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वह अंतिम सांस तक नारे लगाते रहे, आजादी हम लेके रहेंगे
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झांसी। देश आजाद हो चुका था पर पूरी आजादी अभी बाकी थी, इसके लिए स्वतंत्रता सेनानी अब भी संघर्ष कर रहे थे। 1947 में देश से अंग्रेज जा चुके थे, पर उनका समर्थन करने वाले रियासतों के सामंत अब भी जनता का शोषण और अत्याचार कर रहे थे। झांसी को छोड़कर आसपास की अधिकांश रियासतें अंग्रेजों की समर्थत थीं। इस मायने में आजादी के रणवबांकुरे इस स्वतंत्रता को संपूर्ण नहीं मान रहे थे। उनका पूर्ण आजादी के लिए संघर्ष जारी था। जगह-जगह रियासतों के विलय के लिए आंदोलन चल रहे थे। आंदोलन करने वाले सेनानी जितने अंग्रेजों के लिए आंख की किरकिरी थे उतने ही भारतीय रियासतों पर राज करने वाले सामंतों के लिए भी। बुंदेलखंड के ऐसे ही एक आजादी के दीवीने थे अमर शहीद नारायण दास खरे, जिन्होंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह में हिस्सा लेकर देश को आजादी तो दिला दी पर उत्तरदायी शासन यानी की रियासतों के विलय कराने के लिएआंदोलन करते समय सामंतों के लठैतों ने टीकमगढ के पास नरोसा नाले के पास उनकी हत्या कर दी थी। उनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए पर वह अंतिम सांस तक एक ही नारा लगाते रहे आजादी हम लेके रहेंगे। यह अधूरी आजादी बाद में पूरी हुई पर उसे देखने के लिए नारायणदास नहीं रहे। कम्युनिस्ट विचारधारा के होने के साथ ही वह भगत सिंह से भी बेहद प्रभावित थे।
बुंदेलखंड में पहला झंडा सत्याग्रह किया था नारायण दास ने
इतिहासकार अजित पुरोहित बताते हैं कि ओरछा रियासत में पहला झंडा सत्याग्रह करने वाले पहला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नारायण दास खरे को ही माना जाता है। उस दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में रियासतों की सरकारी इमारतों पर सत्याग्रही तिरंगा फहराकर अंग्रजों के खिलाफ नारेबाजी करते थे। इस दौरान फिरंगी सैनिक व रियासतों के सिपाही मिलकर इन आंदोलनकारियों पर दमनात्मक कार्रवाई करते थे। 1937 से 1947 तक नारायणदास खरे लगातार आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। इसके लिए उन्हें कई परेशानियों से जूझना पड़ा। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के ललितपुर के दैलवारा गांव में 14 फरवरी 1918 को हुआ था। इनके पिता का निधन बचपन में ही हो गया था। चाचा पारीछत ने इनका लालन पालन किया। चाचा ओरछा रियासत के जतारा में राजस्व विभाग में नौकरी करते थे, इस कारण नारायणदास दैलवारा छोड़ ओरछा रियासत के टीकमगढ़ नगर में रहने लगे। पर, 30 दिसंबर 1937 को ओरछा रियासत के टीकमगढ़ नगर में नारायण दास ने प्रथम झंडा सत्याग्रह किया और इस कारण उनके चाचा पारीछत की नौकरी भी चली गई। 1938 में टोड़ीफतेहपुर रियासत में आंदोलन करते समय इन्हें जेल जाना पड़ा। 1939 में हैदराबाद आंदोलन में भाग लिया और छह माह की जेल काटी। 1940 में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आंदोलन करने पर इन्हें गिरफ्तार कर झांसी जेल में रखा गया।
अंग्रेजों के अलावा सामंतों की भी आंख की किरकिरी थे खरे
इतिहासकार अजय शर्मा बताते हैं कि एक दिसंबर की सर्द काली रात में नारायण दास खरे के जेहन में आजादी मिल जाने की खुशी तो थी पर अंग्रेजों के मित्र रियासतदारों को उखाड़ फेंकने का उत्साह भी। आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, एक तरफ अंग्रजों की फौज थी तो दूसरी तरफ फिरंगियों का समर्थन करने वाले सामंतों की सेना। 