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बच्चों पर गहराया कुपोषण का साया
Lakhimpur
Updated Sat, 23 Feb 2013 05:30 AM IST
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पोषाहार और हाटकुक्ड योजनाएं नहीं दिखा पाईं असर
लखीमपुर खीरी। बच्चों का कुपोषण भले ही दूर न हो, लेकिन अफसरों की ‘चांदी’ है। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग द्वारा संचालित पोषाहार और हाटकुक्ड योजनाएं कारगर होने के बजाय कारीगरी का शिकार हो गई हैं। इसके चलते जीरो से छह साल तक के बच्चों में कुपोषण की दर कम नहीं हो पाई। बल्कि इजाफा हो रहा है। बानगी यह है कि दिसंबर में कुपोषित बच्चों की संख्या 274 थी जो जनवरी में 282 तक पहुंच गई।
जिले में 3503 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। जिनमें 2,62,772 बच्चे पंजीकृत हैं। केंद्रों के माध्यम से जीरो से छह वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती महिलाओं को पोषाहार और केंद्र पर बच्चों को हाटकुक्ड दिए जाने का प्रावधान है, ताकि बच्चों में कुपोषण की समस्या न आए। इसके लिए पोषाहार के तौर पर एमाइलेज और वीनिंग फूड वितरित करने के लिए ब्लाक स्थित क्षेत्रीय परियोजना कार्यालय को मिलता है। वहीं केंद्र पर आने वाले बच्चों को मिड डे मील की तर्ज पर हाटकुक्ड दिया जाता है। जिसके लिए प्रतिमाह 1.17 करोड़ रुपये का बजट सभी आंगनबाड़ी केेंद्रों में बांटा जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि पंजीकृत बच्चों के मुकाबले केंद्रों पर बच्चों की उपस्थिति काफी कम है। वहीं पोषाहार बच्चों के बजाय कालाबाजारी के जरिए पशुओं का निवाला बन रहा है। इन मामलों का कई बार खुलासा भी हो चुका है, लेकिन ब्लाक स्तरीय कुछ परियोजना अधिकारियों की शह पर यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है। नतीजतन बच्चों में कुपोषण की दर घटने की बजाय बढ़ रही है।
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कुपोषित बच्चों की तादाद बढ़ी
दिसंबर माह में जिले के सभी ब्लाकों में कुपोषित बच्चों की संख्या 274 थी। अब जनवरी में बढ़कर 282 तक पहुंच गई। यह आंकड़े ब्लाक स्तरीय बाल विकास परियोजना कार्यालयों से एकत्र किए गए हैं।
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जनवरी माह में ब्लाक वार कुपोषित बच्चे
बिजुआ ब्लाक में 17, लखीमपुर में 14, बेहजम में पांच, ईसानगर में 33, फूलबेहड़ में 29, पसगवां में नौ, धौरहरा में 21, पलिया में 24, कुंभी में 30, निघासन में 22, बांकेगंज में 12, नकहा में सात, मोहम्मदी में 32, मितौली में छह, रमियाबेहड़ में 13 और लखीमपुर शहर में आठ बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। यह आंकड़े 2,64,032 बच्चों का परीक्षण करने के उपरांत जुटाए गए हैं।
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बच्चों में कुपोषण की समस्या कुछ ब्लाकों में ज्यादा है, जिसके संबंध में आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। हालांकि पिछले सालों की अपेक्षा ऐसे बच्चों की संख्या काफी कम हुई है।
-आशा पुरी, जिला कार्यक्रम अधिकारी
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लखीमपुर खीरी। बच्चों का कुपोषण भले ही दूर न हो, लेकिन अफसरों की ‘चांदी’ है। बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग द्वारा संचालित पोषाहार और हाटकुक्ड योजनाएं कारगर होने के बजाय कारीगरी का शिकार हो गई हैं। इसके चलते जीरो से छह साल तक के बच्चों में कुपोषण की दर कम नहीं हो पाई। बल्कि इजाफा हो रहा है। बानगी यह है कि दिसंबर में कुपोषित बच्चों की संख्या 274 थी जो जनवरी में 282 तक पहुंच गई।
जिले में 3503 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं। जिनमें 2,62,772 बच्चे पंजीकृत हैं। केंद्रों के माध्यम से जीरो से छह वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती महिलाओं को पोषाहार और केंद्र पर बच्चों को हाटकुक्ड दिए जाने का प्रावधान है, ताकि बच्चों में कुपोषण की समस्या न आए। इसके लिए पोषाहार के तौर पर एमाइलेज और वीनिंग फूड वितरित करने के लिए ब्लाक स्थित क्षेत्रीय परियोजना कार्यालय को मिलता है। वहीं केंद्र पर आने वाले बच्चों को मिड डे मील की तर्ज पर हाटकुक्ड दिया जाता है। जिसके लिए प्रतिमाह 1.17 करोड़ रुपये का बजट सभी आंगनबाड़ी केेंद्रों में बांटा जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि पंजीकृत बच्चों के मुकाबले केंद्रों पर बच्चों की उपस्थिति काफी कम है। वहीं पोषाहार बच्चों के बजाय कालाबाजारी के जरिए पशुओं का निवाला बन रहा है। इन मामलों का कई बार खुलासा भी हो चुका है, लेकिन ब्लाक स्तरीय कुछ परियोजना अधिकारियों की शह पर यह खेल धड़ल्ले से चल रहा है। नतीजतन बच्चों में कुपोषण की दर घटने की बजाय बढ़ रही है।
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कुपोषित बच्चों की तादाद बढ़ी
दिसंबर माह में जिले के सभी ब्लाकों में कुपोषित बच्चों की संख्या 274 थी। अब जनवरी में बढ़कर 282 तक पहुंच गई। यह आंकड़े ब्लाक स्तरीय बाल विकास परियोजना कार्यालयों से एकत्र किए गए हैं।
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जनवरी माह में ब्लाक वार कुपोषित बच्चे
बिजुआ ब्लाक में 17, लखीमपुर में 14, बेहजम में पांच, ईसानगर में 33, फूलबेहड़ में 29, पसगवां में नौ, धौरहरा में 21, पलिया में 24, कुंभी में 30, निघासन में 22, बांकेगंज में 12, नकहा में सात, मोहम्मदी में 32, मितौली में छह, रमियाबेहड़ में 13 और लखीमपुर शहर में आठ बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। यह आंकड़े 2,64,032 बच्चों का परीक्षण करने के उपरांत जुटाए गए हैं।
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बच्चों में कुपोषण की समस्या कुछ ब्लाकों में ज्यादा है, जिसके संबंध में आवश्यक निर्देश दिए जाते हैं। हालांकि पिछले सालों की अपेक्षा ऐसे बच्चों की संख्या काफी कम हुई है।
-आशा पुरी, जिला कार्यक्रम अधिकारी