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तीन दशक से भाजपा, सपा व बसपा का सियासी ‘त्रिकोण’

Sat, 29 Jan 2022 11:51 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 29 Jan 2022 11:51 PM IST
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fathepur news,Political 'triangle' of BJP, SP and BSP
फतेहपुर। अस्सी व नब्बे के दशक में देश के सियासी नक्शे पर सामने आई भाजपा, बसपा व सपा ने दोआबा में राजनीतिक रफ्तार 1993 से पकड़ी।
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1993 के विधानसभा चुनाव से जिले में खाता खोलने वाले तीनों राजनीतिक दलों ने उस वक्त जो सियासी त्रिकोण स्थापित किया था, उसकी भुजाएं अब तक कायम है।
इस त्रिकोण को ध्वस्त करने की कोशिश में जुटी कांग्रेस समेत अन्य पार्टियों को अब तक अपने मंसूबों में सफलता नहीं मिल पाई है। इस त्रिकोण से पनपे राजनीतिक हालातों में सर्वाधिक नुकसान कांग्रेस को हुआ है।
1985 तक जिले में कांग्रेस एवं 1989 व 1991 में जनता दल के कायम तिलिस्म को भाजपा, बसपा व सपा ने 1993 में तोड़ दिया। 1980 में भाजपा व 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना के बाद दोनो दल जिले के राजनीतिक मंच में आने को बेकरार थे।
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भाजपा जहां राम जन्मभूमि आंदोलन के रथ पर सवार थी, तो वहीं बसपा सर्वजन समाज केंद्रित विचारधारा की राजनीति कर अपना जनाधार मजबूत करने में लगी थी। 1989 व 1991 में जनता दल के अभ्युदय ने जहां कांग्रेस को चारो खाने चित्त कर दिया।
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वहीं भाजपा को मुख्य विपक्षी की धारा में लाकर खड़ा कर दिया। इस बीच राम जन्मभूमि आंदोलन जनता के बीच आधार तैयार कर चुका था। 1989 व 1991 के चुनावों में भले ही अधिकतर सीटें जनता दल के खाते में गई हो लेकिन बसपा व भाजपा उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रही।
1989 में फतेहपुर सीट से बीजेपी के महेंद्र नाथ बाजपेई रनर रहे। वहीं खागा में चौथे स्थान पर रही। बसपा भी इस चुनाव से केंद्र में आने लगी। 1991 के चुनाव में बीजेपी फतेहपुर, जहानाबाद और बिंदकी में दूसरे स्थान पर रही, तो वहीं बसपा किशुनपुर में रनर रही। 1992 में सपा के गठन होने के बाद जिले की सियासी तस्वीर में त्रिकोण कायम हो गया।
कांग्रेस नहीं हो सकी कामयाब
विधानसभा चुनाव 1993 में सपा के सामने आने से जिले की सभी सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला शुरू हो गया। इस त्रिकोणीय मुकाबले को चतुष्कोणीय बनाने में कांग्रेस कामयाब नहीं हो पाई। 1993 के चुनाव में बदले सियासी हालातों के चलते बीजेपी ने हसवा, फतेहपुर व बिंदकी सीट से खाता खोला तो वहीं सपा ने खागा व बसपा ने किशुनपुर सीट जीती।
इस चुनाव में सपा बसपा गठबंधन था। ऐसे में तीनों पार्टियों ने जिले में एक साथ बोहनी की। जहानाबाद सीट जनता दल के खाते में गई। 1996 में बसपा ने जबरदस्त कामयाबी हासिल करते हुए फतेहपुर छोड़कर शेष सीटों पर विजय पताका फहरा दी। सपा का खाता भी नहीं खुला लेकिन उसने त्रिकोण कायम रखा। इसके बाद 2002, 2007 एवं 2012 के विधानसभा चुनावों में इसी राजनीतिक त्रिकोण ने जिले में मतदाताओं की नब्ज पर पकड़ बरकरार रखी।
1996 में बसपा ने जीतीं पांच सीटें
त्रिकोण बनने के बाद बहुजन समाज पार्टी जिले के राजनीतिक मंच पर बड़ी खिलाड़ी बनकर उभरी। उसने 1993 में बोहनी करने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। तीनों पार्टियों के मुकाबले में विजेता बनकर सामने आई।
1993 के चुनाव को छोड़कर अन्य चुनावों में बसपा अन्य दोनो दलों की तुलना में सीटों मामले में सबसे आगे रही। 1996 में उसने खागा, किशुनपुर, हसवा, जहानाबाद और बिंदकी सीटें जीती तो वहीं 2002 में खागा, हसवा व फतेहपुर में पताका फहराई।

2007 में किशुनपुर, हसवा, जहानाबाद व बिंदकी सीटें जीती तो 2012 के विधानसभा चुनाव में हुसैनगंज, अयाह शाह व बिंदकी सीट फतह की। हालांकि 2017 में भाजपा गठबंधन ने सियासी त्रिकोण को एक कोणीय करने में सफलता पाई लेकिन इससे पहले बसपा भी ऐसी सफलता का स्वाद चख चुकी थी।
इतनी सीट जीतकर कायम है ’त्रिकोण’ का जलवा
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चुनावी वर्ष - भाजपा - सपा - बसपा - अन्य
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1993 - 3 - 1 - 1 - 1
1996 - 1 - 0 - 5 - 0
2002 - 2 - 1 - 3 - 0
2007 - 2 - 0 - 4 - 0
2012 - 1 - 2 - 3 - 0
2017 - 5 - 0 - 0 - 1
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