Chitrakoot: काली पाथर में मिले दुर्लभ प्रागैतिहासिक शैल चित्र, इतिहासकर बोले- हजारों साल पुराने हैं चित्र
इतिहासकार डॉ संग्राम सिंह ने भौंरी के पहाड़ों में दुर्लभ प्रागैतिहासिक शैल चित्र खोज निकाले हैं। उनका दावा है कि चित्र हजारों साल पुराने हैं। मध्य भाग में छोटे छोटे चित्रांकन है। कुछ चित्रों नष्ट हो गए हैं और कुछ शैल चित्र खराब भी हो रहे हैं। ऐसे में संरक्षण की महती आवश्यकता है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
चित्रकूट जिले में भौंरी के काली पाथर में इतिहासकार डॉ. संग्राम सिंह ने हजारों वर्ष पुराने दुर्लभ प्रागैतिहासिक शैल चित्र खोजे हैं। उन्होंने बताया कि कर्वी से प्रयागराज को जाने वाले राष्टीय राजमार्ग में भौंरी गांव के पहाड़ के ऊपर समतल जगह पर पहुंच कर तीन बड़ी गुफाएं दिखती हैं।
इसमें पूर्वी गुफा सबसे बड़ी दिखती है।उसी गुफा में अंदर तीन जगहों पर दुर्लभ प्रागैतिहासिक शैल चित्र मिले हैं। इस गुफा में प्रवेश करते ही एक बड़ा शैल चित्र में हिरण पशु का अंकन दिखता है।उसी गुफा के मध्य भाग में छोटे छोटे चित्रांकन है।
कुछ चित्रों विनष्ट हो गए हैं और कुछ शैल चित्र खराब भी हो रहे हैं। संरक्षण की महती आवश्यकता है। वहीं, अंतिम पश्चिमी छोर में बहुत सुंदर और सुरक्षित अवस्था में शैलाश्रय मौजूद हैं। एक बड़ी शिला के नीचे साफ स्वच्छ प्राकृतिक छत में बड़ी तादाद में शैल चित्र मिले हैं। इन शैल चित्रों की संख्या 30 है।
चित्रों में दिखाई पड़ते हैं ये चित्रण
मुख्य बात यह है कि यह शैलाश्रय एक चट्टान में पूरे एक साथ सुरक्षित अवस्था में विद्यमान हैं। इन्हें आज भी देखा जा सकता है।यह पूरे शैल चित्र एक साथ एक पूरी पट्टिका में प्रर्दशित हैं। इन चित्रों में विशेष रूप से हिरण, बकरी, धनुषधारी मनुष्य, कुत्ता, गाय, घोड़े का चित्रण दिखलाई पड़ रहा है।
वहीं, दूसरे शिलाखंड में विविध प्रकार के 18 चित्रों का चित्रण किया गया है। इसमें एक साथ तमाम धनुषधारी बाण लिए मनुष्यों के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का चित्रण है। प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर डॉ. सिंह ने बताया कि चित्रकूट अंचल में मिल रहे शैलाश्रयों में ऐसा दुर्लभ चित्रण नहीं परिलक्षित होता है।
उन्होंने बताया कि भौंरी की काली पाथर पहाड़ी पुरातत्त्व और प्रागैतिहास की दृष्टि से बहुत समृद्धशाली है। धनुष-बाण लिए हुए शिकारियों के साथ जंगली पशुओं और कुछ पालतू पशुओं का गेरुए रंग से चित्रण विशेष रुप से उल्लेखनीय और खूबसूरत है।
1883 में हुई थी पहली बार शैल चित्रों की खोज
बता दें कि सर्वप्रथम 1883 में इतिहासविद काकवर्न ने चित्रकूट के समीपस्थ शैल चित्रों की खोज पहली बार की थी। आर्कियोलॉजी एंड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ बांदा डिस्ट्रिक्ट के पेज 61 में डॉ. सीएल दूबे ने चित्रकूट अंचल के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों के बारे में जानकारी दी थी।