1947 में अंग्रेज जा चुके थे, पर रियासतों का विलय होना अभी बाकी था, इसी सिलसिले में एक दिसंबर 1947 को तत्कालीन ओरछा राज्य के टीकमगढ़ नगर के पास स्थित बड़ागांव में सत्याग्रहियों की एक सभा का आयोजन किया गया। नारायणदास खरे इसी सभा में भाग लेने बड़ागांव गए हुए थे। सभा में उन्होंने कहा था जब तक सामंतों की शक्ति का खात्मा नहीं हो जाता तब तक आजादी अधूरी है। रात हो गई और वह अपनी साइकिल से बड़ागांव से टीकमगढ़ की ओर आ रहे थे, रास्ते में नरौसा नाले के पास पहले से घात लगाए बैठे सामंतों के लठेतों ने नारायण दास पर हमला बोल दिया। उन्हें पहले गोली मारी फिर उनके शरीर के टुकड़े टुक़ड़े करके बोरे में भरकर उसे नाले में फेंक दिया। सुबह जब दूसरे सत्याग्रहियों ने खोजबीन की तो नारायण दास के कपड़े और चप्पलों से उनकी पहचान कर ली गई। आसपास के खेतों के किसानों ने बताया कि जब उनकी हत्या की जा रही थी तो वह भारत माता की जय और आजादी हम लेकर रहेंगे जैसे नारे लगा रहे थे। इस अमर शहीद की मौत के कई वर्षों तक किसी ने इनके बलिदान को याद नहीं किया पर मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने टीकमगढ़ में इस अमर शहीद की प्रतिमा लगाकर उसका अनावरण किया।
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बुंदेलखंड में पहला झंडा सत्याग्रह किया था नारायण दास ने
इतिहासकार अजित पुरोहित बताते हैं कि ओरछा रियासत में पहला झंडा सत्याग्रह करने वाले पहला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नारायण दास खरे को ही माना जाता है। उस दौरान महात्मा गांधी के नेतृत्व में रियासतों की सरकारी इमारतों पर सत्याग्रही तिरंगा फहराकर अंग्रजों के खिलाफ नारेबाजी करते थे। इस दौरान फिरंगी सैनिक व रियासतों के सिपाही मिलकर इन आंदोलनकारियों पर दमनात्मक कार्रवाई करते थे। 1937 से 1947 तक नारायणदास खरे लगातार आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। इसके लिए उन्हें कई परेशानियों से जूझना पड़ा। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के ललितपुर के दैलवारा गांव में 14 फरवरी 1918 को हुआ था। इनके पिता का निधन बचपन में ही हो गया था। चाचा पारीछत ने इनका लालन पालन किया। चाचा ओरछा रियासत के जतारा में राजस्व विभाग में नौकरी करते थे, इस कारण नारायणदास दैलवारा छोड़ ओरछा रियासत के टीकमगढ़ नगर में रहने लगे। पर, 30 दिसंबर 1937 को ओरछा रियासत के टीकमगढ़ नगर में नारायण दास ने प्रथम झंडा सत्याग्रह किया और इस कारण उनके चाचा पारीछत की नौकरी भी चली गई। 1938 में टोड़ीफतेहपुर रियासत में आंदोलन करते समय इन्हें जेल जाना पड़ा। 1939 में हैदराबाद आंदोलन में भाग लिया और छह माह की जेल काटी। 1940 में अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आंदोलन करने पर इन्हें गिरफ्तार कर झांसी जेल में रखा गया।
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अंग्रेजों के अलावा सामंतों की भी आंख की किरकिरी थे खरे
इतिहासकार अजय शर्मा बताते हैं कि एक दिसंबर की सर्द काली रात में नारायण दास खरे के जेहन में आजादी मिल जाने की खुशी तो थी पर अंग्रेजों के मित्र रियासतदारों को उखाड़ फेंकने का उत्साह भी। आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, एक तरफ अंग्रजों की फौज थी तो दूसरी तरफ फिरंगियों का समर्थन करने वाले सामंतों की सेना। 1947 में अंग्रेज जा चुके थे, पर रियासतों का विलय होना अभी बाकी था, इसी सिलसिले में एक दिसंबर 1947 को तत्कालीन ओरछा राज्य के टीकमगढ़ नगर के पास स्थित बड़ागांव में सत्याग्रहियों की एक सभा का आयोजन किया गया। नारायणदास खरे इसी सभा में भाग लेने बड़ागांव गए हुए थे। सभा में उन्होंने कहा था जब तक सामंतों की शक्ति का खात्मा नहीं हो जाता तब तक आजादी अधूरी है। रात हो गई और वह अपनी साइकिल से बड़ागांव से टीकमगढ़ की ओर आ रहे थे, रास्ते में नरौसा नाले के पास पहले से घात लगाए बैठे सामंतों के लठेतों ने नारायण दास पर हमला बोल दिया। उन्हें पहले गोली मारी फिर उनके शरीर के टुकड़े टुक़ड़े करके बोरे में भरकर उसे नाले में फेंक दिया। सुबह जब दूसरे सत्याग्रहियों ने खोजबीन की तो नारायण दास के कपड़े और चप्पलों से उनकी पहचान कर ली गई। आसपास के खेतों के किसानों ने बताया कि जब उनकी हत्या की जा रही थी तो वह भारत माता की जय और आजादी हम लेकर रहेंगे जैसे नारे लगा रहे थे। इस अमर शहीद की मौत के कई वर्षों तक किसी ने इनके बलिदान को याद नहीं किया पर मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने टीकमगढ़ में इस अमर शहीद की प्रतिमा लगाकर उसका अनावरण किया।
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