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Gonda News: हुनर को बना लिया रोजगार का जरिया
Wed, 16 Sep 2026 11:35 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
संवाद न्यूज एजेंसी, गोंडा
Updated Wed, 16 Sep 2026 11:35 PM IST
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बक्सरा आज्ञाराम गांव में कपड़ों की सिलाई करतीं ललिता शुक्ला। स्रोत: स्वयं
मनकापुर। बक्सरा आज्ञाराम गांव की ललिता शुक्ला ने अपने हुनर को रोजगार का जरिया बना लिया है। कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली ललिता आज सिलाई-कढ़ाई के काम से सालाना डेढ़ से दो लाख रुपये की कमाई कर रही हैं। इतना ही नहीं, उनके हुनर से 10 महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है।
ललिता ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर सिलाई का प्रशिक्षण लिया। अगस्त 2025 में समूह के सहयोग से सिलाई मशीन मिलने के बाद उन्होंने घर से ही छोटे स्तर पर काम शुरू किया। करीब 10 हजार रुपये से शुरू हुआ काम धीरे-धीरे ग्राहकों की बढ़ती मांग के साथ कारोबार में बदल गया। वर्तमान में उनके पास इलेक्ट्रॉनिक सिलाई मशीन समेत आठ मशीनें हैं। यहां महिलाओं और पुरुषों के कपड़ों की सिलाई के साथ पीको और कढ़ाई का काम भी किया जाता है।
ललिता की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। स्वयं सहायता समूह से मिले प्रशिक्षण और सहयोग को उन्होंने मेहनत और हुनर से कारोबार का रूप दिया। आज वह खुद आत्मनिर्भर होने के साथ ही अन्य महिलाओं को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में योगदान दे रही हैं।
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ग्राहक की पसंद के अनुसार तैयार होते हैं कपड़े
ललिता के यहां ग्राहक की पसंद और नाप के अनुसार कपड़े तैयार किए जाते हैं। सूट, ब्लाउज समेत विभिन्न परिधानों की सिलाई के साथ कढ़ाई का काम भी होता है। बढ़ते काम के साथ उन्होंने गांव की अन्य महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ लिया।
15 हजार तिरंगे सिलने का मिला था काम
ललिता के हुनर और काम की पहचान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें करीब 15 हजार तिरंगा सिलने का काम मिला। इतने बड़े ऑर्डर को पूरा करने में उनके साथ काम करने वाली महिलाओं को भी रोजगार मिला और उन्हें अतिरिक्त आमदनी हुई।
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ललिता ने स्वयं सहायता समूह से जुड़कर सिलाई का प्रशिक्षण लिया। अगस्त 2025 में समूह के सहयोग से सिलाई मशीन मिलने के बाद उन्होंने घर से ही छोटे स्तर पर काम शुरू किया। करीब 10 हजार रुपये से शुरू हुआ काम धीरे-धीरे ग्राहकों की बढ़ती मांग के साथ कारोबार में बदल गया। वर्तमान में उनके पास इलेक्ट्रॉनिक सिलाई मशीन समेत आठ मशीनें हैं। यहां महिलाओं और पुरुषों के कपड़ों की सिलाई के साथ पीको और कढ़ाई का काम भी किया जाता है।
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ललिता की कहानी ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन रही है। स्वयं सहायता समूह से मिले प्रशिक्षण और सहयोग को उन्होंने मेहनत और हुनर से कारोबार का रूप दिया। आज वह खुद आत्मनिर्भर होने के साथ ही अन्य महिलाओं को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में योगदान दे रही हैं।
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ग्राहक की पसंद के अनुसार तैयार होते हैं कपड़े
ललिता के यहां ग्राहक की पसंद और नाप के अनुसार कपड़े तैयार किए जाते हैं। सूट, ब्लाउज समेत विभिन्न परिधानों की सिलाई के साथ कढ़ाई का काम भी होता है। बढ़ते काम के साथ उन्होंने गांव की अन्य महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ लिया।
15 हजार तिरंगे सिलने का मिला था काम
ललिता के हुनर और काम की पहचान का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्हें करीब 15 हजार तिरंगा सिलने का काम मिला। इतने बड़े ऑर्डर को पूरा करने में उनके साथ काम करने वाली महिलाओं को भी रोजगार मिला और उन्हें अतिरिक्त आमदनी हुई।