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प्राकृतिक आपदाओं को कम करने के उपाए खोजें

Fri, 20 Nov 2020 12:23 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 20 Nov 2020 12:23 AM IST
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Natural aapada less idea search
झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय भूविज्ञान संस्थान करेलियन शोध केंद्र पेट्रोजावोडस्क, रसिया और राजकीय महाविद्यालय गुरूराबांज अल्मोड़ा उत्तराखंड के संयुक्त संयोजन में प्राकृतिक आपदा और प्रबंधन विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का ऑनलाइन शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि यद्यपि प्रकृति में बाढ़, सूखा, भूकंप, सुनामी जैसी आकस्मिक आपदा समय-समय पर आती ही रहती हैं। इनके कारण जीवन और संपत्ति की बहुत हानि होती है लेकिन हिमालयन क्षेत्रों में होने वाले भूस्खलन से मानव संपत्ति तथा संस्कृति को भी खतरा होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान एवं तकनीकी की सहायता से हम इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना करें और जहां तक संभव हो इन आपदाओं को कम से कम करने के उपाय और साधन खोजें।
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प्रो. सिंह ने भूस्खलन से नीचे आने वाले मलबे को रोकने के लिए अपने क्षरा विकसित किए गए कई माडलों की चर्चा की। बताया कि किस प्रकार प्राकृतिक आपदाओं से जानमाल की हानि को न्यूनतम किया जा सकता है। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. ध्रुवसेन सिंह ने बताया कि बादल का फटना या बादल प्रस्फुटन भूकंप की तरह ही एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है, जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। इसमें अचानक तेज बारिश होती है और हालात बाढ़ और तूफान की तरह हो जाते हैं।
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उन्होंने कहा कि जब बादल भारी मात्रा में पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वो अचानक फट पड़ते हैं। बादल फटने की अधिकतर आपदाएं पहाड़ी क्षेत्रों और हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर में ही होती हैं। इसके परिणामस्वरूप लगभग 100 मिलीमीटर प्रति घंटा की दर से वर्षा होती है, जिस कारण भारी तबाही होती है। भूगर्भ संस्थान करेलियन शोध केंद्र पेट्रोजावोडस्क के निदेशक प्रो. सर्गेई स्वेतोव, प्रो. वीए शेखोव, प्रो. एनवी शेरोव, प्रो. एए लेबेडेव, प्रो. एमबी जाबकोव, प्रो. राहुल वर्मा, डॉ. शांतनु सरकार, डॉ. श्याम बाबू पटेल, डॉ. एके बियानी, डॉ. आरए सिंह, प्रो. विनोद सिंह, प्रो. एमएम सिंह मौजूद रहे।
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