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साइड स्टोरी.... रायफल रवां न दुरुस्त दस्तावेज,फिर भी ठांय-ठांय
Updated Thu, 06 Dec 2018 12:18 AM IST
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साइड स्टोरी....
रायफल रवां न दुरुस्त दस्तावेज, फिर भी ठांय-ठांय
ऐसी अनाड़ी पुलिस से तो निहत्था ही बेहतर
वाल्टरगंज थाने में मिलीं तीन रायफलें जाम
वीरेंद्र पांडेय
बस्ती। मुंह की खाने की सिलसिलेवार घटनाओं के बावजूद पुलिस गिरेबां में झांकने को अब भी तैयार नहीं। बुधवार को एक बार फिर उनकी संजीदगी उजागर हो गईं। साबित हो गया कि इनको खुद के असलहे और दस्तावेज दुरुस्त रखने के सऊर नहीं हैं तो आम-आवाम के मन में सुरक्षा का भाव कैसे पैदा कर पाएंगे? बड़ा सवाल है। जब मुआयना होता है तो कहीं रायफल जाम मिल रही है तो कहीं कारतूस दगा पाया जा रहा है। लोग चर्चा करते रहे कि मुंह से ठांय-ठांय करने वाले मैगजीन नहीं संभाल पाते।
जिले की रिजर्व पुलिस लाइंस और 16 थानों में शस्त्रागार सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र है। इसी के बल पर जिले की 28 लाख से ज्यादा आबादी चैन की सांस लेती है। लेकिन जब भी असलहों का रखरखाव और संभालने के तरीके से अनभिज्ञ पाए जाते हैं। तत्कालीन डीआईजी डॉ. रामकृष्ण और एसपी आनंद राव कुलकर्णी ने दिसंबर 2013 में हर्रैया का मुआयना किया था। तब पूरा थाना एसओ तक मैगजीन नहीं खोल पाए थे। इससे साबित है कि सक्रिय पुलिसिंग के लिए शासन से जिले स्तर तक तमाम दावों की हकीकत चौंकाने वाली है। न कागजात-रजिस्टर दुरुस्त, न साफ-सफाई। अपराधियों को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारियां परखीं तो और भी चिंताजनक हालात सामने आए। पिछले वर्षों में आरक्षी-एसआई ठीक तरीके से पोजीशन तक नहीं ले पाए। वहीं, महिला कांस्टेबल रायफल नहीं संभाल सकीं थीं। पुस्तिका, कहां-किस हालत में है न थानाध्यक्ष बता पाए न दीवान।
सारे दावे खोखले
बढ़ते अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए पुलिस प्रशासन भले ही तमाम दावे कर ले पर सच्चाई तो यह है कि अपराधियों से निबटने के लिए अत्याधुनिक हथियारों की अपेक्षा उसे आदम युग के हथियारों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अपराधी हाईटेक हो गए हैं लेकिन आम आदमी की सुरक्षा का दायित्व संभालने वाला पुलिस विभाग अपने पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है। सरकार विभाग को अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने की बात भले ही करे किंतु कार्यरूप में कुछ दिखायी नहीं पड़ रहा है।
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रायफल रवां न दुरुस्त दस्तावेज, फिर भी ठांय-ठांय
ऐसी अनाड़ी पुलिस से तो निहत्था ही बेहतर
वाल्टरगंज थाने में मिलीं तीन रायफलें जाम
वीरेंद्र पांडेय
बस्ती। मुंह की खाने की सिलसिलेवार घटनाओं के बावजूद पुलिस गिरेबां में झांकने को अब भी तैयार नहीं। बुधवार को एक बार फिर उनकी संजीदगी उजागर हो गईं। साबित हो गया कि इनको खुद के असलहे और दस्तावेज दुरुस्त रखने के सऊर नहीं हैं तो आम-आवाम के मन में सुरक्षा का भाव कैसे पैदा कर पाएंगे? बड़ा सवाल है। जब मुआयना होता है तो कहीं रायफल जाम मिल रही है तो कहीं कारतूस दगा पाया जा रहा है। लोग चर्चा करते रहे कि मुंह से ठांय-ठांय करने वाले मैगजीन नहीं संभाल पाते।
जिले की रिजर्व पुलिस लाइंस और 16 थानों में शस्त्रागार सबसे महत्वपूर्ण अस्त्र है। इसी के बल पर जिले की 28 लाख से ज्यादा आबादी चैन की सांस लेती है। लेकिन जब भी असलहों का रखरखाव और संभालने के तरीके से अनभिज्ञ पाए जाते हैं। तत्कालीन डीआईजी डॉ. रामकृष्ण और एसपी आनंद राव कुलकर्णी ने दिसंबर 2013 में हर्रैया का मुआयना किया था। तब पूरा थाना एसओ तक मैगजीन नहीं खोल पाए थे। इससे साबित है कि सक्रिय पुलिसिंग के लिए शासन से जिले स्तर तक तमाम दावों की हकीकत चौंकाने वाली है। न कागजात-रजिस्टर दुरुस्त, न साफ-सफाई। अपराधियों को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारियां परखीं तो और भी चिंताजनक हालात सामने आए। पिछले वर्षों में आरक्षी-एसआई ठीक तरीके से पोजीशन तक नहीं ले पाए। वहीं, महिला कांस्टेबल रायफल नहीं संभाल सकीं थीं। पुस्तिका, कहां-किस हालत में है न थानाध्यक्ष बता पाए न दीवान।
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सारे दावे खोखले
बढ़ते अपराध और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए पुलिस प्रशासन भले ही तमाम दावे कर ले पर सच्चाई तो यह है कि अपराधियों से निबटने के लिए अत्याधुनिक हथियारों की अपेक्षा उसे आदम युग के हथियारों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अपराधी हाईटेक हो गए हैं लेकिन आम आदमी की सुरक्षा का दायित्व संभालने वाला पुलिस विभाग अपने पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है। सरकार विभाग को अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित करने की बात भले ही करे किंतु कार्यरूप में कुछ दिखायी नहीं पड़ रहा है।
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