{"_id":"615347448ebc3e62646702f2","slug":"department-has-pressed-six-crores-of-8680-cooks-of-schools-gonda-news-lko597683895","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्कूलों की 8680 रसोइयों का छह करोड़ दबाए हैं विभाग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्कूलों की 8680 रसोइयों का छह करोड़ दबाए हैं विभाग
विज्ञापन
गोंडा। बेसिक स्कूलों में बच्चों को पका पकाया भोजने देने वाली 8680 रसोइयों का परिवार ही दाने- दाने का मोहताज है। महज 1500 रुपये महीने में पूरे स्कूल के समय तक काम लेने वाला विभाग पांच महीने से मानदेय नही दे रहा है।
स्कूलों में खाना बनाने वाली महिलाएं गरीब परिवार जुड़ी हैं और उन्हें समय से मानदेय न दिया जाना चौंकाने वाला है। मिशन शक्ति से महिलाओं को सशक्त बनाने की मुहिम से भी इन महिला रसोइयों का दर्द नही बांटा जा सका है।
अधिकारी तो शासन से बजट न मिलने का हवाला देकर पल्ला झाड़ ले रहे हैं लेकिन रसोइयों का परिवार कैसे चलेगा, इसकी चिंता किसी नही है। अधिकारियों का कहना है कि बजट मिलने पर मानदेय दिया जाएगा।
विज्ञापन
जिले के 3100 परिषदीय स्कूलों में पौने चार लाख बच्चों को खाना खिलाने वाली 8680 रसोइयों का परिवार इस समय बुरे दौर से गुजर रहा है। एक तो मानदेय भी मनरेगा के श्रमिकों से कम है और दूसरे मानदेय नही मिल रहा है।
स्थिति यह है जिले के जिम्मेदार अफसरों को अन्य लोगों की चिंता तो रहती है लेकिन रसोइयों के मानदेय की चिंता नही है, यह साफ दिख रहा है। रसोइयों को स्कूलों में प्रधानाध्यापकों की तानाशाही का सामना करना पड़ता है ऊपर से मानदेय तक नही मिल रहा है।
एमडीएम समन्वयक गणेश गुप्ता भी मानते हैं कि मानदेय का बजट न आने से मानदेय नही दिया गया है। इससे रसोइयों के परिवार के करीब 32 हजार सदस्यों की उम्मीदें भी टूट रही है। एक रसोइया ने कहा कि वह बच्चों से आंख नही मिला पाती है। कारण मानदेय न होने से वह बच्चों को बिस्कुट तक नही खिला रही है।
एक ओर सरकार गरीबों से जुडी योजनाओं पर गंभीर है और कई तरह की सहायता दे रही है। गरीब कल्याण योजना की मुहिम से गरीबों को अनाज और आर्थिक मदद दे रही है। विधानसभा चुनाव में सौ दिन शेष है और बेसिक शिक्षा विभाग 32 हजार से अधिक पारिवारिक सदस्यों वाली 8680 रसोइयों के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है।
हालत ऐसा है कि सीधे शासन की दुहाई दी जा रही है कि वहीं मानदेय का बजट नही आया है। इसके लिए जिले स्तर पर कोई विकल्प भी तैयार नही किया गया है। जिससे मानदेय दे दिया जाए और फिर बजट आने पर समायोजन किया जा सके। अधिकारी यह भी नही सोंच रहे हैं कि आखिर रसोइयों का परिवार कैसे चल रहा है, उन्हें राहत दी जानी चाहिए।
बेसिक स्कूलों में काम करने वाली रसोइयों के साथ सौतेला व्यवहार की सारी हदें पार की जा रही हैं। एक तो उन्हें बच्चों को भोजन कराने के बाद भी स्कूलों में प्रधानाध्यापक रोके रहते हैं। बिना यह बताए कि आखिर जब एमडीएम बच्चों ने खा लिया तो किस काम से रोका गया है।
