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हनितघाट बारुदी सुरंग विस्फोट से है जयमोहनी-पोस्ता गांव की पहचान

Wed, 20 Nov 2019 12:42 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 20 Nov 2019 12:42 AM IST
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chandauli news
चकिया। नक्सलवाद के उत्कर्ष के दौर में हिनौतघाट गांव की बारूदी सुरंग बिस्फोट की बड़ी घटना के कारण जयमोहनी पोस्ता गांव चर्चे में आया। जयमोहनी पोस्ता गांव के नरकटी, सेमरिया, खुथहड़, हिनौतघाट मजरे हैं। 20 नवंबर 2004 को इस विस्फोट काण्ड में 36वीं वाहिनी पीएसी के 14 तथा चन्द्रप्रभा चौकी इंचार्ज एवं एक पुलिसकर्मी की मौत हो गयी थी। चन्द्रप्रभा बांध के ठीक किनारे बसे होने के कारण गांव का नाम हिनौतघाट पड़ा है। करीब 300 आबादी वाले हिनौतघाट मजरे से ही अब जयमोहनी पोस्ता को लोग अधिक जानते हैं। अब हिंसा के दौर से बाहर निकलने के बाद ग्रामीण जीवन-यापन की मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं।
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गांव के लोगों ने बताया कि पूरी तरह से सामान्य हो चुक है। अब जय मोहनी पोस्ता गांव के इन मजरेे में लोग अपनी आजीविका के लिए जीतोड़ मेहनत कर रहे हैं। पांच मजरों वाले इस गांव की आबादी तकरीबन तीन हजार है। इन मजरों को जोड़ने वाली सड़कें खराब हैं। हिनौतघाट का संपर्क मार्ग पूरी तरह कच्चा तथा ध्वस्त है। जिससे ग्रामीणो को आवागमन में भारी दिक्कतो का सामना करना पड़ रहा है। यहां एनजीओ मानव सेवा केन्द्र द्वारा संचालित एक छोटा स्कूल है। जिसकी हालत अत्यन्त खस्ता है। बच्चों को पढ़ने के लिए पांच किमी दूर जाने की मजबूरी है। वही गांव में राजस्व की एक इंच भी जमीन नहीं है। जिससे गांव में स्कूल, अस्पताल एवं अन्य संसाधनों को स्थापित करना कठिन है। गरीबों को आवास भी नहीं मिल पा रहा है। हिनौतघाट मजरे में शिक्षा के अभाव के कारण दो-तीन लोग ही इंटर, बीए तक की शिक्षा प्राप्त कर सके हैं। गांव की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि तथा पशुपालन पर टिकी हुयी है। यही हाल जय मोहनी पोस्ता गांव के तकरीबन अन्य मजरों का है। वहां भी साक्षरता दर काफी कम है। वनाधिकार कानून का लाभ भी ग्रामीणों को नहीं मिल सका है। ग्रामीणों को राशन तथा पेंशन के साथ ही आयुष्मान भारत योजना से जोड़ा गया है। गांव में मौजूद सोलर पावर से चलने वाला नलकूप एक वर्ष तक लगातार खराब रहने के कारण पेयजल की समस्या है। एक ग्रामीण के प्रयास से नलकूप को सोलर की जगह इलेक्ट्रीक पावर से जोड़ा गया है। गांव का पूरी तरह विद्युतीकरण हुआ है लेकिन शौचालयों का केवल ढांचा ही बनाकर छोड़ दिया गया है।
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एनजीओ द्वारा बनवाये गये विद्यालय का जीर्णोद्धार करके तथा एक प्राइमरी टीचर की नियुक्ति से गांव के छोटे बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जा सकता है। बासमती, दिव्यांग शिक्षिका
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गांव में वनाधिकार कानून को लागू करने में सरकार विफल रही है। गांव में उनके पुरखे लंबे समय से निवास करते हैं लेकिन वनाधिकार कानून का लाभ न मिलने से ग्रामीण हर समय अपने खेतों को लेकर चिंतित रहते है। राजनाथ
गांव को चकिया नौगढ़ मार्ग से जोड़ने वाला मार्ग जर्जर होने के कारण आवागमन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। गांव का सम्पर्क मार्ग पक्का बनने से रोजगार के संसाधन बढ़ेंगे।

सुखनंदन
आवागमन के संसाधन तथा स्वास्थ्य सुविधा के अभाव के कारण गर्भवती महिलाओं एवं बीमार लोगों को अस्पताल तक ले जाने में भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। इसलिए गांव में ही एएनएम सेंटर बनाने की जरूरत है। रुपा
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