पालिका की जमीन पर फिर छिड़ी जंग
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पूरे प्रकरण की बुनियाद वर्ष 1995 से 2000 के दौरान चेयरमैन रही शहला ताहिर के कार्यकाल में 1.80 लाख रुपये में 38 दुकानों का आवंटन है। आरोप लगा कि तब कई दुकानों में शटर भी नहीं लगे थे और हर आवंटी के नाम से पालिका खाते में जमा राशि से 10 गुना से भी अधिक राशि वसूली गई। तब पालिका बोर्ड की बैठक में इसी मुद्दे पर उपाध्यक्ष ने विरोध किया और प्रकरण हाईकोर्ट तक पहुंचा था। ये दुकानें प्रशासन ने वर्ष 2001 मेें कुर्क कर जब्त कर ली और 24 जून 2001 को 39.80 लाख रुपये में नए सिरे से खुली बोली लगवाकर आवंटित कीं। वर्ष 2010 तक की अवधि में पालिका परिसर में इन्हीं दुकानों के आगे करीब 700 वर्ग गज भूभाग पर गुरु गोविंद सिंह पार्क बना। गत दिनों रात के अंधेरे में इसकी बाउंड्री और लगे बच्चों के झूले ढहाने और तत्काल उसका मलवा हटवा दिए जाने को लेकर स्थानीय लोगों ने जबरदस्त विरोध किया और उनके समर्थन में भाजपा से जुड़े पूर्व चेयरमैन रवींद्र राठौर सामने आ गए।
इसी क्रम में पालिका का शुलभ शौचालय भी बीते दिनों अचानक ढहाकर उसका मलवा तक हटा दिया गया और प्रशासनिक स्तर पर इस संबंधी लिखित में मांगे गए जवाब पर भी पालिका प्रशासन चुप्पी साधे रही। हाल ही में पीलीभीत बाईपास रोड से सटे लोक निर्माण विभाग की जमीन पर चेयरमैन के करीबी सभासद को कब्जा दिलाए जाने का प्रकरण भी प्रशासन के संज्ञान में है।
पहले ही जांच चुका है प्रशासन
नवाबगंज नगरपालिका की संपत्ति पर अवैध कब्जा और आवंटन में अनियमितता संबंधी तथ्यों की पुष्टि काफी पहले ही जिला प्र्रशासन के स्तर पर हो चुकी है। वर्ष 2013 में 22 जून को उत्तर प्रदेश शासन के नगर विकास विभाग के निर्देश पर यहां दुकानों की गुपचुप तरीके से नीलामी कर करोड़ों रुपये की अनियमितता संबंधी रिपोर्ट प्रशासन भेज चुका है। उसमें कुल नौ मामलों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में हर मामले में हुई नीलामी और आवंटन को पालिका परिषद के हितों के विपरीत एवं सार्वजनिक संपत्ति का स्पष्ट दुर्विनियोजन बताया गया। यही नहीं, नीलामी स्वीकृत होने से पहले ही किरायानामा निष्पादित किए जाने के लिए स्टांप पेपर खरीदने की पुष्टि भी हुई जिसे प्रशासनिक जांच में नीलामी से पहले ही आवंटी का चयन होना पाया गया। जितने क्षेत्रफल के दुकान की नीलामी महज 1.10 लाख रुपये की पगड़ी और हजार रुपये किराए पर स्वीकृत दर्र्शाया हुआ पाया गया, वह प्रशासनिक आकलन में तत्कालीन बाजार दर के अनुसार पगड़ी के तौर पर करीब आठ लाख रुपये और किराये के रूप में आठ हजार रुपये का बैठता।