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नहीं चेते तो पीने लायक नहीं बचेगा शहर का पानी
बरेली।
Updated Wed, 06 Dec 2017 01:58 AM IST
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पुराने कपड़ों पर रंग चढ़ाकर उन्हें नया बनाने के चक्कर में हम अपने शहर के भूमिगत जल को जहरीला बनाते जा रहे हैं। कपड़ों को रंगने में प्रयोग होने वाली डाई में पाने जाने वाले घातक केमिकल कंपाउंड (रासायनिक यौगिक) नालियों में बहाए जा रहा है। ये रासायनिक यौगिक न केवल शहर के नालों से होकर आसपास की नदियों में जा रहे हैं बल्कि शहर के भूमिगत जल में भी पहुंच रहे हैं। पुराना शहर से लेकर राजेंद्र नगर समेत कई इलाकों में यह तस्वीर देखी जा सकती है। एमजेपी रुहलेखंड विश्वविद्यालय के प्लांट साइंस विभाग में हुए रिसर्च में भी इसकी पुष्टि हुई है कि बालों और कपड़ों को रंगने में प्रयोग होने वाली डाई से क्लोरोफिनॉल और नाइट्रोफिनॉल जैसे घातक रासायनिक यौगिक निकलते हैं। अन्य पदार्थों से मिलकर ये और खतरनाक रसायन पैदा करते हैं जो कैंसर जैसी घातक बीमारी, पेट संबंधी बीमारी और बाल झड़ने की प्रमुख वजह बनते हैं।
शहर में कई जगहों के सैंपल पर हो चुका है रिसर्च
एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्लांट साइंस विभाग ने ‘हेयर डाई कंपाउंड एंड इट्स डेग्रेडेशन’ टॉपिक पर शोध किया था। इसमें शहर के ऐसे 15 स्थान चुने थे जहां कपड़ों को रंगने का काम व्यावसायिक स्तर पर होता है। इनमें पुराना शहर, राजेंद्रनगर, बिहारीपुर, किला क्षेत्र, सीबीगंज समेत कई इलाकों से पानी के सैंपल लिए गए थे। डाई से घुले पानी में टू अमीनो नाइट्रेटफिनॉल, टू क्लोरो नाइट्रोफिनॉल और सिक्स क्लोरो, फोर नाइट्रोफिनॉल पाया गया। यह कैंसर जैसी घातक बीमारी का प्रमुख कारण बनते हैं। ये केमिकल कंपाउंड अन्य पदार्थों के साथ मिलकर तुरंत रिएक्शन करना शुरू कर देते हैं जिससे और विषैले पदार्थ पैदा होते हैं।
कैसे हो सकता है समाधान
शोधकर्ता डॉ. आलोक श्रीवास्तव कहते हैं कि डाई का पानी नालियों में बहाने से रोका जाए। इसका ट्रीटमेंट किया जाए। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने कुछ बैक्टीरिया खोजे हैं जिसमें स्यूडोमोनास, बोखार्डिया, एजोबेक्टर, अथ्रोरोबेक्टर जैसे बैक्टीरिया इन केमिकल कंपाउंड को तोड़ कर हाइड्रोक्योनॉन में बदल देते हैं जो घातक नहीं होते। शहर में कपड़े रंगने की जगह-जगह जो दुकनें हैं, उनको एक जगह सीमित किया जाए और वहां टैंक रखा जाए। इसमें डाई से घुला सारा पानी रखा जाए और यह बैक्टीरिया डालें या पानी का ट्रीटमेंट किया जाए। उसके बाद ही खुले में यह पानी छोड़ा जाए।
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पौधों पर भी पड़ता है घातक प्रभाव
जमीन के अंदर पहुंचते ही इसके केमिकल असर दिखाना शुरू कर देते हैं। पेयजल के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैैं और फिर कैंसर, त्वचा की बीमारी का कारण बनते हैं। अस्थमा की बीमारी का कारण भी यही केमिकल बनते हैं। पौधों पर ये केमिकल बहुत बुरा असर डालते हैं। पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। पौधे जिन छिद्रों से गैसे लेते और छोड़ते हैं वे बंद हो सकते हैं। भूमि में रहने वाले ऐसे बैक्टीरिया जो बीज को अंकुरित करने में अहम भूमिका निभाते हैं, उनको भी नष्ट कर देते हैं।
शहर में कई जगहों के सैंपल पर हो चुका है रिसर्च
एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के प्लांट साइंस विभाग ने ‘हेयर डाई कंपाउंड एंड इट्स डेग्रेडेशन’ टॉपिक पर शोध किया था। इसमें शहर के ऐसे 15 स्थान चुने थे जहां कपड़ों को रंगने का काम व्यावसायिक स्तर पर होता है। इनमें पुराना शहर, राजेंद्रनगर, बिहारीपुर, किला क्षेत्र, सीबीगंज समेत कई इलाकों से पानी के सैंपल लिए गए थे। डाई से घुले पानी में टू अमीनो नाइट्रेटफिनॉल, टू क्लोरो नाइट्रोफिनॉल और सिक्स क्लोरो, फोर नाइट्रोफिनॉल पाया गया। यह कैंसर जैसी घातक बीमारी का प्रमुख कारण बनते हैं। ये केमिकल कंपाउंड अन्य पदार्थों के साथ मिलकर तुरंत रिएक्शन करना शुरू कर देते हैं जिससे और विषैले पदार्थ पैदा होते हैं।
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कैसे हो सकता है समाधान
शोधकर्ता डॉ. आलोक श्रीवास्तव कहते हैं कि डाई का पानी नालियों में बहाने से रोका जाए। इसका ट्रीटमेंट किया जाए। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने कुछ बैक्टीरिया खोजे हैं जिसमें स्यूडोमोनास, बोखार्डिया, एजोबेक्टर, अथ्रोरोबेक्टर जैसे बैक्टीरिया इन केमिकल कंपाउंड को तोड़ कर हाइड्रोक्योनॉन में बदल देते हैं जो घातक नहीं होते। शहर में कपड़े रंगने की जगह-जगह जो दुकनें हैं, उनको एक जगह सीमित किया जाए और वहां टैंक रखा जाए। इसमें डाई से घुला सारा पानी रखा जाए और यह बैक्टीरिया डालें या पानी का ट्रीटमेंट किया जाए। उसके बाद ही खुले में यह पानी छोड़ा जाए।
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पौधों पर भी पड़ता है घातक प्रभाव
जमीन के अंदर पहुंचते ही इसके केमिकल असर दिखाना शुरू कर देते हैं। पेयजल के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैैं और फिर कैंसर, त्वचा की बीमारी का कारण बनते हैं। अस्थमा की बीमारी का कारण भी यही केमिकल बनते हैं। पौधों पर ये केमिकल बहुत बुरा असर डालते हैं। पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। पौधे जिन छिद्रों से गैसे लेते और छोड़ते हैं वे बंद हो सकते हैं। भूमि में रहने वाले ऐसे बैक्टीरिया जो बीज को अंकुरित करने में अहम भूमिका निभाते हैं, उनको भी नष्ट कर देते हैं।