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Basti News: चीन की झालरों के आगे फीकी पड़ी मिट्टी के दीयों की लौ, कुम्हारों की घट रही कमाई
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नगर बाजार। दिवाली पर घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों की मांग घटने से क्षेत्र के कुम्हारों की चिंता बढ़ गई है। बाजार में चीन निर्मित झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों की बढ़ती बिक्री का असर उनके पुश्तैनी कारोबार पर पड़ रहा है। मिट्टी, लकड़ी और उपलों की लागत बढ़ने के बावजूद उन्हें उत्पादों का वाजिब दाम नहीं मिल रहा है। दिन-रात मेहनत करने वाले कुम्हारों के सामने परिवार का खर्च चलाना चुनौती बनता जा रहा है।
क्षेत्र के रामसेवक, रामधनी, श्यामधर, पिंटू, रवींद्र और रवि प्रजापति समेत कई कुम्हार परिवार पिछले दो महीने से दिवाली की तैयारी में जुटे हैं। वे मिट्टी के दीये, मटके, कुल्हड़, जाता, कोहनी, गुल्लक और हाथी-घोड़े जैसे खिलौने तैयार कर रहे हैं। इसके बावजूद बाजार में उन्हें मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल रही है।
पांच से छह दिन में तैयार होती है एक खेप
मिट्टी के बर्तन और दीये तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत भरी है। कुम्हार खेतों और तालाबों के किनारे से चिकनी काली मिट्टी लाते हैं। इसे दो से तीन दिन तक पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद गूंथकर मुलायम बनाया जाता है और मजबूती के लिए राख मिलाई जाती है। फिर चाक पर दीये, कुल्हड़, मटके और अन्य बर्तनों को आकार दिया जाता है। एक कारीगर दिनभर में करीब एक हजार से 1,500 दीये बना लेता है। कच्चे दीयों को दो से तीन दिन तक धूप में सुखाने के बाद आंवा यानी भट्ठी में पकाया जाता है। उपलों और लकड़ी की मदद से आठ से दस घंटे तक तेज आंच में पकाने पर दीये तैयार होते हैं। इस प्रकार दीयों की एक खेप तैयार करने में करीब पांच से छह दिन लग जाते हैं।
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मेहनत वही, लेकिन कमाई घट गई
रामजगत ने बताया कि उनके परिवार में कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम हो रहा है। पहले दिवाली पर दीयों की खूब मांग रहती थी और लोग बड़ी मात्रा में खरीदकर ले जाते थे। अब लागत बढ़ गई है, लेकिन कीमत नहीं बढ़ रही। बाजार में 20 रुपये में 10 दीये बेचने पड़ रहे हैं। रामगरीब ने बताया कि चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों की वजह से मिट्टी के दीयों की मांग कम हुई है। लोग चमकदार झालर खरीद लेते हैं। पारंपरिक दीयों की ओर रुझान कम हो रहा है। इससे स्थानीय कारीगरों की आजीविका पर असर पड़ रहा है। रामशबद के मुताबिक, इस काम में मेहनत अधिक और आमदनी कम होने के कारण नई पीढ़ी के युवा इससे जुड़ना नहीं चाहते। इसके बावजूद कुम्हार परिवार परंपरागत हुनर को बचाने के लिए जुटे हैं। कुम्हारों ने मिट्टी के दीयों और बर्तनों की बिक्री बढ़ाने के लिए स्थानीय बाजारों, मेलों और सरकारी प्रदर्शनियों में जगह देने की मांग की है।
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क्षेत्र के रामसेवक, रामधनी, श्यामधर, पिंटू, रवींद्र और रवि प्रजापति समेत कई कुम्हार परिवार पिछले दो महीने से दिवाली की तैयारी में जुटे हैं। वे मिट्टी के दीये, मटके, कुल्हड़, जाता, कोहनी, गुल्लक और हाथी-घोड़े जैसे खिलौने तैयार कर रहे हैं। इसके बावजूद बाजार में उन्हें मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल रही है।
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पांच से छह दिन में तैयार होती है एक खेप
मिट्टी के बर्तन और दीये तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत भरी है। कुम्हार खेतों और तालाबों के किनारे से चिकनी काली मिट्टी लाते हैं। इसे दो से तीन दिन तक पानी में भिगोकर रखा जाता है। इसके बाद गूंथकर मुलायम बनाया जाता है और मजबूती के लिए राख मिलाई जाती है। फिर चाक पर दीये, कुल्हड़, मटके और अन्य बर्तनों को आकार दिया जाता है। एक कारीगर दिनभर में करीब एक हजार से 1,500 दीये बना लेता है। कच्चे दीयों को दो से तीन दिन तक धूप में सुखाने के बाद आंवा यानी भट्ठी में पकाया जाता है। उपलों और लकड़ी की मदद से आठ से दस घंटे तक तेज आंच में पकाने पर दीये तैयार होते हैं। इस प्रकार दीयों की एक खेप तैयार करने में करीब पांच से छह दिन लग जाते हैं।
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मेहनत वही, लेकिन कमाई घट गई
रामजगत ने बताया कि उनके परिवार में कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन बनाने का काम हो रहा है। पहले दिवाली पर दीयों की खूब मांग रहती थी और लोग बड़ी मात्रा में खरीदकर ले जाते थे। अब लागत बढ़ गई है, लेकिन कीमत नहीं बढ़ रही। बाजार में 20 रुपये में 10 दीये बेचने पड़ रहे हैं। रामगरीब ने बताया कि चाइनीज झालरों और इलेक्ट्रिक लाइटों की वजह से मिट्टी के दीयों की मांग कम हुई है। लोग चमकदार झालर खरीद लेते हैं। पारंपरिक दीयों की ओर रुझान कम हो रहा है। इससे स्थानीय कारीगरों की आजीविका पर असर पड़ रहा है। रामशबद के मुताबिक, इस काम में मेहनत अधिक और आमदनी कम होने के कारण नई पीढ़ी के युवा इससे जुड़ना नहीं चाहते। इसके बावजूद कुम्हार परिवार परंपरागत हुनर को बचाने के लिए जुटे हैं। कुम्हारों ने मिट्टी के दीयों और बर्तनों की बिक्री बढ़ाने के लिए स्थानीय बाजारों, मेलों और सरकारी प्रदर्शनियों में जगह देने की मांग की है।