{"_id":"57c7384b4f1c1bb80d2cb757","slug":"school-classmate-marie-bottle-baby-torn-ear","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्कूल में सहपाठी ने बोतल मारी, बच्चे का कान फटा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्कूल में सहपाठी ने बोतल मारी, बच्चे का कान फटा
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Thu, 01 Sep 2016 01:37 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज में छठी क्लास के एक छात्र ने अपने सहपाठी को किसी बात पर कहासुनी होने के बाद पानी की बोतल दे मारी। इससे उसका बायां कान फट गया। जख्मी छात्र गंगाचरण हॉस्पिटल के डाक्टर प्रमेंद्र माहेश्वरी का 11 वर्षीय बेटा आयुष है। उसके कान की प्लास्टिक सर्जरी करनी पड़ी। वह अस्पताल में भर्ती है।
यह घटना मंगलवार की है। डॉ. प्रमेंद्र ने बताया कि सुबह साढ़े 11 बजे उनके पास हार्टमैन से फोन आया कि उनके बेटे के चोट लग गई है। वह कालेज पहुंचे तो फर्स्ट एड के बाद बेटे को स्कूल में लिटाया हुआ था। बेटे ने बताया कि इंटरवल के दौरान उसके सहपाठी ने उसको पानी की बोतल मार दी। इससे उसके कान में काफी खून निकला। उसको काफी दर्द हो रहा था। वह उसको अपने अस्पताल में ले आए और भर्ती किया। दोनों छात्रों के बीच क्लास में सीट पर बैठने को लेकर विवाद हुआ। हालांकि बाद में कालेज की ओर से बोतल मारने वाले छात्र के पैरेंट्स को बुलाकर उनकी काउंसलिंग की गई। जबकि डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी का कहना है कि कालेज में छात्रों के बीच झगड़े को अगर टीचर्स गंभीरता से देखते तो चोट लगने की नौबत नहीं आती।
क्यों हिंसक हो रहे मासूम
कक्षा छह में पढ़ने वाले बच्चे की उम्र ही क्या होती है- 10-11 साल लेकिन स्कूल में जिस तरह का वाकया सामने आया है, उससे जाहिर होता है कि मासूमियत की उम्र में भी बच्चे आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं। जरा सी बात पर लड़ने के साथ ही इस हद तक मारपीट कर बैठते हैं कि किसी के भी खून निकल आए।
विज्ञापन
मनोवैज्ञानिक की राय-
10 साल से लेकर 17 साल तक के बच्चों में हार्मोंस चेंज की वजह से भावनात्मक प्रभाव हावी रहता है। कोई बुराई कर दे तो आक्रामक हो जाते हैं। जलन की फीलिंग करते हैं। कभी गुस्सा, दुख जैसे भाव उनमें आते-जाते रहते हैं। बाल मन अच्छे-भली बातों को सहजता से नहीं समझ पाता इसलिए आवेश में आकर कुछ भी ऐसा कर बैठता है। वे सहज रहें, धैर्य से काम लें और अच्छी-भली बातों को जाने , इसकी जिम्मेदारी पैरेंट्स की है। बच्चों के लिए पैरेंट्स से बड़ा दूसरा काउंसलर नहीं हो सकता इसलिए वे उनको अच्छे ढंग से डील करें। उकसाने वाली बातें न करें। डांटने-डपटने के बजाय उनको प्यार से समझाएं। ध्यान रखें- बच्चों को अच्छे उदाहरण बताएं लेकिन उनसे उनकी तुलना भी न करें। गलत उदाहरण देकर उस जैसा न बनने की बात कहकर उलाहने देने से बच्चा नहीं सुधरता।
कोट...
दोनों बच्चों के पैरेंट्स का आमना-सामना भी करा दिया गया था। इसके बाद दोनों में विवाद खत्म हो गया।
-डॉ. हरमन मिंज, प्रिंसिपल
विज्ञापन
यह घटना मंगलवार की है। डॉ. प्रमेंद्र ने बताया कि सुबह साढ़े 11 बजे उनके पास हार्टमैन से फोन आया कि उनके बेटे के चोट लग गई है। वह कालेज पहुंचे तो फर्स्ट एड के बाद बेटे को स्कूल में लिटाया हुआ था। बेटे ने बताया कि इंटरवल के दौरान उसके सहपाठी ने उसको पानी की बोतल मार दी। इससे उसके कान में काफी खून निकला। उसको काफी दर्द हो रहा था। वह उसको अपने अस्पताल में ले आए और भर्ती किया। दोनों छात्रों के बीच क्लास में सीट पर बैठने को लेकर विवाद हुआ। हालांकि बाद में कालेज की ओर से बोतल मारने वाले छात्र के पैरेंट्स को बुलाकर उनकी काउंसलिंग की गई। जबकि डॉ. प्रमेंद्र माहेश्वरी का कहना है कि कालेज में छात्रों के बीच झगड़े को अगर टीचर्स गंभीरता से देखते तो चोट लगने की नौबत नहीं आती।
विज्ञापन
क्यों हिंसक हो रहे मासूम
कक्षा छह में पढ़ने वाले बच्चे की उम्र ही क्या होती है- 10-11 साल लेकिन स्कूल में जिस तरह का वाकया सामने आया है, उससे जाहिर होता है कि मासूमियत की उम्र में भी बच्चे आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं। जरा सी बात पर लड़ने के साथ ही इस हद तक मारपीट कर बैठते हैं कि किसी के भी खून निकल आए।
विज्ञापन
मनोवैज्ञानिक की राय-
10 साल से लेकर 17 साल तक के बच्चों में हार्मोंस चेंज की वजह से भावनात्मक प्रभाव हावी रहता है। कोई बुराई कर दे तो आक्रामक हो जाते हैं। जलन की फीलिंग करते हैं। कभी गुस्सा, दुख जैसे भाव उनमें आते-जाते रहते हैं। बाल मन अच्छे-भली बातों को सहजता से नहीं समझ पाता इसलिए आवेश में आकर कुछ भी ऐसा कर बैठता है। वे सहज रहें, धैर्य से काम लें और अच्छी-भली बातों को जाने , इसकी जिम्मेदारी पैरेंट्स की है। बच्चों के लिए पैरेंट्स से बड़ा दूसरा काउंसलर नहीं हो सकता इसलिए वे उनको अच्छे ढंग से डील करें। उकसाने वाली बातें न करें। डांटने-डपटने के बजाय उनको प्यार से समझाएं। ध्यान रखें- बच्चों को अच्छे उदाहरण बताएं लेकिन उनसे उनकी तुलना भी न करें। गलत उदाहरण देकर उस जैसा न बनने की बात कहकर उलाहने देने से बच्चा नहीं सुधरता।
कोट...
दोनों बच्चों के पैरेंट्स का आमना-सामना भी करा दिया गया था। इसके बाद दोनों में विवाद खत्म हो गया।
-डॉ. हरमन मिंज, प्रिंसिपल