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कर्म के अनुसार मनुष्य को मिलता है दुख व सुख
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चहनिया। मनुष्य द्वारा किए हुए कर्मों का फल उसे सुख और दुख के रूप में प्राप्त होता है। जैसे मनुष्य दुख के लिए प्रयास नहीं करता उसी प्रकार सुख के लिए भी उसे प्रयास नहीं करना चाहिए। इसलिए मानव जीवन प्राप्त होने के बाद अच्छे कार्यों, सत्कर्मों को करने चाहिए।
ये बातें कैलावर गांव में चल रहे चतुर्मास यज्ञ व श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन श्रीजीयर स्वामी ने कहीं। कहा कि लज्जा राष्ट्र की संस्कृति है। जहां लज्जा नहीं रहती वहां सब कुछ रहने के बाद भी कुछ नहीं रह जाता है। लज्जा मानव की गरिमा है। अगर इसे संस्कृति से हटा दिया जाए तो पशु और मनुष्य में कोई अंतर ही नहीं रह जाएगा। उन्होंने कहा कि तेजी से बदल रहे सामाजिक ताने-बाने से संस्कृति और लज्जा दूर होती जा रही है। पहनावे से लेकर बात-व्यवहार और संस्कार में बदलाव आया है। मनुष्य को गरिमा और लज्जा का ख्याल रखना चाहिए। मन, बचन और कर्म से भक्तिपूर्वक परमात्मा का ध्यान करते हुए उनके नाम, गुण, लीला, धाम इन चारों की उपासना करना ही श्रेष्ठ प्रायश्चित है। इससे श्रेष्ठ प्रायश्चित यज्ञ, दान, तप भी नही है। यज्ञ, दान, तप करने वालों के पापों का मार्जन भले न हो लेकिन मन से वाणी से पवित्र होकर नाम, गुण, लीला, धाम की भावना श्रेष्ठ प्रायश्चित है और इससे पापों का नाश होता है।
श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन शनिवार को यज्ञ स्थल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। देश के कोने-कोने से महायज्ञ में शामिल होने साधु-संतों के अलावा भक्तों ने यज्ञ की अग्नि में आहुति डाली। आचार्य विजय राघव पांडेय के नेतृत्व में 151 ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार कर पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। यज्ञ आरंभ होने से पूर्व संत-महात्माओं संग श्रद्धालुओं ने यज्ञ मंडप की परिक्रमा की। इसके बाद यज्ञ मंडप की परिक्रमा का क्रम देर रात तक चलता रहा।
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ये बातें कैलावर गांव में चल रहे चतुर्मास यज्ञ व श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन श्रीजीयर स्वामी ने कहीं। कहा कि लज्जा राष्ट्र की संस्कृति है। जहां लज्जा नहीं रहती वहां सब कुछ रहने के बाद भी कुछ नहीं रह जाता है। लज्जा मानव की गरिमा है। अगर इसे संस्कृति से हटा दिया जाए तो पशु और मनुष्य में कोई अंतर ही नहीं रह जाएगा। उन्होंने कहा कि तेजी से बदल रहे सामाजिक ताने-बाने से संस्कृति और लज्जा दूर होती जा रही है। पहनावे से लेकर बात-व्यवहार और संस्कार में बदलाव आया है। मनुष्य को गरिमा और लज्जा का ख्याल रखना चाहिए। मन, बचन और कर्म से भक्तिपूर्वक परमात्मा का ध्यान करते हुए उनके नाम, गुण, लीला, धाम इन चारों की उपासना करना ही श्रेष्ठ प्रायश्चित है। इससे श्रेष्ठ प्रायश्चित यज्ञ, दान, तप भी नही है। यज्ञ, दान, तप करने वालों के पापों का मार्जन भले न हो लेकिन मन से वाणी से पवित्र होकर नाम, गुण, लीला, धाम की भावना श्रेष्ठ प्रायश्चित है और इससे पापों का नाश होता है।
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श्रीलक्ष्मी नारायण महायज्ञ के चौथे दिन शनिवार को यज्ञ स्थल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। देश के कोने-कोने से महायज्ञ में शामिल होने साधु-संतों के अलावा भक्तों ने यज्ञ की अग्नि में आहुति डाली। आचार्य विजय राघव पांडेय के नेतृत्व में 151 ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार कर पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। यज्ञ आरंभ होने से पूर्व संत-महात्माओं संग श्रद्धालुओं ने यज्ञ मंडप की परिक्रमा की। इसके बाद यज्ञ मंडप की परिक्रमा का क्रम देर रात तक चलता रहा।
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