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वेंटिलेटर तो हैं लेकिन चलाने को स्टाफ नहीं
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बदायूं। व्यवस्थाओं और चिकित्सा सुविधाओं के नाम पर राजकीय मेडिकल कॉलेज की स्थिति यह है कि अगर संक्रमितों को वेंटिलेटर की जरूरत होती है तो स्टाफ की कमी के कारण सुविधा नहीं मिल सकेगी। ऐसे में संक्रमितों की जान जाने का खतरा है। यहां 97 वेंटिलेटर है लेकिन हालत यह है कि स्टाफ बमुश्किल चार से पांच ही हैं। अगर जिले में गंभीर मरीज बढ़े तो हालत काफी बिगड़ जाएगी।
कोरोना संक्रमण की चपेट में आए ऐसे मरीज जिनमें संक्रमण के कारण सांस लेने की क्षमता नहीं रह जाती है। उनको वेंटिलेटर के जरूरत होती है। दरअसल, पहले मरीज को सामान्य ऑक्सीजन दी जाती है। यदि उसे फिर भी सांस लेने में दिक्कत होती है तो एचएफएनसी (हाईफ्लो नेजल कैनुला) और फिर वाईपैप का प्रयोग किया जाता है। यदि फिर भी हालत नहीं संभलती तो वेंटिलेटर का प्रयोग किया जाता है। इसे चलाने के लिए टेक्नीशियन की जरूरत होती है। राजकीय मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर तो हैं, लेकिन इनको चलाने के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं है। चूंकि वेंटिलेटर पर मरीजों की संख्या लगभग दर्जन भर है तो स्टाफ बदल-बदलकर जैसे तैसे काम चलाया जा रहा है। मौजूदा 97 वेंटिलेटर चलाने के लिए कॉलेज के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं है। एक के लिए डॉक्टर, स्टाफ नर्स व टेक्नीशियन की जरूरत होती है लेकिन यह आंकड़ा एक चौथाई ही बैठ रहा है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेज में एनेस्थेटिक्स से लेकर क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट, टेक्नीशियन तक की कमी है। खुद अधिकारी इस बात को दबी जुबान मानते हैं कि अगर वेंटिलेटर चलाने के लिए और टेक्नीशियन मिल जाएं तो काफी दिक्कतों का समाधान हो सकता है।
वेंटिलेटर पर लिए गए मरीजों की नहीं हो पा रही मॉनिटरिंग
कोरोना संक्रमण फिर से लगातार बढ़ता जा रहा है। दूसरी लहर में अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है। राजकीय मेडिकल कॉलेज में भी कई मरीज दम तोड़ चुके हैं। दरअसल, अगर किसी गंभीर को वेंटिलेटर पर लिया भी जाता है तो उसकी सही ढंग से मॉनिटरिंग जरूरी होती है, लेकिन स्टाफ के अभाव में यह नहीं हो पाती। क्रिटिकल स्पेशलिस्ट और टेक्नीशियन न होने के कारण लोगों की जान जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि स्टाफ के लिए लिखा गया है। डिमांड भेजी जा रही हैं। उपलब्ध संसाधनों के आधार पर वह संक्रमितों की जान बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।
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श्वसन तंत्र कमजोर होने पर मरीज को होती है वेंटिलेटर की जरूरत
श्वसन तंत्र की क्षमता कमजोर होने पर मरीज की जिंदगी बचाने के लिए उसे वेंटिलेटर पर लिया जाता है। वेंटिलेटर मिल भी जाए तो सबसे बड़ी समस्या उसकी मॉनिटरिंग की होती है। यह कार्य टेक्नीशियन करता है। डॉक्टरों के अनुसार सामान्य ऑक्सीजन व एचएफएनसी के प्रयोग में तो इतनी दिक्कत नहीं आती लेकिन वेंटिलेटर का उपयोग टेक्नीशियन ही अच्छे से कर सकते हैं।
