा और बाबुल के साथ उस मोड़ पर आकर खड़ी हो जाती हैं, जब बेटे भी अक्सर मुंह मोड़ लेते हैं। डॉटर्स डे पर अमर उजाला जिले की ऐसी ही कुछ बेटियो ंसे आपको रूबरु करवा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस पर विशेषः माता-पिता की खुशियों के लिए बेटियां सह लेतीं हैं सारे गम

Special on International Daughter Day: For the happiness of parents, daughters bear all the sorrows
क्षमा टंडन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

माता-पिता की ताजिंदगी सेवा के लिए खुद को कर दिया न्योछावर

मिश्राना निवासी आर्यकन्या इंटर कॉलेज की शिक्षिका क्षमा टंडन ने परिवार की पालनहार बनकर एक मिसाल पेश की है। क्षमा टंडन चार बहनों में सबसे छोटी हैं। इनसे छोटा एक मानसिक रूप से बीमार भाई है। बहनों की शादी होने के बाद माता पिता एवं मानसिक रूप से बीमार भाई की देखकर और उसका पालन पोषण करने के लिए क्षमा टंडन ने अविवाहित रहने का फैसला किया। वह बताती हैं कि इस बात की चिंता की थी कि भाई मानसिक बीमार है। उसे खुद देखरेख की जरूरत है। वृद्घावस्था में माता-पिता की देखभाल कैसे होगी। इसलिये माता पिता की सेवा और भाई की मानसिक मंदित भाई की देखभाल के लिये अविवाहित रहकर परिवार की जिम्मेदारी उठाने का फैसला लिया।

अंतरराष्ट्रीय बेटी दिवस पर विशेषः माता-पिता की खुशियों के लिए बेटियां सह लेतीं हैं सारे गम

Special on International Daughter Day: For the happiness of parents, daughters bear all the sorrows
त्रिकोलिया गांव की जूही मिश्रा अपनी माता के साथ। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

कनाडा में नौकरी पाकर जूही ने पूरी की मां की हसरत

पलिया तहसील के त्रिकोलिया गांव निवासी जूही मिश्रा ने कनाडा के स्वास्थ्य मंत्रालय में पीएसडब्ल्यू के पद पर नौकरी पाकर गांव का ही नहीं जिले का नाम रोशन करते हुए अपनी मां की हसरत पूरी की है। जूही ने बताया कि पिता की मौत के बाद मां कृष्णा मिश्रा ने हर कदम पर साथ दिया। मां की हसरत पिता का नाम रोशन करने की थी। इसलिए दिनरात मेहनत कर पढ़ाई जारी रखी। मां के आशीर्वाद से आज कनाडा में नौकरी मिली है। जूही अपनी सफलता का श्रेय का मां को देती हैं। मां कृष्णा बताती हैं कि बेटी ने गांव, तहसील ही नहीं, बल्कि जिले का नाम रोशन किया है। जूही मिश्रा पूर्व विधायक स्वर्गीय निरवेंद्र कुमार मिश्रा मुन्ना की भतीजी है।
 
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सिमरन गुप्ता - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

पिता के सपनों को पूरा करने में जुटीं सिमरन

धौरहरा की रहने वाली 21 साल की सिमरन गुप्ता अपने पिता के सपनों को पूरा करने में जुटी हैं। सिमरन का नाम तब चर्चा में आया जब इसी साल उन्हें मिशन शक्ति के तहत एक दिन के लिए कोतवाल बनाया गया था। पीजी की छात्रा सिमरन ने वाईडी कॉलेज से लौटते वक्त पिछले साल लखीमपुर में पीछा करने वाले शोहदों को पकड़कर पिटाई कर पुलिस को सौंप दिया था, जिसके बाद वह पुलिस ने मिशन शक्ति के तहत इसी साल उन्हें एक दिन का कोतवाल बनाया था। सिमरन बताती हैं, कि उनके पिता का निधन हो चुका है। परिवार में मां और दो भाई हैं। पिता चाहते थे कि बेटी पुलिस में जाए, इसलिये वह एक निजी स्कूल में टीचिंग के साथ-साथ अपनी तैयारी भी कर रही हैं। अक्टूबर में उनका एसआई का पेपर है। उन्होंने बताया कि वह कोतवाली की महिला सुरक्षा समिति की सदस्य हैं और मिशन शक्ति के तहत महिलाओं और बच्चियों को महिला एवं बाल अपराध के प्रति जागरूक कर रही हैं। इसके अलावा उन्होंने कोरोना काल में टीम केसरी के साथ मिलकर लोगों के लिये मास्क बनाए और स्कूली बच्चों के लिये आर्ट किट बनाने में मदद की।
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राजकुमारी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

बेटियों ने ठाना माता-पिता का ऊंचा करेंगे मान

पलिया तहसील अंतर्गत थारू क्षेत्र के पोया गांव निवासी राजकुमारी पुत्री रामनारायण ने इस साल यूपी जेईई पॉलिटेक्निक परीक्षा पास की है। वह अपने पिता के सपनों को पूरा कर उनका मान बढ़ाने में जुटी हैं। बताती हैं कि गांव से स्कूल करीब दस किलोमीटर दूर है, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका कहना है कि वह इंजीनियर बन अपने परिवार को समाज की मुख्यधारा में लाना चाहती हैं। उनकी सरकार से मांग है कि थारू गांवों के नजदीक इंटर कॉलेज व डिग्री कॉलेज हो सकें तो थारु लड़कियां भी नाम कमा सकती हैं।
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