...मीठा-मीठा दर्द है ये कैसी तेरी याद है

Bijnor Updated Fri, 19 Oct 2012 12:00 PM IST
धामपुर। उर्दू फोरम के तत्वावधान में बुधवार रात अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सैय्यद अहमद खान के जन्मदिन पर एक मुशायरे का आयोजन हुआ। श्रोताओं ने महिला शायरों की शायरी पर जमकर दाद दी।
बंदूकचियान स्थित मदरसा इस्लामिया अरबिया जूनियर हाईस्कूल में मुशायरे की शुरुआत असलम बकाई अमरोहवी ने नाते पाक से की। शायरा खुशबू रामपुरी ने कहा ...पाल कर जिसने किया था अपने बच्चों को जवां, घर से बाहर याद आज उसी मां का बिस्तर आ गया। मेहनाज स्योहारवी ने कहा ...तेरी खुशबू से मेरे दिल का चमन आबाद है, मीठा मीठा दर्द है ये कैसी तेरी याद है। शुएब जमाल मुजफ्फर नगरी ने कहा ...लहूलुहान अपने सब्र का सूरज, हम उसके वादाें की शामाें सहर में रहे। महमूद असर ने पढ़ा ...ताज और तख्त की देती है दुआएं मुझको, मेरी मां ने मुझको सुल्तान बना रखा है। हिलाल बिसौलवी ने कहा ...मैं उसकी हार तो बर्दाश्त कर नहीं सकता, खुदाया मेरे ही हिस्से में मात लिख देना। नदीम ककरालवी ने कहा ...बाहर का हर एक जख्म नजर आता है सबको, जो जख्म है दिल पर वो दिखाए नहीं जाते। मुशायरे में बरकत हॉल्ट सहारनपुरी, शरीफ अख्तर मुम्बई, यासीन जकी, नसीम धामपुरी, राशिद हमीदी, अकबर दीवाना, नौशाद आलम शाद अलीग आदि ने अपने कलामों से नवाजा। मुशायरे की अध्यक्षता डा. आफताब अहमद ने और संचालन इरशाद धामपुरी ने किया। इससे पूर्व मुशायरे का उद्घाटन मौलाना सिराजुददीन नदवी और पालिकाध्यक्ष महमूद हसन कस्सार ने शमां रोशन कर किया। उर्दू फोरम के अध्यक्ष डा. कमाल अहमद ने सैय्यद अहमद के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला।
जाते ही उसके टूट गया साज-ए-जिंदगी...
नजीबाबाद। सैयद अहमद खां की याद में मुशायरे में शायरों ने कलाम पेश कर श्रोताओं की वाहवाही लूटी।
अख्तरूल इमान की ओर से मुहल्ला मुगलशाह में हुए मुशायरा मौसूफ अहमद की नात-ए-पाक से शुरू हुआ। मुशायरे में महेंद्र अश्क की नज्म... मैं आफताब था परछाइयों में डूब गया/मैं जात-पात की गहराइयों में डूब गया... को जमकर सराहा गया। डॉ. आफताब नोमानी के कलाम तेरी तरह से हर एक फर्द को जाना होगा/याद बनकर हर एक दिल में समाने वाले..., शारिक कफील के कलाम जाते ही उसके टूट गया साज-ए-जिंदगी/जब तक वो मेरे पास रहा जिंदगी रही..., सुहेल शहाब के कलाम मैं अपनी सुबह से पहले नजर नहीं आऊंगा/मैं आफताब मुझे रात भर तलाश करो..., मौसूफ वासिफ के कलाम इन चिरागों में रोशनी कम है/रात लंबी है जिंदगी कम है... तथा फरहत सागर के कलाम तुम्हारे दिल का सुकून व करार हम भी हैं/तुम्हारे वास्ते अब बेकरार हम भी हैं... ने भी वाहवाही लूटी। कार्यक्रम में मुअज्जम खां ने कहा कि सैयद अहमद खां शिक्षा की शमा रोशन करते रहे। शारिक कफील के संचालन में हुए मुशायरे में शेर हुसैन उर्फी, डॉ.साबिर गमगीन, अ.हई सबा, एसए रज़ा व शहंशाह बिजनौरी के कलाम भी सराहे गए।

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