उपलब्ध संसाधनों का पूरा इस्तेमाल किया जा रहा है। मरीजों को बेहतर इलाज मिले और वह स्वस्थ हों इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है। कॉलेज में इस समय पर्याप्त वेंटिलेटर हैं लेकिन स्टाफ की कमी के कारण पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं किया जा पा रहा। स्टाफ की मांग की गई है।
- डॉ. सीपी सिंह, सीएमएस राजकीय मेडिकल कॉलेज
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कोरोना संक्रमण की चपेट में आए ऐसे मरीज जिनमें संक्रमण के कारण सांस लेने की क्षमता नहीं रह जाती है। उनको वेंटिलेटर के जरूरत होती है। दरअसल, पहले मरीज को सामान्य ऑक्सीजन दी जाती है। यदि उसे फिर भी सांस लेने में दिक्कत होती है तो एचएफएनसी (हाईफ्लो नेजल कैनुला) और फिर वाईपैप का प्रयोग किया जाता है। यदि फिर भी हालत नहीं संभलती तो वेंटिलेटर का प्रयोग किया जाता है। इसे चलाने के लिए टेक्नीशियन की जरूरत होती है। राजकीय मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर तो हैं, लेकिन इनको चलाने के लिए पर्याप्त स्टाफ नहीं है। चूंकि वेंटिलेटर पर मरीजों की संख्या लगभग दर्जन भर है तो स्टाफ बदल-बदलकर जैसे तैसे काम चलाया जा रहा है। मौजूदा 97 वेंटिलेटर चलाने के लिए कॉलेज के पास पर्याप्त स्टाफ नहीं है। एक के लिए डॉक्टर, स्टाफ नर्स व टेक्नीशियन की जरूरत होती है लेकिन यह आंकड़ा एक चौथाई ही बैठ रहा है। इसके अलावा मेडिकल कॉलेज में एनेस्थेटिक्स से लेकर क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट, टेक्नीशियन तक की कमी है। खुद अधिकारी इस बात को दबी जुबान मानते हैं कि अगर वेंटिलेटर चलाने के लिए और टेक्नीशियन मिल जाएं तो काफी दिक्कतों का समाधान हो सकता है।
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वेंटिलेटर पर लिए गए मरीजों की नहीं हो पा रही मॉनिटरिंग
कोरोना संक्रमण फिर से लगातार बढ़ता जा रहा है। दूसरी लहर में अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है। राजकीय मेडिकल कॉलेज में भी कई मरीज दम तोड़ चुके हैं। दरअसल, अगर किसी गंभीर को वेंटिलेटर पर लिया भी जाता है तो उसकी सही ढंग से मॉनिटरिंग जरूरी होती है, लेकिन स्टाफ के अभाव में यह नहीं हो पाती। क्रिटिकल स्पेशलिस्ट और टेक्नीशियन न होने के कारण लोगों की जान जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि स्टाफ के लिए लिखा गया है। डिमांड भेजी जा रही हैं। उपलब्ध संसाधनों के आधार पर वह संक्रमितों की जान बचाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।
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श्वसन तंत्र कमजोर होने पर मरीज को होती है वेंटिलेटर की जरूरत
श्वसन तंत्र की क्षमता कमजोर होने पर मरीज की जिंदगी बचाने के लिए उसे वेंटिलेटर पर लिया जाता है। वेंटिलेटर मिल भी जाए तो सबसे बड़ी समस्या उसकी मॉनिटरिंग की होती है। यह कार्य टेक्नीशियन करता है। डॉक्टरों के अनुसार सामान्य ऑक्सीजन व एचएफएनसी के प्रयोग में तो इतनी दिक्कत नहीं आती लेकिन वेंटिलेटर का उपयोग टेक्नीशियन ही अच्छे से कर सकते हैं।
उपलब्ध संसाधनों का पूरा इस्तेमाल किया जा रहा है। मरीजों को बेहतर इलाज मिले और वह स्वस्थ हों इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है। कॉलेज में इस समय पर्याप्त वेंटिलेटर हैं लेकिन स्टाफ की कमी के कारण पूरी क्षमता से इस्तेमाल नहीं किया जा पा रहा। स्टाफ की मांग की गई है।
- डॉ. सीपी सिंह, सीएमएस राजकीय मेडिकल कॉलेज