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कुछ खुशी और कुछ गम.. यह ईद भी याद रहेगी

Tue, 26 May 2020 01:35 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 26 May 2020 01:35 AM IST
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Some happiness and some sorrow .. This Eid will also be remembered
घर में नमाज अदा करते लोग। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

ईदगाह और मस्जिदों में गिनती के लोगों ने अदा की नमाज, सुबह होते ही मोहल्लों से निकलने वाली कतारें नहीं दिखीं
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मस्जिदों में वक्त से पहले अदा हुई, ज्यादातर लोगों ने घरों पर पढ़ी चार रकात नमाजे चाश्त
सड़क-बाजार सूने रहे लेकिन घरों में मनाईं गईं खुशियां

बरेली। आमतौर पर खुशियां लेकर आने वाले ईद के त्योहार पर इस बार कई और भी रंग दिखे। खुलकर जश्न न मना पाने की मायूसी तो थी ही, लेकिन सब्र, जकात और सुख-दुख के साझा एहसास का रंग भी इस ईद पर साफ दिखा। सड़कों-बाजारों में आमदरफ्त नाम की ही दिखी। नए कपड़े पहने लोग भी गिनती के ही नजर आए। जश्न और दावतों का माहौल सिरे से गायब था। लोग रवायती अंदाज में ईद की खुशियां न मना पाने का मलाल लिए घरों में सिमटे रहे।
ईद मुसलमानों का सबसे बड़ा त्योहार तो है ही, गले मिलकर और एक-दूसरे का मुसाफा करके अपने तमाम ताल्लुकात का नई ताजगी से एहसास करने का भी मौका होता है लेकिन इस बार लॉकडाउन ने ये सारे रीति-रिवाज पूरे नहीं होने दिए। हालात को समझते हुए लोग कोई जोखिम लेने से भी दूर रहे। पहली बार ऐसा हुआ जब सुबह उठकर तैयार होने के बाद लोगों ने नए कपड़ों के बजाय पुराने कपड़े पहने और मस्जिदों का रुख करने के बजाय घरों पर ही ईद के बदले की नमाज रस्मी तौर पर अदा की। बड़ों के साथ बच्चे भी घरों में सिमटे रहे। कुछ बच्चों ने नए कपड़े तो पहने लेकिन नए कपड़े पहनकर खुशियां बांटने की कोई गुंजाइश नहीं थी, लिहाजा उनके चेहरों पर मायूसी झलकती रही।
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ईद की नमाज सुबह सात से 11 बजे तक सिलसिलेवार ढंग से ईदगाह से लेकर और शहर भर की मस्जिदों में अदा की जाती रही। आम तौर पर सुबह होते ही मस्जिदों की ओर जाते लोगों की कतारें दिखने लगती थीं लेकिन इस बार सड़कें और मस्जिदों की सीढ़ियां दोनों सुनी पड़ी रहीं। मस्जिदों में अचानक कोई न पहुंच जाए, इसको इस हद तक एहतियात बरती गई कि तमाम मस्जिदों में वक्त से पहले ही नमाज अदा कर ली गई।
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घरों में मनाईं खुशियां और फोन पर दी मुबारकबाद

पाबंदियों के बीच ईद पर हर साल की तरह जश्न नहीं हो पाया लेकिन घरों में भी फिर भी जमकर खुशियां मनाई गईं। ज्यादातर लोगों ने फोन पर एक-दूसरे को मुबारकबाद दी, साथ ही अपने-अपने इलाकों के हालचाल भी फोन पर ही साझा किए। घरों पर लोगों को सिवइयों के लिए न बुला पाने की मायूसी भी इस बातचीत में झलकती रही। कुछ घने मोहल्लों में लोगों का एक-दूसरे के घरों पर आना जाना लगा रहा।
या मेरे मौला..
सुना है......
आज ईद है
तू चश्मदीद है
ऐ मेरे मौला !
ख़ाली न रहे
किसी का झोला
तू है बड़ा करिश्माई
दु:खों की कर दे भरपाई
तूफ़ान बड़ा रफ़्तारी है
कश्तियां बचाए रखना
यह दौर बड़ा ही मुश्किल है
हस्तियां बचाए रखना
जख्म भले ही हो जाएं
नासूर कभी न बन पाएं
हिफ़ाजत करना
सलामत रखना
आज भले ही गले न मिल सकें
लेकिन दिल मिलाए रखना
 
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