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इंडिया कारपेट एक्सपो दूसरा दिन
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भदोही। ओखला (नई दिल्ली) के एनएसआईसी एग्जीबिशन कांप्लेक्स में चल रहे 37वें इंडिया कारपेट एक्सपो के दूसरे दिन तक कुल 233 विदेशी आयातकों ने अपनी आमद दर्ज करा दी। आयोजक कालीन निर्यात संवर्धन परिषद (सीईपीसी) के दावों को मानें तो फेयर अपने उद्देश्यों की पूर्ति करता प्रतीत हो रहा है। प्रथम दिन के मुकाबले दूसरे दिन मेला क्षेत्र में मौजूदगी अच्छी रही। जिसमें विभिन्न देशों के आयातकों ने हमारे प्रदर्शकों के कालीनों में रुचि दिखाई और पूछताछ किए।
उधर सोमवार को उद्योग भवन में सीईपीसी प्रतिनिधियों की केंद्रीय कपड़ा सचिव राघवेंद्र सिंह के साथ बैठक हुई जिसमें कालीन उद्योग को भी राज्य करों में छूट की सूची में शामिल करने की बात रखी गई। चेयरमैन महावीर प्रताप शर्मा ने बताया कि अब तक टाऊन आफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस का लाभ नहीं मिल सका है। हाल हीं के वर्षों में वाणिज्य मंत्रालय ने ड्रा बैक की दरें काफी घटा दी है जिससे मझोले निर्यातकों पर व्यापक असर पड़ रहा है।
परिषद की ओर से बताया गया कि कालीन उद्योग धीरे धीरे देश के दूसरे प्रांतों में भी फैल रहा है। इसके लाभ का दायरा भी बढ़ रहा है। लगभग 20 लाख बुनकरों, मजदूरों को रोजगार मिल रहा है जिनमें महिलाओं की संख्या भी उल्लेखनीय है। रियायतें मिलने से और रोजगार पैदा होंगे। बताया कि एक्सपो में देश भर के 226 कालीन निर्माता अपने उत्पाद का प्रदर्शन कर रहे हैं। सचिव के साथ बैठक में विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) शांतमनु और ईडी संजय कुमार भी थे।
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एक्सपो पर मंदी की मार, सस्ते कालीन ढूंढते रहे खरीदार
भदोही। विश्व बाजार में मंदी का असर इंडिया कारपेट एक्सपो पर देखने को मिल रहा है। एक्सपो में भाग ले रहे निर्यातकों की मानें तो फेयर में कम आयातक पहुंचे हैं। कम से दो दिन के फेयर से तो लोगों का यही आंकलन है। ओपी कारपेट के डीपी गुप्ता ने कहा कि तमाम जद्दोजहद के बाद भी कम लोगों का आना यह दर्शाता है कि वैश्विक बाजार मंदी के चपेट में है। कहा कि विश्व में भारत के हस्तनिर्मित कालीनों की प्रसंशा होती है लेकिन महंगे होने के चलते उसकी मांग धीरे धीरे घट रही है। अब लोग लुभावने सैगी, दरी, हैंडलूम, टफ्टेड कालीनों को पसंद कर रहे हैं। बताया कि आयातकों की कम आमद से भी धक्का लगा है। इस परिस्थिति से संघर्ष करने के लिए भारत सरकार को उद्योग और इसमें लगे बुनकरों के लिए आगे आना होगा।
काका ओवरसीज लि. के वाईके राय काका ने बताया कि फेयर में जो भी खरीदार आए हैं उन्होंने स्टालों पर पूछताछ किए। लेकिन, चीन जिससे आज भारत की प्रतिस्पर्धा है उसके कालीन हमारे कालीनों से सस्ते हैं। कहा कि चीन के मशीन मेड कालीनों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय कालीनों की चीन की तर्ज पर ब्रांडिंग होनी चाहिए।
उधर सोमवार को उद्योग भवन में सीईपीसी प्रतिनिधियों की केंद्रीय कपड़ा सचिव राघवेंद्र सिंह के साथ बैठक हुई जिसमें कालीन उद्योग को भी राज्य करों में छूट की सूची में शामिल करने की बात रखी गई। चेयरमैन महावीर प्रताप शर्मा ने बताया कि अब तक टाऊन आफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस का लाभ नहीं मिल सका है। हाल हीं के वर्षों में वाणिज्य मंत्रालय ने ड्रा बैक की दरें काफी घटा दी है जिससे मझोले निर्यातकों पर व्यापक असर पड़ रहा है।
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परिषद की ओर से बताया गया कि कालीन उद्योग धीरे धीरे देश के दूसरे प्रांतों में भी फैल रहा है। इसके लाभ का दायरा भी बढ़ रहा है। लगभग 20 लाख बुनकरों, मजदूरों को रोजगार मिल रहा है जिनमें महिलाओं की संख्या भी उल्लेखनीय है। रियायतें मिलने से और रोजगार पैदा होंगे। बताया कि एक्सपो में देश भर के 226 कालीन निर्माता अपने उत्पाद का प्रदर्शन कर रहे हैं। सचिव के साथ बैठक में विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) शांतमनु और ईडी संजय कुमार भी थे।
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एक्सपो पर मंदी की मार, सस्ते कालीन ढूंढते रहे खरीदार
भदोही। विश्व बाजार में मंदी का असर इंडिया कारपेट एक्सपो पर देखने को मिल रहा है। एक्सपो में भाग ले रहे निर्यातकों की मानें तो फेयर में कम आयातक पहुंचे हैं। कम से दो दिन के फेयर से तो लोगों का यही आंकलन है। ओपी कारपेट के डीपी गुप्ता ने कहा कि तमाम जद्दोजहद के बाद भी कम लोगों का आना यह दर्शाता है कि वैश्विक बाजार मंदी के चपेट में है। कहा कि विश्व में भारत के हस्तनिर्मित कालीनों की प्रसंशा होती है लेकिन महंगे होने के चलते उसकी मांग धीरे धीरे घट रही है। अब लोग लुभावने सैगी, दरी, हैंडलूम, टफ्टेड कालीनों को पसंद कर रहे हैं। बताया कि आयातकों की कम आमद से भी धक्का लगा है। इस परिस्थिति से संघर्ष करने के लिए भारत सरकार को उद्योग और इसमें लगे बुनकरों के लिए आगे आना होगा।
काका ओवरसीज लि. के वाईके राय काका ने बताया कि फेयर में जो भी खरीदार आए हैं उन्होंने स्टालों पर पूछताछ किए। लेकिन, चीन जिससे आज भारत की प्रतिस्पर्धा है उसके कालीन हमारे कालीनों से सस्ते हैं। कहा कि चीन के मशीन मेड कालीनों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय कालीनों की चीन की तर्ज पर ब्रांडिंग होनी चाहिए।