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महिला हैंडबॉल की टीम एफर्ट टेस्ट में फेल... नहीं जाएगी शिमला
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बरेली। बरेली कॉलेज में पिछले दिनों मात्र 17 खिलाड़ियों से चुनी गई महिला हैंडबॉल की टीम शिमला इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता खेलने नहीं जाएगी। एफर्ट टेस्ट में फेल होने के बाद विश्वविद्यालय ने पूरी टीम ही निरस्त कर दी। टीम में चुनी गईं खिलाड़ी मंगलवार को विश्वविद्यालय पहुंची। टीम भेजने की मांग की, लेकिन उनको साफ मना कर दिया गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि खेलों के प्रति कॉलेजों की उपेक्षा ही इस असफलता का कारण है। अगर कई कॉलेजों की टीम पहुंचती और टूर्नामेंट होता तो अच्छे खिलाड़ी निकलकर सामने आते। लेकिन मात्र 17 खिलाड़ियों में से 12 खिलाड़ी टीम में चुन ली गई। इस टीम को तो फेल होना ही था।
बरेली कॉलेज में नौ अक्तूबर को महिला वर्ग की हैंडबॉल प्रतियोगिता थी। इसमें बरेली कॉलेज, साहू राम स्वरूप और अवंतीबाई महिला कॉलेज की 17 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। जबकि कम से कम 15 कॉलेजों की टीम तो आनी ही चाहिए थी। कम टीमें होने के कारण प्रतियोगिता न कराकर ट्रायल कराए गए। जिसमें 12 खिलाड़ियों की टीम चुनी गई। टीम तो चुन ली गई, लेकिन एक्सपर्ट ने खिलाड़ियों की फिजिकल क्षमता पर सवाल उठाते हुए क्रीड़ा सचिव को रिपोर्ट दी। चयनित खिलाड़ियों का विश्वविद्यालय परिसर में एफर्ड टेस्ट हुआ, जिसमें एक दो खिलाड़ी ही 80 फीसदी अंक ला सकी। इस पर क्रीड़ा सचिव ने पूरी टीम ही निरस्त कर दी। 17 अक्तूबर को शिमला में इंटर यूनिवर्सिटी हैंडबॉल प्रतियोगिता होनी है। खिलाड़ियों की सूचना मिली तो वह मंगलवार को विश्वविद्यालय कैंपस पहुंची। खिलाड़ी टीम भेजने के लिए क्रीड़ा विभाग के चक्कर काटती रहीं, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। क्रीड़ा सचिव प्रोफेसर एके जैतली का कहना है कि टीम में एक दो खिलाड़ी को छोड़कर किसी ने एफर्ड टेस्ट पास नहीं किया। जब कोई खिलाड़ी खेलने लायक नहीं तो टीम भेजने का क्या फायदा। इसलिए टीम निरस्त की।
कॉलेजों में सुविधाएं नहीं तो कैसे तैयार हों खिलाड़ी
खेलों के नाम पर प्रत्येक खिलाड़ी से 150 रुपये फीस ली जाती है। जबकि यह पैसा उनकी सुविधाओं पर खर्च नहीं होता। अगर कॉलेज में खिलाड़ियों को खेलने का मौका मिलता तो शायद वह एफर्ड टेस्ट में फेल नहीं होती। अधिकतर कॉलेजों में खेल सुविधाएं नहीं है। प्रैक्टिस के अभाव बेहतर खिलाड़ी तैयार नहीं हो पाते।
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बरेली कॉलेज में नौ अक्तूबर को महिला वर्ग की हैंडबॉल प्रतियोगिता थी। इसमें बरेली कॉलेज, साहू राम स्वरूप और अवंतीबाई महिला कॉलेज की 17 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। जबकि कम से कम 15 कॉलेजों की टीम तो आनी ही चाहिए थी। कम टीमें होने के कारण प्रतियोगिता न कराकर ट्रायल कराए गए। जिसमें 12 खिलाड़ियों की टीम चुनी गई। टीम तो चुन ली गई, लेकिन एक्सपर्ट ने खिलाड़ियों की फिजिकल क्षमता पर सवाल उठाते हुए क्रीड़ा सचिव को रिपोर्ट दी। चयनित खिलाड़ियों का विश्वविद्यालय परिसर में एफर्ड टेस्ट हुआ, जिसमें एक दो खिलाड़ी ही 80 फीसदी अंक ला सकी। इस पर क्रीड़ा सचिव ने पूरी टीम ही निरस्त कर दी। 17 अक्तूबर को शिमला में इंटर यूनिवर्सिटी हैंडबॉल प्रतियोगिता होनी है। खिलाड़ियों की सूचना मिली तो वह मंगलवार को विश्वविद्यालय कैंपस पहुंची। खिलाड़ी टीम भेजने के लिए क्रीड़ा विभाग के चक्कर काटती रहीं, लेकिन उनकी सुनी नहीं गई। क्रीड़ा सचिव प्रोफेसर एके जैतली का कहना है कि टीम में एक दो खिलाड़ी को छोड़कर किसी ने एफर्ड टेस्ट पास नहीं किया। जब कोई खिलाड़ी खेलने लायक नहीं तो टीम भेजने का क्या फायदा। इसलिए टीम निरस्त की।
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कॉलेजों में सुविधाएं नहीं तो कैसे तैयार हों खिलाड़ी
खेलों के नाम पर प्रत्येक खिलाड़ी से 150 रुपये फीस ली जाती है। जबकि यह पैसा उनकी सुविधाओं पर खर्च नहीं होता। अगर कॉलेज में खिलाड़ियों को खेलने का मौका मिलता तो शायद वह एफर्ड टेस्ट में फेल नहीं होती। अधिकतर कॉलेजों में खेल सुविधाएं नहीं है। प्रैक्टिस के अभाव बेहतर खिलाड़ी तैयार नहीं हो पाते।
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