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 सहायक नदियों का वजूद खतरे में, बड़ी नदियों से तबाही

Thu, 08 Jun 2017 11:44 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी। 
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।  Updated Thu, 08 Jun 2017 11:44 PM IST
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Due to the existence of tributaries, havoc with large rivers
नदियां - फोटो : अमर उजाला
सिल्ट जमा होने से नदियों की घट रही धारक क्षमता
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जिले की शारदा और घाघरा जैसी बड़ी नदियां जिले में तबाही ला रही है तो इनकी सहायक और छोटी नदियां अपना वजूद खोती जा रही हैं। बाढ़ के साथ आने वाली सिल्ट बड़ी और छोटी नदियों में जमा होने से वे उथली हो रही हैं। पहले बरसात में जब बड़ी नदियां उफनाती थीं तो उनका पानी सहायक नदियों में आने से बाढ़ से ज्यादा तबाही नहीं होती थी। छोटी और सहायक नदियों का वजूद खत्म होने से पिछले तीस चालीस वर्षों में बाढ़ का प्रकोप ज्यादा बढ़ा है। 
खीरी जिले में शारदा, घाघरा, कौडिय़ाला, उल्ल, सरायन, चौका, कठिना, गोमती, मोहाना और सुहेली नदियां हैं। सुहेली नदी दुधवा नेशनल पार्क की लाइफलाइन कही जाती हैं तो कठिना नदी आंवला जंगल की लाइफ लाइन है। सुहेली में इतनी सिल्ट जमा हो चुकी है कि गर्मी शुरू होने से पहले ही सूख जाती है। बरसात में उफनाने पर इसका पानी दुधवा पार्क में फैल कर वन संपदा को नुकसान पहुंचाता है। सरायन नदी का उद्गम गोला के निकट अहमदनगर से है लेकिन सरायन नदी ही नहीं इसका उद्गम तक सूख गया है। मोहाना नदी भारत और नेपाल की सीमा बनाती है। कर्णाली नदी नेपाल से पानी लाकर सीमा क्षेत्र के कई गांवों को तबाह मचाती है। 
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जिले का अभिशाप बन चुकी शारदा नदी
जिले की दो प्रमुख शारदा और घाघरा नदियां जिले को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। शारदा नदी उत्तराखंड के चंपावत से निकलकर पीलीभीत होते हुए खीरी जिले में संपूर्णानगर से प्रवेश करती है। यह नदी पलिया, निघासन, लखीमपुर की सीमा से निकलकर हुए धौरहरा तहसील होते हुए सीतापुर जिले में मल्लापुर में घाघरा नदी से मिल जाती है। जिले में शारदा की लंबाई संपूर्णानगर से लेकर सीतापुर की सीमा तक करीब 125 किलोमीटर है। बनबसा डैम से पानी छोड़े जाने पर शारदा नदी जिले में बाढ़ की भारी तबाही मचाती है। 
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घाघरा जिले के उत्तरी क्षेत्र में मचाती है तबाही
घाघरा नदी बहराइच जिले के गिरिजा बैराज से नेपाल होकर खीरी जिले में प्रवेश करती है। यह निघासन और धौरहरा तहसील में बाढ़ का कारण बनती है। जिले में इसकी लंबाई करीब 88 किलोमीटर है। यह नदी घाघरा के अलावा सरयू के नाम से भी जानी जाती है। इसमें कर्णाली और कौड़ियाला आदि नदियों का पानी मिलने से हर साल सिल्ट जमा हो रही है। उथली होने के कारण बरसात के मौसम में इसका पानी दूर तक फैलता है। 
 
नदियों में जहर घोल रहा औद्योगिक कचरा
जिले की अधिकांश नदियों में औद्योगिक कचरा पड़ने से इन नदियों का पानी जहरीला होता जा रहा है। शहर से सटकर बहने वाली उल्ल नदी में शहर के नालों का पानी उड़ेला जा रहा है। इसके साथ ही एक चीनी मिल का कचरा भी इसी नदी में आ रहा है। इससे इसका पानी इतना जहरीला हो गया है कि जलीय जीव तक मर चुके है। पानी पीने से कई मवेशियों की मौत हो चुकी है। 

 
बाढ़ खत्म होने पर बहुत सारी सिल्ट नदियों में रह जाती है। इससे नदियां उथली हो रही हैं। नदियों की सिल्ट सफाई का कोई प्रावधान नहीं है। इसके लिए कभी कोई बजट भी नहीं आता। यह अनुमान भी लगाना मुश्किल है कि नदियों की धारक क्षमता में कितनी कमी आई है। 
विनोद कुमार, अधिशासी अभियंता
बाढ़ खंड, शारदानगर, लखीमपुर खीरी। 
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