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बाइक से बीट में जाते सिपाही, कागजों में दौड़ रही साइकिल
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गोंडा। हाईटेक तकनीक से सुसज्जित होने वाले पुलिस महकमे का काम काज अभी भी पुराने नियमों व मानक पर चल रहा है। अपराध के बदले तौर तरीके व हाईटेक अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस कर्मियों को अभी भी ड्यूटी के लिए साइकिल भत्ते का ही भुगतान होता है। यह बात अलग है कि बाइक से बीट पर गश्त करने के लिए पुलिसकर्मियों को पेट्रोल खर्च का भार अपने वेतन के पैसों से उठाना पड़ता है।
मौजूदा समय में जिले के पुलिस महकमे में 2771 मुख्य आरक्षी व आरक्षियों की तैनाती है। इनमें से 1060 महिला मुख्य आरक्षी व आरक्षी भी है। जिले के सभी 18 थानों समेत पुलिस कार्यालय के विभिन्न शाखाओं व पुलिस लाइन की ड्यूटी इन्हीं पुलिस कर्मियों के जिम्मे रहती है।
कानून व्यवस्था के साथ ही अपराध नियंत्रण समेत बीट में आने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए इन्हें क्षेत्र में भ्रमण भी करना पड़ता है। इन पुलिसकर्मियों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए हाईटेक जमाने में भी साइकिल भत्ता दिया जा रहा है, जबकि निरीक्षकों व उपनिरीक्षकों को बाइक भत्ता मिलता है।
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ऐसे में मौजूदा समय में साइकिल से अपराधियों को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन प्रतीत होता है। सिपाहियों को बीट पर गश्त लगाने के लिए अपने वेतन के पैसे से खरीदा पेट्रोल खर्च करना पड़ रहा है।
कानून व्यवस्था समेत अपराध नियंत्रण व क्षेत्र भ्रमण के लिए तीस साल पहले सिपाही को 50 रुपया साइकिल भत्ता मिलता था। बाद मेें यह राशि बढ़कर पहले 100 और अब 200 सौ रुपया हो गयी है। मगर हाईटेक जमाने में अब कोई भी पुलिसकर्मी साइकिल से बीट में नहीं जाता है। बाइक दौड़ाना अब सभी की जरूरत बन गया है।
सालों बाद भी पुलिस महकमे में अभी भी पुराना नियम ही लागू है। निरीक्षक व उपनिरीक्षक को बाइक भत्ता दिया जाता है। पहले इन दोनों को ही 350 रुपया बाइक भत्ता मिलता था जिसे बाद में बढ़ाकर 700 रुपया कर दिया गया। पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों के बाद भी भत्ते के बतौर मिलने वाली इस नाम मात्र राशि से ड्यूटी बड़ी चुनौती है।
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मौजूदा समय में जिले के पुलिस महकमे में 2771 मुख्य आरक्षी व आरक्षियों की तैनाती है। इनमें से 1060 महिला मुख्य आरक्षी व आरक्षी भी है। जिले के सभी 18 थानों समेत पुलिस कार्यालय के विभिन्न शाखाओं व पुलिस लाइन की ड्यूटी इन्हीं पुलिस कर्मियों के जिम्मे रहती है।
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कानून व्यवस्था के साथ ही अपराध नियंत्रण समेत बीट में आने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए इन्हें क्षेत्र में भ्रमण भी करना पड़ता है। इन पुलिसकर्मियों को अपनी ड्यूटी निभाने के लिए हाईटेक जमाने में भी साइकिल भत्ता दिया जा रहा है, जबकि निरीक्षकों व उपनिरीक्षकों को बाइक भत्ता मिलता है।
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ऐसे में मौजूदा समय में साइकिल से अपराधियों को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन प्रतीत होता है। सिपाहियों को बीट पर गश्त लगाने के लिए अपने वेतन के पैसे से खरीदा पेट्रोल खर्च करना पड़ रहा है।
कानून व्यवस्था समेत अपराध नियंत्रण व क्षेत्र भ्रमण के लिए तीस साल पहले सिपाही को 50 रुपया साइकिल भत्ता मिलता था। बाद मेें यह राशि बढ़कर पहले 100 और अब 200 सौ रुपया हो गयी है। मगर हाईटेक जमाने में अब कोई भी पुलिसकर्मी साइकिल से बीट में नहीं जाता है। बाइक दौड़ाना अब सभी की जरूरत बन गया है।
सालों बाद भी पुलिस महकमे में अभी भी पुराना नियम ही लागू है। निरीक्षक व उपनिरीक्षक को बाइक भत्ता दिया जाता है। पहले इन दोनों को ही 350 रुपया बाइक भत्ता मिलता था जिसे बाद में बढ़ाकर 700 रुपया कर दिया गया। पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों के बाद भी भत्ते के बतौर मिलने वाली इस नाम मात्र राशि से ड्यूटी बड़ी चुनौती है।