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1915 में बिजनौर की भूमि पर आए थे महात्मा गांधी
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1915 में बिजनौर की भूमि पर आए थे महात्मा गांधी
कोतवाली देहात (बिजनौर)। महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध छेड़े गए आंदोलन में बिजनौर की भूमि से आर्थिक सहायता प्राप्त हुई थी। महात्मा गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद बिजनौर की भूमि पर आए थे।
जनपद के इतिहास के जानकार ग्राम फीना निवासी हेमंत कुमार बताते हैं कि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध आंदोलन खड़ा कर दिया था। आंदोलन चलाने के लिए उन्हें धन की भी आवश्यकता रहती थी। ऐसे में गोपाल कृष्ण गोखले ने कई स्थानों पर गांधीजी के लिए आर्थिक सहयोग का आह्वान किया था। तत्कालीन समय में बिजनौर की भूमि पर स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विद्यालय के ब्रह्मचारियों तथा छात्रों ने गाँधी जी के लिए अपने घी और दूध की खपत को कम करके पैसे बचाए। इसके अतिरिक्त गंगा पर बन रहे एक बांध पर इन लोगों ने मजदूरी की और उससे प्राप्त 1500 रुपये की धनराशि गांधी जी को भेजी थी। इसके लिए गांधी जी ने गुरुकुल कांगड़ी के शिक्षकों तथा छात्रों का पत्र लिखकर आभार व्यक्त किया था।
गुरुकुल कांगड़ी में हुआ था महात्मा गांधी का सम्मान
जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुशील त्यागी बताते हैं कि महात्मा गांधी फिनिक्स जैसा एक आश्रम भारत में भी खोलना चाहते थे। उनके साथ कुछ छात्र दक्षिण अफ्रीका से भी आए थे। उन्हें ठहराने की व्यवस्था के लिए महात्मा गांधी ने दीनबंधु एंड्रयूज से कहा था। दीनबंधु एंड्रयूज के परामर्श पर महात्मा गांधी काफी बच्चों को लेकर गुरुकुल कांगड़ी पहुंचे थे, जो कई महीनों तक गुरुकुल कांगड़ी में ही रहे थे। 8 अप्रैल 1915 को गुरुकुल कांगड़ी में महात्मा गांधी का सम्मान किया गया था। उसी सम्मान समारोह में गांधी जी को स्वामी श्रद्धानंद ने महात्मा कहकर संबोधित किया था। महात्मा गांधी तीन बार गुरुकुल कांगड़ी में आए।
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कोतवाली देहात (बिजनौर)। महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध छेड़े गए आंदोलन में बिजनौर की भूमि से आर्थिक सहायता प्राप्त हुई थी। महात्मा गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद बिजनौर की भूमि पर आए थे।
जनपद के इतिहास के जानकार ग्राम फीना निवासी हेमंत कुमार बताते हैं कि महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध आंदोलन खड़ा कर दिया था। आंदोलन चलाने के लिए उन्हें धन की भी आवश्यकता रहती थी। ऐसे में गोपाल कृष्ण गोखले ने कई स्थानों पर गांधीजी के लिए आर्थिक सहयोग का आह्वान किया था। तत्कालीन समय में बिजनौर की भूमि पर स्थापित गुरुकुल कांगड़ी विद्यालय के ब्रह्मचारियों तथा छात्रों ने गाँधी जी के लिए अपने घी और दूध की खपत को कम करके पैसे बचाए। इसके अतिरिक्त गंगा पर बन रहे एक बांध पर इन लोगों ने मजदूरी की और उससे प्राप्त 1500 रुपये की धनराशि गांधी जी को भेजी थी। इसके लिए गांधी जी ने गुरुकुल कांगड़ी के शिक्षकों तथा छात्रों का पत्र लिखकर आभार व्यक्त किया था।
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गुरुकुल कांगड़ी में हुआ था महात्मा गांधी का सम्मान
जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डा. सुशील त्यागी बताते हैं कि महात्मा गांधी फिनिक्स जैसा एक आश्रम भारत में भी खोलना चाहते थे। उनके साथ कुछ छात्र दक्षिण अफ्रीका से भी आए थे। उन्हें ठहराने की व्यवस्था के लिए महात्मा गांधी ने दीनबंधु एंड्रयूज से कहा था। दीनबंधु एंड्रयूज के परामर्श पर महात्मा गांधी काफी बच्चों को लेकर गुरुकुल कांगड़ी पहुंचे थे, जो कई महीनों तक गुरुकुल कांगड़ी में ही रहे थे। 8 अप्रैल 1915 को गुरुकुल कांगड़ी में महात्मा गांधी का सम्मान किया गया था। उसी सम्मान समारोह में गांधी जी को स्वामी श्रद्धानंद ने महात्मा कहकर संबोधित किया था। महात्मा गांधी तीन बार गुरुकुल कांगड़ी में आए।
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