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‘परमात्मा की भक्ति में ही सच्चा सुख’
अमर उजाला ब्यूरो जालौन
Updated Wed, 23 Sep 2015 12:22 AM IST
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प्राणी भौतिक साधनों और संसाधनों में सुख ढूंढता फिरता है। इसके बावजूद वह सुख के आसपास भी नहीं फटक पाता, क्योंकि सच्चा सुख तो परमात्मा की भक्ति और भगवत नाम स्मरण में ही है। निश्छल और निष्कपट मन से जिसने भी ईश्वर को पाना चाहा, उसे परमात्मा का दर्शन अवश्य हुआ और वह संसार के आवागमन से मुक्त हो गया।
यह बात भुंजरया हनुमान मंदिर में हो रही श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन कथा सुनाते हुए कथावाचक स्वामी शिव शंकरानंद सरस्वती ने कही।शिव शंकरानंद सरस्वती ने कहा कि कुंती ने भगवान मधुसूदन से दुख मांगे। कुंती भगवान से कहती हैं कि ‘जब दुख आया तो वे दौड़े-दौड़े उनके पास चले आए।
लेकिन आज जब सुख आया तो वह उन्हें छोड़ कर जा रहे हैं, इससे तो अच्छा है कि उनके जीवन में दुखों के अलावा कुछ और आए ही नहीं’। इसी क्रम में शिव कथा में सती का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि स्त्री के लिए उसका पति ही सर्वस्व होता है। उसकी इच्छा के विरुद्घ कोई कार्य उसे नहीं करना चाहिए।
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सती जी महादेव के रोकने के बाद भी अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में गईं और वहां अपने पति का अपमान होता देख हवनकुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। संगत ही गुन ऊपजै संगत ही गुन जाए सूक्ति पाठ कर उन्होंने बताया कि संगति का प्राणीमात्र पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
एक तोता डाकुओं के साथ रह कर उन्हीं की भाषा सीख गया और मारो, काटो, लूट लो जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगा लेकिन संतों की संगति में आते ही उसमें भी सेवाभाव जाग गया। कथा के अंत में श्रीमद्भागवत पुराण की आरती उतारकर प्रसाद वितरण किया गया।
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यह बात भुंजरया हनुमान मंदिर में हो रही श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन कथा सुनाते हुए कथावाचक स्वामी शिव शंकरानंद सरस्वती ने कही।शिव शंकरानंद सरस्वती ने कहा कि कुंती ने भगवान मधुसूदन से दुख मांगे। कुंती भगवान से कहती हैं कि ‘जब दुख आया तो वे दौड़े-दौड़े उनके पास चले आए।
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लेकिन आज जब सुख आया तो वह उन्हें छोड़ कर जा रहे हैं, इससे तो अच्छा है कि उनके जीवन में दुखों के अलावा कुछ और आए ही नहीं’। इसी क्रम में शिव कथा में सती का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि स्त्री के लिए उसका पति ही सर्वस्व होता है। उसकी इच्छा के विरुद्घ कोई कार्य उसे नहीं करना चाहिए।
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सती जी महादेव के रोकने के बाद भी अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में गईं और वहां अपने पति का अपमान होता देख हवनकुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। संगत ही गुन ऊपजै संगत ही गुन जाए सूक्ति पाठ कर उन्होंने बताया कि संगति का प्राणीमात्र पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
एक तोता डाकुओं के साथ रह कर उन्हीं की भाषा सीख गया और मारो, काटो, लूट लो जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगा लेकिन संतों की संगति में आते ही उसमें भी सेवाभाव जाग गया। कथा के अंत में श्रीमद्भागवत पुराण की आरती उतारकर प्रसाद वितरण किया गया।