{"_id":"5b67ee444f1c1b9e3e8b582c","slug":"scientists-find-out-why-the-newborn-children-brain-is-small","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"वैज्ञानिकों ने खोज निकाला, क्यों छोटा रह जाता है नवजात का दिमाग ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वैज्ञानिकों ने खोज निकाला, क्यों छोटा रह जाता है नवजात का दिमाग
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 07 Aug 2018 12:05 AM IST
सार
- आईआईटी और एनबीआरसी गुरुग्राम के वैज्ञानिकों ने मिलकर की जीका वायरस प्रोटीन पर रिसर्च
- नवजात बच्चों को माइक्रोसेफेली से बचाने के लिए करेंगे नई रिसर्च
विज्ञापन
डेमो पिक
दो साल की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने खोज निकाला कि जीका वायरस की कौन सी प्रोटीन से नवजात बच्चे माइक्रोसेफेली का शिकार होते हैं और उसके कारण उनका मस्तिष्क छोटा रह जाता है।
डेमो पिक
यह शोध नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर, गुरुग्राम के वैज्ञानिक पंकज सेठ और आईआईटी कानपुर की प्रो. जोनाकी ने मिलकर किया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जीका वायरस में ए, बी, सी, डी, ई प्रोटीन पाए जाते हैं। रिसर्च में मालूम चला है कि ई प्रोटीन के चलते नवजात को माइक्रोसेफेली होता है, जिससे उनके मस्तिष्क की कोशिकाएं वृद्घि नहीं कर पाती हैं और सामान्य से छोटी रह जाती हैं।
इसके अलावा मानसिक तौर पर वह अविकसित भी हो जाता है। आईआईटी कानपुर की लैब में गर्भवती चूहे पर इसका सफल परीक्षण भी किया जा चुका है। अब वैज्ञानिकों की टीम ने फैसला लिया है कि जीका वायरस के प्रोटीन ई का कोई तोड़ निकाला जाए ताकि नवजात बच्चों को माइक्रोसेफेली के प्रभाव से रोका जा सके।
इसके अलावा मानसिक तौर पर वह अविकसित भी हो जाता है। आईआईटी कानपुर की लैब में गर्भवती चूहे पर इसका सफल परीक्षण भी किया जा चुका है। अब वैज्ञानिकों की टीम ने फैसला लिया है कि जीका वायरस के प्रोटीन ई का कोई तोड़ निकाला जाए ताकि नवजात बच्चों को माइक्रोसेफेली के प्रभाव से रोका जा सके।
डेमो पिक
दो करोड़ से ज्यादा नवजात हैं प्रभावित
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में दो करोड़ से ज्यादा नवजात माइक्रोसेफेली का शिकार हैं। इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक यह मालूम नहीं चल पाया था कि आखिर यह बीमारी जीका वायरस के कौन से प्रोटीन से फैलती है। अब चूंकि कारण का पता लग गया है इसलिए इलाज व रोकथाम का रास्ता भी जल्द ही खोज लिया जाएगा।
1947 में हुई थी पहचान
जीका वायरस की पहचान पहली बार 1947 में हुई थी, जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। इसके बाद भारत, पाकिस्तान सहित एशिया के कई अन्य देशों में भी कुछ लोग इस वायरस के चपेट में आ गए थे।
वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में दो करोड़ से ज्यादा नवजात माइक्रोसेफेली का शिकार हैं। इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार अभी तक यह मालूम नहीं चल पाया था कि आखिर यह बीमारी जीका वायरस के कौन से प्रोटीन से फैलती है। अब चूंकि कारण का पता लग गया है इसलिए इलाज व रोकथाम का रास्ता भी जल्द ही खोज लिया जाएगा।
1947 में हुई थी पहचान
जीका वायरस की पहचान पहली बार 1947 में हुई थी, जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। इसके बाद भारत, पाकिस्तान सहित एशिया के कई अन्य देशों में भी कुछ लोग इस वायरस के चपेट में आ गए थे।
विज्ञापन
विज्ञापन
डेमो पिक
एडीज मच्छरों से ज्यादा फैलता है जीका वायरस
वैज्ञानिकों के अनुसार जीका वायरस एडीज, एजिप्टी सहित कुछ अन्य तरह के मच्छरों से फैलता है। इस तरह के मच्छर चिकनगुनिया और डेंगू भी फैलाते हैं। इसके शरीर में फैलने से इंसान को बुखार होता है, जोड़ों का दर्द शुरू हो जाता है, शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं, थकान महसूस होती है, सिर दर्द शुरू हो जाता है और आंखें भी लाल पड़ने लगती हैं।
माइक्रोसेफेली के साथ ग्यूलेन बैरे का भी खतरा
जीका वायरस के शरीर में प्रवेश करने से जहां एक तरफ माइक्रोसेफेली का खतरा रहता है वहीं दूसरी ओर ग्यूलेन बैरे का भी खतरा बढ़ जाता है। यह एक तरह का सिंड्रोम होता है जो शरीर के तंत्रिका पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- रोकथाम के उपाय...
वैज्ञानिकों के अनुसार जीका वायरस एडीज, एजिप्टी सहित कुछ अन्य तरह के मच्छरों से फैलता है। इस तरह के मच्छर चिकनगुनिया और डेंगू भी फैलाते हैं। इसके शरीर में फैलने से इंसान को बुखार होता है, जोड़ों का दर्द शुरू हो जाता है, शरीर पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं, थकान महसूस होती है, सिर दर्द शुरू हो जाता है और आंखें भी लाल पड़ने लगती हैं।
माइक्रोसेफेली के साथ ग्यूलेन बैरे का भी खतरा
जीका वायरस के शरीर में प्रवेश करने से जहां एक तरफ माइक्रोसेफेली का खतरा रहता है वहीं दूसरी ओर ग्यूलेन बैरे का भी खतरा बढ़ जाता है। यह एक तरह का सिंड्रोम होता है जो शरीर के तंत्रिका पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं।
आगे की स्लाइड में पढ़ें- रोकथाम के उपाय...
विज्ञापन
रोकथाम के उपाय
डेमो पिक
- डब्ल्यूएचओ के अनुसार चूंकि यह वायरस मच्छरों के काटने से फैलता है इसलिए जरूर है कि मच्छरों की रोकथाम का उपाय किया जाए।
- मच्छरों से बचने के लिए गर्भवती महिलाएं और आम लोग भी पूरे शरीर को ढककर रखें और हल्के रंग के कपड़े पहनें।
- मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए अपने घर के आसपास गमले, बाल्टी, कूलर आदि में भरा पानी निकाल दें।
- बुखार, गले में खराश, जोड़ों में दर्द, आंखें लाल होने जैसे लक्षण नजर आने पर तत्काल प्रभाव से डॉक्टर को दिखाएं।
- जीका वायरस का फिलहाल कोई टीका उपलब्ध नहीं है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि स्थिति में सुधार नहीं होने पर फौरन डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
- मच्छरों से बचने के लिए गर्भवती महिलाएं और आम लोग भी पूरे शरीर को ढककर रखें और हल्के रंग के कपड़े पहनें।
- मच्छरों के प्रजनन को रोकने के लिए अपने घर के आसपास गमले, बाल्टी, कूलर आदि में भरा पानी निकाल दें।
- बुखार, गले में खराश, जोड़ों में दर्द, आंखें लाल होने जैसे लक्षण नजर आने पर तत्काल प्रभाव से डॉक्टर को दिखाएं।
- जीका वायरस का फिलहाल कोई टीका उपलब्ध नहीं है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि स्थिति में सुधार नहीं होने पर फौरन डॉक्टर को दिखाना चाहिए।