फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lakhimpur Kheri News ›   महाभारत काल से जुड़ा है मढिय़ाघाट का शिव मंदिर

महाभारत काल से जुड़ा है मढिय़ाघाट का शिव मंदिर

Sun, 29 Jul 2018 05:48 PM IST
Updated Sun, 29 Jul 2018 05:48 PM IST
विज्ञापन
महाभारत काल से जुड़ा है मढिय़ाघाट का शिव मंदिर

विज्ञापन

मंदिर खुलने पर पूजित मिलता है दिव्य शिवलिंग
महाभारत काल से जुड़ा है मढ़िया घाट का शिव मंदिर
ऋषि पारासर की तपोस्थली रहा है मढ़ियाघाट का आश्रम

अमर उजाला ब्यूरो
मैगलगंज। मढ़ियाघाट स्थित महाभारत कालीन प्राचीन पारसनाथ शिव मंदिर में अश्वत्थामा पूजा करने आते हैं। ऐसी यहां के लोगों की मान्यता है। लोग बताते हैं कि रात में मंदिर के कपाट बंद होने के बाद सुबह जब खोले जाते हैं तब जल, दूध, चंदन, अक्षत, बेलपत्र, फूल आदि से शिवलिंग पूजित मिलता है लेकिन आज तक किसी ने भी रात में पूजा होते नहीं देखी। सावन में यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। दूरदराज से लोग यहां कांवड़ लेकर जलाभिषेक के लिए आते हैं।
उत्तरवाहिनी गोमती नदी के तट पर मढ़ियाघाट स्थित पारसनाथ शिव मंदिर के बारे में बताया जाता है कि औरंगजेब की सेना ने जब इस मंदिर पर आक्रमण किया तो मंदिर से निकले सांप बिच्छुओं ने भी उनपर हमला कर दिया। इससे मुगल सेना को भागना पड़ा। खंडित प्रतिमाएं आज भी मंदिर के बाहर बरामदे में रखी हुई हैं। यह स्थान ऋषि पारासर की तपोस्थली माना जाता है। मंदिर की विशेषता यह भी है कि यहां पांच शिवलिंग एक ही अरघे में स्थापित हैं।
विज्ञापन

इस स्थान पर मढ़ियाघाट आश्रम, संस्कृत महाविद्यालय, गौशाला, भगवान परशुराम का मंदिर समेत छोटे बड़े दर्जनों मंदिर हैं। शिव मंदिर के बाद जंगल में सिद्धबाबा का स्थान है, वहां जिसने जो भी मनौती मांगी वह पूरी हुई। ऐसा श्रद्धालुओं में मान्यता है। इस स्थान का महत्व इसलिए ज्यादा है कि भारतवर्ष में पूरब की दिशा से आकर कोई नदी का बहाव उत्तर दिशा में नहीं है लेकिन यहां गोमती नदी का बहाव पूरब से आकर उत्तर की दिशा में है। इसलिए इसका नाम उत्तरवाहिनी गोमती नदी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

वैसे तो हर सोमवार और प्रत्येक माह की अमावस को यहां मेला लगता है। यहां के पुजारी बताते हैं कि मंदिर के पट बंद होने के बाद सुबह जब खोला जाता है तो शिवलिंग की पूजा हुई मिलती है। ऐसा माना जाता है कि आज भी अश्वत्थामा यहां आकर पूजा करते हैं। मंदिर के आस-पास बनी इमारतों में 1918 की ईटें लगी हैं। इससे यह अंदाजा लगाया जाता है मंदिर का जीर्णोद्धार 100 साल पहले कराया गया। इसका इतिहास महाभारत काल का है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed