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...तो रामगंगा में ईको फ्रेंडली नहीं पीओपी प्रतिमाएं ही होगी विसर्जित
Updated Wed, 12 Sep 2018 12:15 AM IST
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हर वर्ष की तरह इस बार भी रामगंगा में ईको फ्रेंडली की जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की बनी प्रतिमाएं ही विसर्जित करने की तैयारी है, जिन्हें बनाने में केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग होता है। जो पर्यावरण के लिए काफी घातक होते हैं। गणेश चतुर्थी पर विसर्जन के लिए शहर में पीओपी से बनी प्रतिमाएं धड़ल्ले से बिक रही हैं। बाजार में इन प्रतिमाओं का कीमत एक हजार से लेकर दस हजार तक है। इसका बड़ा कारण शहर में ईको फ्रेंडली प्रतिमाएं मौजूद न होना भी है।
पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए शासन ने पीओपी से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक लगा रखी है। नदियों के जल को स्वच्छ रखने के लिए कृतिम कुंड बनाकर विसर्जन करने के दिशा-निर्देश दे रखे हैं। फिर भी शहर में झांकी निकाल कर इन्हीं प्रतिमाओं को रामगंगा में विसर्जित किया जाएगा। दरअसल पीओपी की परत जल स्रोतों की तली में जाकर इसे उथला करती हैं। पानी को धरती में रिसने से भी रोकती है। जोकि तली में सीमेंट की तरह जम जाता है। केमिकल के विषाक्त प्रभाव जलीय जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं।
कैसे तैयार होती हैं हर्बल प्रतिमाएं
ईको फ्रेंडली प्रतिमाएं बनाने के लिए कारीगर मिट्टी तैयार करते हैं। मिट्टी को सबसे पहले अच्छी तरह सूखया जाता है। फिर सूखी मिट्टी का पाउडर तैयार करते हैं। ताकि, आसानी से उसे मूर्ति का आकार दिया जा सके। मूर्तियों को कलर करने के लिए कुमकुम और हल्दी का इस्तेमाल होता है। खड़िया मिट्टी को पानी में घोलकर फूड कलर मिक्स करके रंग तैयार करते हैं।
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पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए शासन ने पीओपी से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन पर रोक लगा रखी है। नदियों के जल को स्वच्छ रखने के लिए कृतिम कुंड बनाकर विसर्जन करने के दिशा-निर्देश दे रखे हैं। फिर भी शहर में झांकी निकाल कर इन्हीं प्रतिमाओं को रामगंगा में विसर्जित किया जाएगा। दरअसल पीओपी की परत जल स्रोतों की तली में जाकर इसे उथला करती हैं। पानी को धरती में रिसने से भी रोकती है। जोकि तली में सीमेंट की तरह जम जाता है। केमिकल के विषाक्त प्रभाव जलीय जीव जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं।
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कैसे तैयार होती हैं हर्बल प्रतिमाएं
ईको फ्रेंडली प्रतिमाएं बनाने के लिए कारीगर मिट्टी तैयार करते हैं। मिट्टी को सबसे पहले अच्छी तरह सूखया जाता है। फिर सूखी मिट्टी का पाउडर तैयार करते हैं। ताकि, आसानी से उसे मूर्ति का आकार दिया जा सके। मूर्तियों को कलर करने के लिए कुमकुम और हल्दी का इस्तेमाल होता है। खड़िया मिट्टी को पानी में घोलकर फूड कलर मिक्स करके रंग तैयार करते हैं।
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