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हार के कारण खंगालने में जुटे दल
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ज्ञानपुर। लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद सपा-बसपा और अन्य विपक्षी दल हार के कारणों को खंगालने में जुट गए हैं। बेस वोट के बूते संसद पहुंचने का सपना देख रहीं विपक्षी पार्टियों ने गठबंधन के बाद भी जीत के जादुई आंकड़े तक न पहुंच पाने के पीछे की ‘चूक’ को तलाशने में माथापच्ची शुरू कर दी है। जिस काडर वोट को अपनी स्थायी पूंजी मान कर सपा और बसपा ने गठबंधन किया था, नतीजे आने के बाद उसमें भी सेंध लगी देखकर दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की पेशानी पर बल पड़ गया है। 2014 में सपा और बसपा को मिले वोट की तुलना में इस चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को लगभग 28 हजार वोट कम मिले हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में भदोही सीट पर सपा और बसपा प्रत्याशियों को मिला कर कुल 494266 वोट मिले थे। सेकंड रनरअप रहे बसपा के राकेशधर त्रिपाठी को 255554 वोट और तीसरे स्थान पर रहीं सीमा मिश्रा को 238712 वोट मिले थे, लेकिन इस बार गठबंधन प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र को 466414 वोट ही मिले। यानी कि 27852 वोट कम। मसलन फिक्स वोटबैंक में भी सेंधमारी हो गई। जबकि इस बार वोटरों की तादाद में लगभग एक लाख की बढ़ोतरी भी हुई थी। अगर पिछले आम चुनाव के दोनों दलों के वोट जुड़ जाते और इस बार बढ़े मतों का कुछ हिस्सा गठबंधन प्रत्याशी के खाते में आ जाता तो जीत पक्की थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और गणित फेल हो गई। तो फिर चूक कहां हुई, इस सवाल के जवाब में बसपा के जिलाध्यक्ष राजेश गौतम कहते हैं कि इस बार के नतीजे से हम चकित हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि गड़बड़ी कहां हो गई। सारे पहलू पर लंबे विचार मंथन के बाद प्रत्याशी का चयन किया गया था। इसके बावजूद अपेक्षाकृत नतीजे नहीं आए। हालांकि हार की समीक्षा की जा रही है। कमजोर बिंदुओं को खंगाल कर दुरुस्त किया जाएगा। सपा जिलाध्यक्ष मो. आरिफ सिद्दीकी कहते हैं कि ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं थी। फिर भी लोकतंत्र में जो जनादेश मिला है उसका स्वागत करते हुए तैयारी में कहां कमी रह गई, उसे ढूंढ़ा जा रहा है। सपा के कार्यकर्ता बहादुर हैं। वे संघर्ष करके पार्टी को यहां तक पहुंचाए हैं। यह नतीजे शायद यह संकेत देते हैं कि संघर्ष और शिद्दत से करने की जरूरत है। हम जनहित के मुद्दे पर और भी ज्यादा संघर्ष करेंगे और जनता के दिलों में जगह बनाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के उस वक्तव्य का हवाला दिया कि- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।
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2014 के लोकसभा चुनाव में भदोही सीट पर सपा और बसपा प्रत्याशियों को मिला कर कुल 494266 वोट मिले थे। सेकंड रनरअप रहे बसपा के राकेशधर त्रिपाठी को 255554 वोट और तीसरे स्थान पर रहीं सीमा मिश्रा को 238712 वोट मिले थे, लेकिन इस बार गठबंधन प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र को 466414 वोट ही मिले। यानी कि 27852 वोट कम। मसलन फिक्स वोटबैंक में भी सेंधमारी हो गई। जबकि इस बार वोटरों की तादाद में लगभग एक लाख की बढ़ोतरी भी हुई थी। अगर पिछले आम चुनाव के दोनों दलों के वोट जुड़ जाते और इस बार बढ़े मतों का कुछ हिस्सा गठबंधन प्रत्याशी के खाते में आ जाता तो जीत पक्की थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और गणित फेल हो गई। तो फिर चूक कहां हुई, इस सवाल के जवाब में बसपा के जिलाध्यक्ष राजेश गौतम कहते हैं कि इस बार के नतीजे से हम चकित हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि गड़बड़ी कहां हो गई। सारे पहलू पर लंबे विचार मंथन के बाद प्रत्याशी का चयन किया गया था। इसके बावजूद अपेक्षाकृत नतीजे नहीं आए। हालांकि हार की समीक्षा की जा रही है। कमजोर बिंदुओं को खंगाल कर दुरुस्त किया जाएगा। सपा जिलाध्यक्ष मो. आरिफ सिद्दीकी कहते हैं कि ऐसे नतीजे की उम्मीद नहीं थी। फिर भी लोकतंत्र में जो जनादेश मिला है उसका स्वागत करते हुए तैयारी में कहां कमी रह गई, उसे ढूंढ़ा जा रहा है। सपा के कार्यकर्ता बहादुर हैं। वे संघर्ष करके पार्टी को यहां तक पहुंचाए हैं। यह नतीजे शायद यह संकेत देते हैं कि संघर्ष और शिद्दत से करने की जरूरत है। हम जनहित के मुद्दे पर और भी ज्यादा संघर्ष करेंगे और जनता के दिलों में जगह बनाने का प्रयास करेंगे। उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के उस वक्तव्य का हवाला दिया कि- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।
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