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Farrukhabad News: विश्रामघर व दुकानों पर कब्जा, फर्श पर सो रहे चालक-परिचालक
Thu, 11 Sep 2025 12:18 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद
संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद
Updated Thu, 11 Sep 2025 12:18 AM IST
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फोटो-09, स्टाफ प्रतीक्षालय में कब्जा होने पर जमीन पर बैठे चालक-परिचालक (संवाद)
फर्रुखाबाद। बसें चलाकर लौटे चालक-परिचालकों के लिए बस अड्डे पर विश्राम की व्यवस्था नहीं है। कई साल पहले बनाए गए विश्रामघर और दो दुकानों पर दुकानदार का कब्जा है।
यह दुकानें 25 हजार रुपये महीने किराये पर तीन साल तक चलाई जा चुकी हैं। मजबूर चालक-परिचालक फर्श पर वक्त गुजारने को मजबूर हैं।
करीब छह साल पहले करोड़ों रुपये की लागत से बस अड्डे का भवन बनाया गया था। इसमें यात्रियों की सुविधा के लिए दुकानें भी हैं। यह दुकानें 25 हजार रुपये महीने किराये पर तीन साल तक चलती रहीं। करीब दो साल से दोनों दुकानों में दुकानदार ने अवैध रूप से पानी की बोतलें और अन्य सामान भर रखा है। यहां बनी कैंटीन किराये पर नहीं उठी।
वहीं, बसें चलाकर लौटे थके-हारे चालक-परिचालकों के आराम के लिए तत्कालीन एआरएम विकास कुमार ने छह तख्त, गद्दे, रजाई आदख्सामान की व्यवस्था कर एक विश्रामघर बना दिया था। कई साल इसका लाभ चालक-परिचालकों को मिलता रहा। मगर इसके बाद दुकानदारों ने उस पर कब्जा कर सामान भर लिया।
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इसमें जिम्मेदारों की भी मिलीभगत रही। इससे विभाग को लाखों रुपये का चूना लग रहा है। ऐसे में बसें चलाकर लौटे चालक-परिचालक परिसर में फर्श पर पड़े रहते हैं। इससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है और लंबी दूरी की यात्रा में हादसे की आशंका बनी रहती है।
बेहोश परिचालक को नहीं मिली जगह
मंगलवार दोपहर में बस अड्डे पर परिचालक राघवेंद्र सिंह अचानक बेहोश हो गए। उन्हें कुछ लोग विश्रामघर में ले गए तो उन्हें बाहर निकाल दिया गया। इस पर खासा विवाद हुआ। मजबूरन राघवेंद्र बाहर फर्श पर ही पड़े रहे। साथी लोगों ने चेहरे पर पानी डाला। इस पूरे घटनाक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। हालांकि अमर उजाला इसकी पुष्ट नहीं करता।
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यह दुकानें 25 हजार रुपये महीने किराये पर तीन साल तक चलाई जा चुकी हैं। मजबूर चालक-परिचालक फर्श पर वक्त गुजारने को मजबूर हैं।
करीब छह साल पहले करोड़ों रुपये की लागत से बस अड्डे का भवन बनाया गया था। इसमें यात्रियों की सुविधा के लिए दुकानें भी हैं। यह दुकानें 25 हजार रुपये महीने किराये पर तीन साल तक चलती रहीं। करीब दो साल से दोनों दुकानों में दुकानदार ने अवैध रूप से पानी की बोतलें और अन्य सामान भर रखा है। यहां बनी कैंटीन किराये पर नहीं उठी।
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वहीं, बसें चलाकर लौटे थके-हारे चालक-परिचालकों के आराम के लिए तत्कालीन एआरएम विकास कुमार ने छह तख्त, गद्दे, रजाई आदख्सामान की व्यवस्था कर एक विश्रामघर बना दिया था। कई साल इसका लाभ चालक-परिचालकों को मिलता रहा। मगर इसके बाद दुकानदारों ने उस पर कब्जा कर सामान भर लिया।
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इसमें जिम्मेदारों की भी मिलीभगत रही। इससे विभाग को लाखों रुपये का चूना लग रहा है। ऐसे में बसें चलाकर लौटे चालक-परिचालक परिसर में फर्श पर पड़े रहते हैं। इससे उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है और लंबी दूरी की यात्रा में हादसे की आशंका बनी रहती है।
बेहोश परिचालक को नहीं मिली जगह
मंगलवार दोपहर में बस अड्डे पर परिचालक राघवेंद्र सिंह अचानक बेहोश हो गए। उन्हें कुछ लोग विश्रामघर में ले गए तो उन्हें बाहर निकाल दिया गया। इस पर खासा विवाद हुआ। मजबूरन राघवेंद्र बाहर फर्श पर ही पड़े रहे। साथी लोगों ने चेहरे पर पानी डाला। इस पूरे घटनाक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। हालांकि अमर उजाला इसकी पुष्ट नहीं करता।