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तेरह दिन की जंग में ही दो टुकड़े हो गया था पाकिस्तान
Sun, 16 Dec 2018 11:56 PM IST
राकेश पांडेय
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो
Published by: राकेश पांडेय
Updated Sun, 16 Dec 2018 11:56 PM IST
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पूर्व सैनिक सेवा परिषद की ओर से पडरौना नगर में निकाली गई विजय रैली।
- फोटो : अमर उजाला
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पडरौना। 1971 का भारत-पाक युद्ध दुनिया के सैन्य इतिहास का सबसे छोटा युद्ध था। मात्र 13 दिन में ही भारतीय सेना के पराक्रम और शौर्य के आगे पाकिस्तान की फौज ने हथियार डाल दिए थे। फलस्वरूप दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश नाम का नया देश वजूद में आया था। 91 हजार पाकिस्तानी सैनिक बंदी बना लिए गए थे। इस युद्ध में जीत के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले विजय दिवस पर पडरौना शहर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल पूर्व सैनिकों ने ‘अमर उजाला’ अपनी यादें साझा कीं।
वर्ष 1971 की जंग के गवाह और कसया क्षेत्र के करमैनी प्रेमवलिया निवासी नायक जगरनाथ प्रसाद ने बताया कि बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान ने भारी नुकसान उठाया था। पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया था, एक पूर्वी और दूसरा पश्चिमी। पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में जाना जाता है।
उसे भारत ने 1971 की लड़ाई में आजाद कराया था। बांग्लादेश 16 दिसंबर को अपना ‘विक्ट्री डे’ मनाता है। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध बांग्लादेश लिबरेशन वार के रूप में शुरू हुआ था। जगरनाथ को भारतीय सेना की तरफ से संग्राम मेडल, 9 एवं 25 साल की दीर्घकालिक सेवा, पश्चिमी स्टार सहित विभिन्न पदकों से सम्मानित किया था।
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कुड़वा उर्फ दिलीपनगर के रहने वाले नायक इंद्रजीत सिंह ने बताया कि 1971 की जंग में भारत की सेना ने बांग्लादेशियों का साथ दिया, जिससे 1965 के बाद भारत-पाकिस्तान की सेनाएं एक बार फिर आमने सामने आ खड़ी हुई थीं। आखिरकार पाकिस्तान की शर्मनाक हार हुई और 16 दिसंबर 1971 को ढाका में 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इंद्रजीत ने बताया कि उन्हें 1989 में भारत-श्रीलंका युद्ध में भी सम्मिलित होने का गौरव हासिल हुआ था।
सीने पर रक्षा मेडल, 9 साल की दीर्घ सेवा, रक्षा मंत्रालय से प्रदत्त मेडल और समर सेवा स्टार लगाए विजय दिवस में पहुंचे कुबेरस्थान के निवासी और भारतीय थल सेना में सूबेदार रहे सुरेश पांडेय ने बताया कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की लोगों की यादों में वह जगह नहीं है, जो शायद 1962 के भारत-चीन युद्ध या 1971 में बांग्लादेश को मुक्त कराने के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच हुई थी।
कारण शायद यह है कि इस लड़ाई से न तो हार की शर्मसारी जुड़ी है और न ही निर्णायक जीत का उन्माद। वह बताते हैं कि देश भर में 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस युद्ध में तिरंगे की आन के लिए करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद और 9,851 घायल हो गए थे, फिर भी जंग में जीत भारतीय सेना की हुई थी।
प्राण छपरा के निवासी और भारतीय थल सेना में नायब सूबेदार रहे गेंदा प्रसाद ने 1971 की जंग में पाकिस्तान को ऐसी करारी हार मिली थी कि उसके बाद उसने कभी भारत का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटाई। उस समय वह पूर्वी पाकिस्तान के मामन क्षेत्र में तैनात थे। इस जंग में उनकी बहादुरी को देखते हुए भारत सरकार ने वरिष्ठ सेवा मेडल, लांग सर्विस, रक्षा मेडल और इंडियन मेडल से सम्मानित किया था।
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वर्ष 1971 की जंग के गवाह और कसया क्षेत्र के करमैनी प्रेमवलिया निवासी नायक जगरनाथ प्रसाद ने बताया कि बंटवारे के बाद भारत और पाकिस्तान ने भारी नुकसान उठाया था। पाकिस्तान दो हिस्सों में बंट गया था, एक पूर्वी और दूसरा पश्चिमी। पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में जाना जाता है।
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उसे भारत ने 1971 की लड़ाई में आजाद कराया था। बांग्लादेश 16 दिसंबर को अपना ‘विक्ट्री डे’ मनाता है। भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध बांग्लादेश लिबरेशन वार के रूप में शुरू हुआ था। जगरनाथ को भारतीय सेना की तरफ से संग्राम मेडल, 9 एवं 25 साल की दीर्घकालिक सेवा, पश्चिमी स्टार सहित विभिन्न पदकों से सम्मानित किया था।
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कुड़वा उर्फ दिलीपनगर के रहने वाले नायक इंद्रजीत सिंह ने बताया कि 1971 की जंग में भारत की सेना ने बांग्लादेशियों का साथ दिया, जिससे 1965 के बाद भारत-पाकिस्तान की सेनाएं एक बार फिर आमने सामने आ खड़ी हुई थीं। आखिरकार पाकिस्तान की शर्मनाक हार हुई और 16 दिसंबर 1971 को ढाका में 93000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इंद्रजीत ने बताया कि उन्हें 1989 में भारत-श्रीलंका युद्ध में भी सम्मिलित होने का गौरव हासिल हुआ था।
सीने पर रक्षा मेडल, 9 साल की दीर्घ सेवा, रक्षा मंत्रालय से प्रदत्त मेडल और समर सेवा स्टार लगाए विजय दिवस में पहुंचे कुबेरस्थान के निवासी और भारतीय थल सेना में सूबेदार रहे सुरेश पांडेय ने बताया कि 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की लोगों की यादों में वह जगह नहीं है, जो शायद 1962 के भारत-चीन युद्ध या 1971 में बांग्लादेश को मुक्त कराने के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच हुई थी।
कारण शायद यह है कि इस लड़ाई से न तो हार की शर्मसारी जुड़ी है और न ही निर्णायक जीत का उन्माद। वह बताते हैं कि देश भर में 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस युद्ध में तिरंगे की आन के लिए करीब 3,900 भारतीय सैनिक शहीद और 9,851 घायल हो गए थे, फिर भी जंग में जीत भारतीय सेना की हुई थी।
प्राण छपरा के निवासी और भारतीय थल सेना में नायब सूबेदार रहे गेंदा प्रसाद ने 1971 की जंग में पाकिस्तान को ऐसी करारी हार मिली थी कि उसके बाद उसने कभी भारत का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटाई। उस समय वह पूर्वी पाकिस्तान के मामन क्षेत्र में तैनात थे। इस जंग में उनकी बहादुरी को देखते हुए भारत सरकार ने वरिष्ठ सेवा मेडल, लांग सर्विस, रक्षा मेडल और इंडियन मेडल से सम्मानित किया था।