इसके अलावा पूरे 11 महीने रसोइयों से काम लिया जाता है, यहां तक की पंचायत चुनाव में पोलिंग पार्टियों के भोजन भी बनवाया गया। 11 महीने काम लिए जाने के बाद भी उन्हें दस माह का ही मानदेय साल में दिया जाता है। सवाल यह है कि आखिर 20 मई को स्कूलों की छुट्टी होती है तो मई माह का मानदेय क्यों नही दिया जाता है। किस हिसाब से 10 महीने ही वेतन दिया जाता है। श्रम विभाग भी इस मामले पर चुप्पी साधे है।
विज्ञापन
स्कूलों में खाना बनाने वाली महिलाएं गरीब परिवार जुड़ी हैं और उन्हें समय से मानदेय न दिया जाना चौंकाने वाला है। मिशन शक्ति से महिलाओं को सशक्त बनाने की मुहिम से भी इन महिला रसोइयों का दर्द नही बांटा जा सका है।
विज्ञापन
अधिकारी तो शासन से बजट न मिलने का हवाला देकर पल्ला झाड़ ले रहे हैं लेकिन रसोइयों का परिवार कैसे चलेगा, इसकी चिंता किसी नही है। अधिकारियों का कहना है कि बजट मिलने पर मानदेय दिया जाएगा।
विज्ञापन
जिले के 3100 परिषदीय स्कूलों में पौने चार लाख बच्चों को खाना खिलाने वाली 8680 रसोइयों का परिवार इस समय बुरे दौर से गुजर रहा है। एक तो मानदेय भी मनरेगा के श्रमिकों से कम है और दूसरे मानदेय नही मिल रहा है।
स्थिति यह है जिले के जिम्मेदार अफसरों को अन्य लोगों की चिंता तो रहती है लेकिन रसोइयों के मानदेय की चिंता नही है, यह साफ दिख रहा है। रसोइयों को स्कूलों में प्रधानाध्यापकों की तानाशाही का सामना करना पड़ता है ऊपर से मानदेय तक नही मिल रहा है।
एमडीएम समन्वयक गणेश गुप्ता भी मानते हैं कि मानदेय का बजट न आने से मानदेय नही दिया गया है। इससे रसोइयों के परिवार के करीब 32 हजार सदस्यों की उम्मीदें भी टूट रही है। एक रसोइया ने कहा कि वह बच्चों से आंख नही मिला पाती है। कारण मानदेय न होने से वह बच्चों को बिस्कुट तक नही खिला रही है।
एक ओर सरकार गरीबों से जुडी योजनाओं पर गंभीर है और कई तरह की सहायता दे रही है। गरीब कल्याण योजना की मुहिम से गरीबों को अनाज और आर्थिक मदद दे रही है। विधानसभा चुनाव में सौ दिन शेष है और बेसिक शिक्षा विभाग 32 हजार से अधिक पारिवारिक सदस्यों वाली 8680 रसोइयों के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है।
हालत ऐसा है कि सीधे शासन की दुहाई दी जा रही है कि वहीं मानदेय का बजट नही आया है। इसके लिए जिले स्तर पर कोई विकल्प भी तैयार नही किया गया है। जिससे मानदेय दे दिया जाए और फिर बजट आने पर समायोजन किया जा सके। अधिकारी यह भी नही सोंच रहे हैं कि आखिर रसोइयों का परिवार कैसे चल रहा है, उन्हें राहत दी जानी चाहिए।
बेसिक स्कूलों में काम करने वाली रसोइयों के साथ सौतेला व्यवहार की सारी हदें पार की जा रही हैं। एक तो उन्हें बच्चों को भोजन कराने के बाद भी स्कूलों में प्रधानाध्यापक रोके रहते हैं। बिना यह बताए कि आखिर जब एमडीएम बच्चों ने खा लिया तो किस काम से रोका गया है।
इसके अलावा पूरे 11 महीने रसोइयों से काम लिया जाता है, यहां तक की पंचायत चुनाव में पोलिंग पार्टियों के भोजन भी बनवाया गया। 11 महीने काम लिए जाने के बाद भी उन्हें दस माह का ही मानदेय साल में दिया जाता है। सवाल यह है कि आखिर 20 मई को स्कूलों की छुट्टी होती है तो मई माह का मानदेय क्यों नही दिया जाता है। किस हिसाब से 10 महीने ही वेतन दिया जाता है। श्रम विभाग भी इस मामले पर चुप्पी साधे है।