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Jhansi: तुलसीदास की विनय पात्रिका समेत सहेजी जा रहीं 66 दुर्लभ पांडुलिपियां, किया जाएगा डिजिटल
Wed, 20 May 2026 08:27 PM IST
दीपक महाजन
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: दीपक महाजन
Updated Wed, 20 May 2026 08:27 PM IST
सार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं राज्य सरकार की ओर से सर्वे कराकर पांडुलिपियों की सूची बनाई गई है। इनको ज्ञान भारतम मिशन के तहत डिजिटल किया जाएगा।
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राजकीय संग्रहालय, झांसी
- फोटो : संवाद
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विस्तार
सैकड़ों-हजारों साल पुरानी ज्ञान परंपरा को आने वाली पीढि़यों तक पहुंचाने के लिए अब उसे सहेजा जा रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं राज्य सरकार की ओर से सर्वे कराकर पांडुलिपियों की सूची बनाई गई है। इनको ज्ञान भारतम मिशन के तहत डिजिटल किया जाएगा। झांसी संग्रहालय में सुरक्षित तुलसीदास की विनय पत्रिका, बिहारी की बिहारी सतसई, केशव दास की रामचंद्रिका, कुरान शरीफ की दुर्लभ पांडुलिपि भी शामिल किया गया है। संग्रहालय अफसरों का कहना है 66 पांडुलिपियों को डिजिटल करने के साथ जैन एवं हिंदू मंदिरों से भी पांडुलिपि तलाशी जा रही हैं।
मध्य भारत का भौगोलिक भूखंड हजारों साल से सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व का रहा है। महाभारत कालीन चेदि शासन से लेकर नागवंश के शासन का उल्लेख मिला है। मध्य काल में चंदेल एवं बुंदेला शासकों का राज रहा। हजारों साल की सांस्कृतिक विरासत का जिक्र यहां मिली तमाम पांडुलिपियों में भी मिला है। जैन मंदिरों से लेकर हिंदू मंदिरों में पांडुलिपियां मिली हैं। संस्कृति मंत्रालय ने ऐसी पांडुलिपियों की खोज करने के साथ ही उनको संरक्षित करने के लिए ज्ञान भारतम मिशन शुरू किया। राजकीय संग्रहालय के उपनिदेशक डा.मनोज कुमार गौतम का कहना है कि यहां गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका, प्रसिद्ध कवि बिहारी की बिहारी सतसई, कुरान शरीफ समेत कई दुर्लभ मानी जाने वाली पांडुलिपि है। आज से अतीत की कड़ियां जोड़ने में सहायक पांडुलिपियां भी यहां है। अब इनको ज्ञान भारतम मिशन के तहत सहेजा जा रहा है।
संग्रहालय में मौजूद हैं यह दुलर्भ पांडुलिपियां
राजकीय संग्रहालय में करीब डेढ़ सौ साल पुराना उत्तम चरित के 26 पृष्ठ, मानव जीवन से संबंधित भाव प्रकाश, स्कंद पुराण का अयोध्या खंड गीता, मनु स्मृति, गजेंद्र मोक्ष सहित सोलह चित्र, जैन पांडुलिपि, श्रीमद्भागवत गीता समेत तमाम पांडुलिपियां हैं। यह सभी डेढ़ सौ साल से भी अधिक पुरानी हैं।
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पांडुलिपि का न्यूनतम 75 साल पुराना होना अनिवार्य
उप निदेशक डा.मनोज गौतम का कहना है कि न्यूनतम 75 साल पुराने हस्तलिखित लेख को ही पांडुलिपि माना जाता है। उसका ऐतिहासिक महत्व आंका जाता है। पांडुलिपि होने के लिए उसे कागज, भोजपत्र, तांबपत्र अथवा ताड़पत्र में लिखा होना चाहिए। पत्थरों में लिखे को पांडुलिपि का दर्जा नहीं दिया जाता। उनका कहना है कि पुरातत्व विभाग की ओर से पांडुलिपियों की खोज की जा रही है, जिसके पास भी पांडुलिपि है वह स्वयं से ऑनलाइन भी उसे सरंक्षित कर सकता है।
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मध्य भारत का भौगोलिक भूखंड हजारों साल से सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व का रहा है। महाभारत कालीन चेदि शासन से लेकर नागवंश के शासन का उल्लेख मिला है। मध्य काल में चंदेल एवं बुंदेला शासकों का राज रहा। हजारों साल की सांस्कृतिक विरासत का जिक्र यहां मिली तमाम पांडुलिपियों में भी मिला है। जैन मंदिरों से लेकर हिंदू मंदिरों में पांडुलिपियां मिली हैं। संस्कृति मंत्रालय ने ऐसी पांडुलिपियों की खोज करने के साथ ही उनको संरक्षित करने के लिए ज्ञान भारतम मिशन शुरू किया। राजकीय संग्रहालय के उपनिदेशक डा.मनोज कुमार गौतम का कहना है कि यहां गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका, प्रसिद्ध कवि बिहारी की बिहारी सतसई, कुरान शरीफ समेत कई दुर्लभ मानी जाने वाली पांडुलिपि है। आज से अतीत की कड़ियां जोड़ने में सहायक पांडुलिपियां भी यहां है। अब इनको ज्ञान भारतम मिशन के तहत सहेजा जा रहा है।
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संग्रहालय में मौजूद हैं यह दुलर्भ पांडुलिपियां
राजकीय संग्रहालय में करीब डेढ़ सौ साल पुराना उत्तम चरित के 26 पृष्ठ, मानव जीवन से संबंधित भाव प्रकाश, स्कंद पुराण का अयोध्या खंड गीता, मनु स्मृति, गजेंद्र मोक्ष सहित सोलह चित्र, जैन पांडुलिपि, श्रीमद्भागवत गीता समेत तमाम पांडुलिपियां हैं। यह सभी डेढ़ सौ साल से भी अधिक पुरानी हैं।
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पांडुलिपि का न्यूनतम 75 साल पुराना होना अनिवार्य
उप निदेशक डा.मनोज गौतम का कहना है कि न्यूनतम 75 साल पुराने हस्तलिखित लेख को ही पांडुलिपि माना जाता है। उसका ऐतिहासिक महत्व आंका जाता है। पांडुलिपि होने के लिए उसे कागज, भोजपत्र, तांबपत्र अथवा ताड़पत्र में लिखा होना चाहिए। पत्थरों में लिखे को पांडुलिपि का दर्जा नहीं दिया जाता। उनका कहना है कि पुरातत्व विभाग की ओर से पांडुलिपियों की खोज की जा रही है, जिसके पास भी पांडुलिपि है वह स्वयं से ऑनलाइन भी उसे सरंक्षित कर सकता है।