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पापा के सपनों को पंख लगाने में जुटी बेटियां
Updated Fri, 28 Jul 2017 10:35 PM IST
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सुरेंद्र वत्स
रुद्रपुर। नकइल गांव के अष्टभुजा सिंह दोनों बेटियों को कुश्ती के दांवपेंच की ट्रेनिंग दे रहे हैं। वे बेटियों को कुश्ती का राष्ट्रीय खिलाड़ी बनाने को दिन-रात जुटे हैं। इलाके में कुश्ती के माहिर खिलाड़ी रहे अष्टभुजा गरीबी के कारण राष्ट्रीय क्षितिज पर पहचान नहीं बना पाए। उनका सपना अब बेटियों ने पूरा करने की ठान ली है। दोनों बेटियां गीता और बबिता फोगाट से प्रेरणा लेकर पिता के सपनों को पंख लगाने में जुटी हैं।
गांव समाज की बातों का परवाह किए बिना वे दोनों बेटियों को बेटों की तरह पाल रहे हैं। सुबह तीन बजे उठना, अभ्यास करना और घंटों अखाड़े में कुश्ती लड़ना उनकी दिनचर्या है। उनकी दो बेटियों में अंजली 14 वर्ष की और अवंतिका 13 साल की है। वे दोनों के साथ सुबह तीन बजे उठकर चार किलोमीटर दौड़ लगाते हैं। 45 मिनट में एक हजार दंड-बैठक और रस्सी चढ़ने के बाद करीब दो घंटे कुश्ती की प्रेक्टिस करती है। अष्टभुजा खुद अच्छे पहलवान रहे हैं। 90 के दशक में देसी कुश्ती में वह स्कूल की ओर से राष्ट्रीय चैंपियनशिप खेल चुके हैं। गरीबी के कारण उनके पिता उन्हें बेहतर प्रशिक्षण नहीं दिलवा पाए। इसलिए उन्हें कमाने खाने में लगना पड़ा। उन्होंने कहा कि कुश्ती में ऊंचा मुकाम हासिल करना सपना था। अब उस सपने को बेटियां पूरा करेंगी। वह कुश्ती के 25 ऐसे दांव जानते हैं जो शायद कोई प्रशिक्षक भी नहीं जानता होगा। उन्होंने कहा कि बेटियों को दिल्ली में प्रशिक्षण दिलवाकर अच्छा पहलवान बनाना है। अवंतिका और अंजली दिल्ली के कुश्ती संस्थानों में दाखिले के लिए दिन-रात पसीना बहा रही हैं। उन्होंने कहा कि पापा के सपनों को हम दोनों बहनें पूरा करेंगी।
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रुद्रपुर। नकइल गांव के अष्टभुजा सिंह दोनों बेटियों को कुश्ती के दांवपेंच की ट्रेनिंग दे रहे हैं। वे बेटियों को कुश्ती का राष्ट्रीय खिलाड़ी बनाने को दिन-रात जुटे हैं। इलाके में कुश्ती के माहिर खिलाड़ी रहे अष्टभुजा गरीबी के कारण राष्ट्रीय क्षितिज पर पहचान नहीं बना पाए। उनका सपना अब बेटियों ने पूरा करने की ठान ली है। दोनों बेटियां गीता और बबिता फोगाट से प्रेरणा लेकर पिता के सपनों को पंख लगाने में जुटी हैं।
गांव समाज की बातों का परवाह किए बिना वे दोनों बेटियों को बेटों की तरह पाल रहे हैं। सुबह तीन बजे उठना, अभ्यास करना और घंटों अखाड़े में कुश्ती लड़ना उनकी दिनचर्या है। उनकी दो बेटियों में अंजली 14 वर्ष की और अवंतिका 13 साल की है। वे दोनों के साथ सुबह तीन बजे उठकर चार किलोमीटर दौड़ लगाते हैं। 45 मिनट में एक हजार दंड-बैठक और रस्सी चढ़ने के बाद करीब दो घंटे कुश्ती की प्रेक्टिस करती है। अष्टभुजा खुद अच्छे पहलवान रहे हैं। 90 के दशक में देसी कुश्ती में वह स्कूल की ओर से राष्ट्रीय चैंपियनशिप खेल चुके हैं। गरीबी के कारण उनके पिता उन्हें बेहतर प्रशिक्षण नहीं दिलवा पाए। इसलिए उन्हें कमाने खाने में लगना पड़ा। उन्होंने कहा कि कुश्ती में ऊंचा मुकाम हासिल करना सपना था। अब उस सपने को बेटियां पूरा करेंगी। वह कुश्ती के 25 ऐसे दांव जानते हैं जो शायद कोई प्रशिक्षक भी नहीं जानता होगा। उन्होंने कहा कि बेटियों को दिल्ली में प्रशिक्षण दिलवाकर अच्छा पहलवान बनाना है। अवंतिका और अंजली दिल्ली के कुश्ती संस्थानों में दाखिले के लिए दिन-रात पसीना बहा रही हैं। उन्होंने कहा कि पापा के सपनों को हम दोनों बहनें पूरा करेंगी।
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