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सूना हुआ आंगन, अब नही सुनाई पड़ता बाबूजी प्रणाम

Sat, 19 Jun 2021 09:51 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 19 Jun 2021 09:51 PM IST
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The courtyard was deserted, now it can not be heard Babuji Pranam
गोंडा। आंगन की जान ही नही जीवन की आशा थे जो वह इस दुनिया में नहीं हैं.. जवान बेटे के निधन से हर पिता के लिए इससे बड़ा दर्द और कुछ नही हो सकता है। सुबह ही बाबू जी प्रणाम से मन खुश हो जाता था।
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ढेरों आर्शीवाद स्वत: निकल जाते थे। कोरोना के क्रूर पंजे ने हस्ते खेलते बेटे को ऐसे निगला कि अभी भी सोचने माक्ष से दिल सिहर जाता है। जवान बेटे को कंधा देने का दर्द आज भी पीछा नहीं छोड़ रहा। रविवार को फादर्स- डे पर बेटे की याद और दिल दुखाएंगी।
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यह दर्द है उस पिता का जिसने बीते दिनों अपने जवान बेटे को खो दिया। हंसता- खेलता परिवार अब दर्द से कराह रहा है। भंडहा गांव के सुरेश शुक्ल 58 साल पार कर चुके हैं। राजनीति में भी अच्छी पकड़ है।
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एक स्कूल के प्रबंधक हैं। उनके 22 वर्षीय बेटे हर्षित शुक्ल का निधन बीते दो जून को हुआ है। बेटे पर उन्हें नाज था और आज भी उसका चेहरा सामने आते ही आंखों से आंसू खुद ब खुद झरने लगते हैं। मायूसी भरे स्वर में कहते हैं कि भगवार ऐसा दिन किसी को भी न दिखाए।
इसी तरह मनकापुर के धुसवा गांव के 70 वर्षीय रामतेज की आंखे भी भर आती हैं। जूनियर हाईस्कूल में अनुचर पद से रिटायर हुए थे। उनका 35 वर्षीय कुलदीप से काफी आशाएं थीं। वह काम भी संभालने लगा था और परिवार की आजीविका के लिए कैटरिंग का काम बेहतर ढंग से कर रहा था।
बीते माह उसका निधन हो गया। मानो घर का पूरा सहारा ही चला गया। बुढ़ापे में हर कदम पर उनके साथ खड़े रहने वाले बेटे की मौत से पूरा परिवार सदमे है। बेलसर के मुजेड़ गांव के 70 वर्षीय गुलाब सिंह के दो बेटे का निधन इसी माह में हो गया है।
उनके 42 वर्षीय बेटे राकेश सिंह और 35 वर्षीय राजू सिंह का निधन एक ही माह में होने से पूरा परिवार शोक से अभी तक नही उबर सका है। गुलाब सिंह की आंखों से बहते दर्द भरे आंसू ही पूरी दांस्ता बयां कर रहे हैं। बेटे ही उनकी आन, बान और शान थे।
राकेश सिंह ने बहुत कम समय से सफलता के कदम आगे बढ़ाए थे। राघवेंद्र सिंह भी परिवार के लिए हर समय जुटे रहते थे। दोनो के निधन से बुजुर्ग पिता की सारी उम्मीदें हीं खत्म हो गई है। वह कहते हैं कि बेटे उनकी आंखे थे, अब तो हर पल जीने में घुटन महसूस होती है।
शहर के मालवीय नगर के 58 साल के सुशील श्रीवास्तव विकास भवन में सीडीओ के स्टेनो थे। पूरे परिवार के लिए वह सहारा ही नही हर अपने स्वभाव से हर किसी की पसंद थे। उनकी मौत बीते दिनों जिला अस्पताल में एक माह के करीब जीवन से संघर्ष करने के बाद हो गई।

उनके बेटे नितिन श्रीवास्तव कहते हैं उनके पिता के जैसा इस संसार में कोई नही है। अपने मन की बात वह पिता से खुलकर कहते थे और हर कदम पर साथ देते थे। यही नही परिवार की वह जान थे। आज भी उनकी यादें हम संयोए हुए हैं। पिता के हर पल को याद करके उनकी आंखे भर आती हैं।
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