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Kushinagar News: नेपाल की तरह भारत में भी फ्लैश फ्लड का खतरा, अलर्ट सिस्टम जरूरी
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गोरखपुर। नेपाल में आई बाढ़ की तरह भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में भी फ्लैश फ्लड का खतरा बना हुआ है। पहाड़ों पर लगातार बढ़ रहा निर्माण, ढलानों की कटाई और जलवायु परिवर्तन इसके जोखिम को बढ़ा रहे हैं। ग्लेशियरों के पिघलने, भूस्खलन और नदी के प्रवाह में अचानक बदलाव से भी फ्लैश फ्लड की स्थिति पैदा हो सकती है।
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार, गया के रजिस्ट्रार प्रो. नरेंद्र कुमार राणा ने अमर उजाला से फोन पर हुई बातचीत में बताया कि नेपाल में आई फ्लैश फ्लड के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहाड़ों पर भूकंप के बाद मलबा नीचे आने से नदी का रास्ता अवरुद्ध हो सकता है। इससे अस्थायी झील बनती है और उसके अचानक फटने पर तेज बहाव के साथ बाढ़ आ सकती है। भूस्खलन भी ऐसी घटनाओं का प्रमुख कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके साथ ही पहाड़ों पर मानवीय हस्तक्षेप बढ़ रहा है। सड़क और अन्य निर्माण के लिए ढलानों को काटे जाने से उनकी स्थिरता प्रभावित होती है। भूकंप या अत्यधिक बारिश की स्थिति में ढलानों का मलबा नीचे आकर नदी का रास्ता रोक सकता है। वहीं, ग्लेशियर से बर्फ और मलबा नीचे आने पर भी अचानक पानी का बहाव बढ़ सकता है।
सेंसर और सैटेलाइट से निगरानी जरूरी
प्रो. राणा ने कहा कि ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए पहाड़ों पर सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना जरूरी है। सैटेलाइट इमेज की मदद से संवेदनशील क्षेत्रों में बदलाव और संभावित खतरे की निगरानी पहले से की जा सकती है। भारत में कुछ क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था मौजूद है लेकिन इसे और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा का उदाहरण देते हुए कहा कि बादल फटने जैसी घटनाएं भी कम समय में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी और समय रहते अलर्ट जारी करना जरूरी है।
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1998 की बाढ़ से सबक ले गोरखपुर
प्रो. राणा ने कहा कि वर्ष 1998 की बाढ़ में नदी ने जिन क्षेत्रों को प्रभावित किया था, उन्हें डेंजर जोन के तौर पर चिह्नित किया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों में बाद में हुए निर्माण से भविष्य में नुकसान का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि गोरखपुर में बड़े अंतराल पर बाढ़ की घटनाएं होती रही हैं। वर्ष 1974 के बाद 1998 में बड़ी बाढ़ आई थी। ऐसे में पुराने बाढ़ क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए निर्माण और आपदा प्रबंधन की योजना तैयार करने की जरूरत है।
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सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार, गया के रजिस्ट्रार प्रो. नरेंद्र कुमार राणा ने अमर उजाला से फोन पर हुई बातचीत में बताया कि नेपाल में आई फ्लैश फ्लड के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहाड़ों पर भूकंप के बाद मलबा नीचे आने से नदी का रास्ता अवरुद्ध हो सकता है। इससे अस्थायी झील बनती है और उसके अचानक फटने पर तेज बहाव के साथ बाढ़ आ सकती है। भूस्खलन भी ऐसी घटनाओं का प्रमुख कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके साथ ही पहाड़ों पर मानवीय हस्तक्षेप बढ़ रहा है। सड़क और अन्य निर्माण के लिए ढलानों को काटे जाने से उनकी स्थिरता प्रभावित होती है। भूकंप या अत्यधिक बारिश की स्थिति में ढलानों का मलबा नीचे आकर नदी का रास्ता रोक सकता है। वहीं, ग्लेशियर से बर्फ और मलबा नीचे आने पर भी अचानक पानी का बहाव बढ़ सकता है।
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सेंसर और सैटेलाइट से निगरानी जरूरी
प्रो. राणा ने कहा कि ऐसी घटनाओं से बचाव के लिए पहाड़ों पर सेंसर आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना जरूरी है। सैटेलाइट इमेज की मदद से संवेदनशील क्षेत्रों में बदलाव और संभावित खतरे की निगरानी पहले से की जा सकती है। भारत में कुछ क्षेत्रों में ऐसी व्यवस्था मौजूद है लेकिन इसे और मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा का उदाहरण देते हुए कहा कि बादल फटने जैसी घटनाएं भी कम समय में बड़े क्षेत्र को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी और समय रहते अलर्ट जारी करना जरूरी है।
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1998 की बाढ़ से सबक ले गोरखपुर
प्रो. राणा ने कहा कि वर्ष 1998 की बाढ़ में नदी ने जिन क्षेत्रों को प्रभावित किया था, उन्हें डेंजर जोन के तौर पर चिह्नित किया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों में बाद में हुए निर्माण से भविष्य में नुकसान का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि गोरखपुर में बड़े अंतराल पर बाढ़ की घटनाएं होती रही हैं। वर्ष 1974 के बाद 1998 में बड़ी बाढ़ आई थी। ऐसे में पुराने बाढ़ क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए निर्माण और आपदा प्रबंधन की योजना तैयार करने की जरूरत है।