{"_id":"5f55274a8ebc3e6a0a7c5f19","slug":"bumper-production-of-fish-in-low-cost-bijnor-news-mrt5000076143","type":"story","status":"publish","title_hn":"कम लागत में मछलियों का बंपर उत्पादन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कम लागत में मछलियों का बंपर उत्पादन
विज्ञापन
कम लागत में मछलियों का बंपर उत्पादन
बिजनौर। बायो फ्लोक विधि से किया जा रहा मछली पालन जिले में सफल हो गया है। एक किसान ने बायो फलोक विधि में बैक्टीरिया की मदद से अपने 350 फीट के प्लॉट में साढ़े छह बीघा से अधिक जमीन के तालाब के बराबर आमदनी की है। जिले में बाकी किसान भी बायो फ्लोक विधि से मछली पालन करने की योजना बना रहे हैं।
पहले किसान तालाब में मत्स्य पालन करते थे। अब बायो फ्लोक एक नया जमीन का नया विकल्प बनकर सामने आया है। बायो फ्लोक विधि में मछलियों को तालाब के बदले प्लास्टिक के जार में पाला जाता है। जार में मछली पालने में पानी कम लगता है और इसमें उत्पादन भी अधिक होता है। गांव रामठेरा निवासी किसान विजेंद्र चौहान ने इसकी शुरूआत की। उन्होंने अपनी 350 फीट गज के प्लॉट में मछली पालने के लिए चार जार लगाए। हर जार में दो बार मछलियां पालीं। इन्हें दो बार में बेचा। केवल 350 फीट जमीन से उन्होंने साढ़े छह लाख रुपये कमाए। जबकि इतनी आमदनी तालाब से करनी हो तो करीब साढ़े छह बीघा जमीन में तालाब बनाना होगा।
इस वजह से उत्पादन ज्यादा
बायो फ्लोक विधि में आमदनी का मुख्य स्रोत बैक्टीरिया हैं। इस विधि में बैक्टीरिया को पानी में डाला जाता है। बैक्टीरिया मछली की पानी में किए गए मल को प्रोटीन में बदल देते हैं। मछली इस प्रोटीन को खाती हैं। तालाबों में भी बैक्टीरिया डाला जाता है लेकिन वहां मिट्टी के खुद के केमिकल के कारण ये ज्यादा असरदार नहीं होते। तालाब में मछली पानी में मिली ऑक्सीजन पर ही निर्भर होती है। जबकि बायो फ्लोक विधि में मछलियों के लिए मशीन से ऑक्सीजन दिलाई जाती है। जार गोल होते हैं। मछलियां इसमें गोल घूमती रहती हैं। उन्हें लगता है कि जार बहुत बड़ा है। साफ पानी, अधिक खुराक, ऑक्सीजन व मनोवैज्ञानिक दशा अच्छी होने से उनकी वृद्धि जल्दी होती है।
विज्ञापन
यह है लाभ का गणित
एक हेक्टेयर के तालाब में मछली के करीब 14 हजार बच्चे पाले जाते हैं। इनसे करीब 12 हजार किलो मछली मिलती है। विजेंद्र सिंह ने बायो फ्लोक विधि में एक जार में 1400 बच्चे डाले। चार जार में 5600 बच्चे डाले। छह महीने में हर मछली का वजन औसतन 600 ग्राम हुआ तो उन्हें बेच दिया। एक जार से छह महीने बाद 840 किलोग्राम और चार जार से तीन हजार क्विंटल से अधिक मछली मिलीं। दोबारा मछली डालकर छह महीने में उन्हें बेच दिया। एक साल में कुल करीब 6500 किलोग्राम मछली बेची। मछली 100 रुपये प्रति किलोग्राम बिकीं। तालाब में एक मछली को एक साल में औसतन डेढ़ किलो चारा देना होता है जबकि बायो फ्लोक में औसतन 800 ग्राम चारा दिया जाता है। यह उत्पादन एक एक हेक्टेयर में किया जाए तो मछली उत्पादन सामान्य के मुकाबले 15 गुना होगा।
पानी की बहुत बचत
प्रभारी जिला मत्स्य अधिकारी सतेंद्र कुमार के अनुसार बायो फ्लोक विधि में पानी की भी बहुत बचत होती है। तालाब मेें गर्मियों में रोज पानी भरा जाता है। जबकि बायो फ्लोक विधि में जार में केवल एक प्रतिशत पानी बदला जाता है। मछलियों के मल से प्रोटीन बनने की वजह से पानी जहरीला नहीं होता है।
तकनीक से कर रहे जागरूक
किसान विजेंद्र चौहान के अनुसार वे बाकी किसानों को भी बायो फ्लोक विधि अपनाने को प्रेरित कर रहे हैं। किसान http://modernagricultureplanet.com पर इस विधि के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
आमदनी बढ़ाएं किसान
