विकास ने बदली तस्वीर: देवरिया में सड़क का जाल बिछते ही बढ़ गईं जमीनों की कीमत, दाम जानकर हो जाएंगे हैरान
सोंदा गांव के सोनू तिवारी कहते हैं कि गांव के उत्तर ताल में जमीनों की प्लाटिंग की गई है। 10 साल पहले कोई इन जमीनों को पूछता नहीं था। अब 20 से 25 लाख रुपये कट्ठा खरीदकर लोग मकान बना रहे हैं। यहां की सड़कें फोरलेन से लिंक हो गई हैं।
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गोरखपुर-देवरिया-सलेमपुर फोरलेन का निर्माण से पहले ही आसपास के इलाकों की तस्वीर बदलने लगी है। जिन जगहों की पहचान जंगल, बंजर और गड्ढे की थी, वहां बदलाव और विकास की बयार दिख रही है। इसका अंदाजा वहां की संपत्तियों की आसमान छूती कीमतों से लगाया जा सकता है। 15 वर्ष पहले पानी से भरे जिस गड्ढे वाली जमीनों को कोई खरीदने को तैयार नहीं था, अब उसकी खरीद के लिए भूस्वामियों की चिरौरी करते दिख रहे हैं।
जानकार बताते हैं कि दो से तीन साल बाद जब शहर का बाईपास बनकर तैयार हो जाएगा, तब यहां खाली जमीन खोजने पर भी नहीं मिलेंगी। 15 साल पहले राजकीय आईटीआई के सामने नवीन सब्जी मंडी के आसपास बरसात के दिनों में कमर भर पानी लग जाता था।
खरीफ की फसल डूबने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता था। किसानों को जमीन की उपयोगिता समझ में नहीं आती थी। एक से डेढ़ लाख रुपये कट्ठा पर जमीनें बिकतीं थीं। वर्ष 2016 में जब फोरलेन की स्वीकृति मिली, तब यहां एक के बाद एक शोरूम, अस्पताल, स्कूल खुलते गए।
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अब खरीदार मुंहमांगे दामों में गड्ढे खरीदकर उन्हें सड़क तक पाट कर शोरूम बना रहे हैं। अगर मकान पहले के हैं तो उस पर दूसरी व तीसरी मंजिल बनाकर रहने लगे हैं। हाईवे के दोनों तरफ माॅर्ट और कांप्लेक्स तेजी से खुलते जा रहे हैं। फोरलेन के निर्माण की छाप दोनों तरफ करीब दो किलोमीटर तक है।
सोंदा गांव के सोनू तिवारी कहते हैं कि गांव के उत्तर ताल में जमीनों की प्लाटिंग की गई है। 10 साल पहले कोई इन जमीनों को पूछता नहीं था। अब 20 से 25 लाख रुपये कट्ठा खरीदकर लोग मकान बना रहे हैं। यहां की सड़कें फोरलेन से लिंक हो गई हैं।
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नाम है चटनी गड़ही, जमीन का दाम सुनकर चकरा जाता है दिमाग
देवरिया शहर का एक मोहल्ला चटनी गड़ही भी है। रामकृपाल दुबे बताते हैं कि 15-20 साल पहले गांव के लोग बरसात में मछली पकड़ने आते थे। नगर पालिका का पुराना वार्ड होने के बाद भी मुहल्ले का नाम सुनते ही खरीदार भाग जाते थे। शहर में मेडिकल काॅलेज खुलने, फोरलेन का निर्माण होने व सड़कों का जाल बिछने के बाद मुहल्ले की पहचान गायब हो गई है। दो लाख रुपये कट्ठा न बिक पाने वाली जमीनें अब 70 लाख रुपये कट्ठा तक बिक रही हैं।
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खेती भी नहीं होती थी यहां, बस गया मंगलमपुरम
चकियवा वार्ड में रेलवे लाइन किनारे करीब 40 हेक्टेयर जमीन परती रहती थी। आज यहां मंगलमपुरम के नाम से दो मुहल्ले बस गए हैं। पिपरपाती गांव के गुलाब यादव, शिवाकांत मिश्र बताते हैं कि बारिश के पानी की निकासी नहीं हो पाती थी। रेलवे लाइन होने के कारण चार महीने तक पानी भरा रहता था। कई लोगों ने 10 साल पहले डेढ़ से दो लाख रुपये कट्ठा पर जमीनें बेच दीं। अब यहां मंगलमपुरम, फेज एक और दो नाम से दो काॅलोनियां बस गई हैं। 30 से 40 लाख रुपये कट्ठा जमीन बिक रही है। नगर पालिका सड़क व जलनिकासी का इंतजाम करा रही है।
बोले लोग
फोरलेन का निर्माण शुरू होने के साथ ही राजकीय आईटीआई से लेकर सोनूघाट तक जमीनों की कीमत काफी बढ़ गई है। शहर के नामी स्कूल व अस्पताल जेल से लेकर सोनूघाट के बीच खुले हैं। इन सुविधाओं को देखते हुए लोग यहां घर बना रहे हैं। - संजय शंकर मिश्र, सोंदा
पिपरपाती और चिंतामन चक के बीच और चकियवा वार्ड में रेलवे लाइन किनारे की जमीन तालनुमा थी। यहां खेती भी नहीं हो पाती थी। पांच साल पहले दो से ढाई लाख रुपये कट्ठा यहां जमीन बिकी। शहर में मेडिकल कालेज खुलने व सड़कों का जाल बिछने से लोग इन जमीनों पर घर बनाते जा रहे हैं। आज जमीन की कीमत सड़क से आधा किमी भीतर 25 लाख तक पहुंच गई है। - संजय मिश्रा, पिपरपाती
गड्ढानुमा जमीन होने के कारण इस मुहल्ले का नाम चटनी गड़ही है। 10 साल पहले यहां घर बनाना तो दूर लोग खेती के लिए जमीन खरीदना पसंद नहीं करते थे। शहर का विकास होने के चलते लोगों को अब यह मुहल्ला भाने लगा है। 70 लाख रुपये कट्ठा की दर तक जमीन बिक रही है। - राम कृपाल तिवारी, चटनी गड़ही मोहल्ला
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एक्सपर्ट्स कमेंट्स
सोंदा, पिपरपाती, चिंतामन चक आदि पहले ग्रामीण इलाके थे। अब यह नगर पालिका में शामिल हो गए हैं। यहां सड़क, नाली, पथ प्रकाश समेत अन्य सुविधाओं का खाका तैयार किया गया है। सुविधाएं मिलने से जमीन की कीमत आने वाले दिनों में और बढ़ेगी। - रोहित सिंह, ईओ नगर पालिका