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Bijnor News: आहुति के साथ गूंजने वाली स्वाह की ध्वनि से बना स्वाहेड़ी
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बिजनौर के गांव गढ़ी बगीची में माल देवता मठ के चबूतरे पर जैन कालीन मूर्तियां। संवाद (मेरा गांव क
- गजराैला-गढ़ी बगीची के बीच है माल देवता मठ
- स्वाहेड़ी क्षेत्र में प्राचीन काल में संचालित होता था गुरुकुल
मोहम्मद यूनुस
गजरौला शिव। गजरौला-गढ़ी बगीची के बीच प्राचीन माल देवता मठ ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रहा है। यहां कभी गुरुकुल संचालित होता था। प्रतिदिन हवन और यज्ञ हुआ करते थे। आहुति के समय गूंजने वाली स्वाह की ध्वनि से गांव का नाम स्वाहेड़ी पड़ा।
बिजनौर के राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रणय स्थली है। मालन नदी के किनारे कण्व ऋषि का आश्रम बड़े भूभाग पर फैला था। स्वाहेड़ी निवासी 90 वर्षीय राजाराम बताते हैं कि आसपास का क्षेत्र खांडव वन कहलाता था। नजीबाबाद से आगे कजरी वन कहलाता था। ऋषि-मुनियों का क्षेत्र अहिंसा क्षेत्र था। कोई भी जानवर हिंसक नहीं था। राजा दुष्यंत-शकुंतला को निशानी में अपनी अंगूठी खांडव वन में दे गए थे। गजरौला-गढ़ी बगीची के बीच स्थित माल देवता मठ के पास गुरुकुल संचालित था। शकुंतला के पुत्र भरत ने इसी आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। राजा भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
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यहां पर रखीं हैं खंडित मूर्तियां
मठ पर प्राचीन कालीन खंडित मूर्तियां भी रखी हैं। गढ़ी बगीची निवासी सोमदेव सिंह (70) बताते हैं कि जिंघाला गोत्र में जन्म लेने वाले प्रथम पुत्र का मुंडन संस्कार भी इसी आश्रम पर किया जाता है। मठ पर प्राचीन वटवृक्ष है। आश्रम की देखभाल गढ़ी बगीची के प्रधान सोमदेव सिंह कर रहे हैं। गजरौला शिव निवासी 70 वर्षीय महेश चंद्र बताते हैं कि वर्ष 1992 में कुछ लोग प्राचीन मूर्तियां कोटद्वार ले गए थे। कहा गया था कि इन मूर्तियों की पुरातत्व विभाग से जांच कराई जाएगी, लेकिन ये मूर्तियां वापस नहीं लाई गईं।
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जुताई करते समय मिला था अष्टधातु का लोटा
गांव के निवासी 87 वर्षीय सेठ जय नारायण सिंह बताते हैं कि लगभग 20 वर्ष पहले माल देवता मंदिर के पास खेतों की जुताई करते समय अष्टधातु का एक लोटा मिला था। यह लोटा प्रशासनिक अधिकारियों को दे दिया गया, जिसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। जब लोटे को खोला गया तो उसमें सोने के सिक्के निकले थे।
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- स्वाहेड़ी क्षेत्र में प्राचीन काल में संचालित होता था गुरुकुल
मोहम्मद यूनुस
गजरौला शिव। गजरौला-गढ़ी बगीची के बीच प्राचीन माल देवता मठ ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रहा है। यहां कभी गुरुकुल संचालित होता था। प्रतिदिन हवन और यज्ञ हुआ करते थे। आहुति के समय गूंजने वाली स्वाह की ध्वनि से गांव का नाम स्वाहेड़ी पड़ा।
बिजनौर के राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रणय स्थली है। मालन नदी के किनारे कण्व ऋषि का आश्रम बड़े भूभाग पर फैला था। स्वाहेड़ी निवासी 90 वर्षीय राजाराम बताते हैं कि आसपास का क्षेत्र खांडव वन कहलाता था। नजीबाबाद से आगे कजरी वन कहलाता था। ऋषि-मुनियों का क्षेत्र अहिंसा क्षेत्र था। कोई भी जानवर हिंसक नहीं था। राजा दुष्यंत-शकुंतला को निशानी में अपनी अंगूठी खांडव वन में दे गए थे। गजरौला-गढ़ी बगीची के बीच स्थित माल देवता मठ के पास गुरुकुल संचालित था। शकुंतला के पुत्र भरत ने इसी आश्रम में शिक्षा ग्रहण की थी। राजा भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
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यहां पर रखीं हैं खंडित मूर्तियां
मठ पर प्राचीन कालीन खंडित मूर्तियां भी रखी हैं। गढ़ी बगीची निवासी सोमदेव सिंह (70) बताते हैं कि जिंघाला गोत्र में जन्म लेने वाले प्रथम पुत्र का मुंडन संस्कार भी इसी आश्रम पर किया जाता है। मठ पर प्राचीन वटवृक्ष है। आश्रम की देखभाल गढ़ी बगीची के प्रधान सोमदेव सिंह कर रहे हैं। गजरौला शिव निवासी 70 वर्षीय महेश चंद्र बताते हैं कि वर्ष 1992 में कुछ लोग प्राचीन मूर्तियां कोटद्वार ले गए थे। कहा गया था कि इन मूर्तियों की पुरातत्व विभाग से जांच कराई जाएगी, लेकिन ये मूर्तियां वापस नहीं लाई गईं।
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जुताई करते समय मिला था अष्टधातु का लोटा
गांव के निवासी 87 वर्षीय सेठ जय नारायण सिंह बताते हैं कि लगभग 20 वर्ष पहले माल देवता मंदिर के पास खेतों की जुताई करते समय अष्टधातु का एक लोटा मिला था। यह लोटा प्रशासनिक अधिकारियों को दे दिया गया, जिसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया। जब लोटे को खोला गया तो उसमें सोने के सिक्के निकले थे।