प्रभारी उपकृषि निदेशक अवधेश मिश्र के अनुुसार किसान मछली पालन, शहद के लिए मधुमक्खी पालन भी करें। किसान व्यावसायिक खेती कर अपनी आमदनी बढ़ाएं। इसे नीली क्रांति कहा गया है।
विज्ञापन
बिजनौर। बायो फ्लोक विधि से किया जा रहा मछली पालन जिले में सफल हो गया है। एक किसान ने बायो फलोक विधि में बैक्टीरिया की मदद से अपने 350 फीट के प्लॉट में साढ़े छह बीघा से अधिक जमीन के तालाब के बराबर आमदनी की है। जिले में बाकी किसान भी बायो फ्लोक विधि से मछली पालन करने की योजना बना रहे हैं।
पहले किसान तालाब में मत्स्य पालन करते थे। अब बायो फ्लोक एक नया जमीन का नया विकल्प बनकर सामने आया है। बायो फ्लोक विधि में मछलियों को तालाब के बदले प्लास्टिक के जार में पाला जाता है। जार में मछली पालने में पानी कम लगता है और इसमें उत्पादन भी अधिक होता है। गांव रामठेरा निवासी किसान विजेंद्र चौहान ने इसकी शुरूआत की। उन्होंने अपनी 350 फीट गज के प्लॉट में मछली पालने के लिए चार जार लगाए। हर जार में दो बार मछलियां पालीं। इन्हें दो बार में बेचा। केवल 350 फीट जमीन से उन्होंने साढ़े छह लाख रुपये कमाए। जबकि इतनी आमदनी तालाब से करनी हो तो करीब साढ़े छह बीघा जमीन में तालाब बनाना होगा।
विज्ञापन
इस वजह से उत्पादन ज्यादा
बायो फ्लोक विधि में आमदनी का मुख्य स्रोत बैक्टीरिया हैं। इस विधि में बैक्टीरिया को पानी में डाला जाता है। बैक्टीरिया मछली की पानी में किए गए मल को प्रोटीन में बदल देते हैं। मछली इस प्रोटीन को खाती हैं। तालाबों में भी बैक्टीरिया डाला जाता है लेकिन वहां मिट्टी के खुद के केमिकल के कारण ये ज्यादा असरदार नहीं होते। तालाब में मछली पानी में मिली ऑक्सीजन पर ही निर्भर होती है। जबकि बायो फ्लोक विधि में मछलियों के लिए मशीन से ऑक्सीजन दिलाई जाती है। जार गोल होते हैं। मछलियां इसमें गोल घूमती रहती हैं। उन्हें लगता है कि जार बहुत बड़ा है। साफ पानी, अधिक खुराक, ऑक्सीजन व मनोवैज्ञानिक दशा अच्छी होने से उनकी वृद्धि जल्दी होती है।
विज्ञापन
यह है लाभ का गणित
एक हेक्टेयर के तालाब में मछली के करीब 14 हजार बच्चे पाले जाते हैं। इनसे करीब 12 हजार किलो मछली मिलती है। विजेंद्र सिंह ने बायो फ्लोक विधि में एक जार में 1400 बच्चे डाले। चार जार में 5600 बच्चे डाले। छह महीने में हर मछली का वजन औसतन 600 ग्राम हुआ तो उन्हें बेच दिया। एक जार से छह महीने बाद 840 किलोग्राम और चार जार से तीन हजार क्विंटल से अधिक मछली मिलीं। दोबारा मछली डालकर छह महीने में उन्हें बेच दिया। एक साल में कुल करीब 6500 किलोग्राम मछली बेची। मछली 100 रुपये प्रति किलोग्राम बिकीं। तालाब में एक मछली को एक साल में औसतन डेढ़ किलो चारा देना होता है जबकि बायो फ्लोक में औसतन 800 ग्राम चारा दिया जाता है। यह उत्पादन एक एक हेक्टेयर में किया जाए तो मछली उत्पादन सामान्य के मुकाबले 15 गुना होगा।
पानी की बहुत बचत
प्रभारी जिला मत्स्य अधिकारी सतेंद्र कुमार के अनुसार बायो फ्लोक विधि में पानी की भी बहुत बचत होती है। तालाब मेें गर्मियों में रोज पानी भरा जाता है। जबकि बायो फ्लोक विधि में जार में केवल एक प्रतिशत पानी बदला जाता है। मछलियों के मल से प्रोटीन बनने की वजह से पानी जहरीला नहीं होता है।
तकनीक से कर रहे जागरूक
किसान विजेंद्र चौहान के अनुसार वे बाकी किसानों को भी बायो फ्लोक विधि अपनाने को प्रेरित कर रहे हैं। किसान http://modernagricultureplanet.com पर इस विधि के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
आमदनी बढ़ाएं किसान
प्रभारी उपकृषि निदेशक अवधेश मिश्र के अनुुसार किसान मछली पालन, शहद के लिए मधुमक्खी पालन भी करें। किसान व्यावसायिक खेती कर अपनी आमदनी बढ़ाएं। इसे नीली क्रांति कहा गया है।