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पालीथिन पर प्रतिबंध के आदेश की निकल गई हवा
Updated Wed, 04 Oct 2017 11:39 PM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
बांदा। बढ़ते प्रदूषण पर प्रभावी अंकुश लगानेे के लिए वर्ष 2010 में लागू प्लास्टिक निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम व सुप्रीम कोर्ट का आदेश फाइलों में कैद हो गया। प्रतिबंधित प्लास्टिक थैलों का चलन मवेशियों और मनुष्यों दोनों को ही जानलेवा नुकसान पहुंचा रहा है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन मंडल, जिला व नगर पंचायत स्तर पर गठित की गई टीमें निष्क्रिय हैं। पॉलिथीन से परहेज का आम लोगों में न तो शौक है न कार्रवाई का खौफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को इस पर सख्ती से प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए थे। नगर पालिका में अधिशासी अधिकारी, सफाई निरीक्षक व स्वास्थ्य अधिकारी की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। सहयोग में वार्ड सदस्यों को लगाया गया। इसी तरह नगर पंचायत स्तर पर ईओ की अगुवाई में पंचायत कर्मियों की समिति बनाई गई। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन काम करने वाली ये समितियां कुछ दिन तो सक्रिय रहीं, पर अब पूरी तरह निष्क्रिय हैं। जहरीले रंगों से बनी पॉलिथीन धड़ल्ले से उपयोग हो रही हैं। इसका उपयोग करने वाले इसके कुप्रभावों से अनजान हैं। प्रशासन व जिम्मेदार लोग उच्चतम न्यायालय व शासन के आदेश को दरकिनार कर इसकी अनदेखी कर रहे हैं। उधर, सिटी मजिस्ट्रेट रमेशचंद्र तिवारी का कहना है कि पहली अक्तूबर से शुरू हुए स्वच्छता पखवारा में प्रतिबंधित पॉलिथीन के विरुद्ध भी अभियान चलेगा। इसके लिए पूर्व में गठित की गईं समितियों को सक्रिय और प्रभावी किया जाएगा।
बांदा। प्लास्टिक निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम के तहत दोष सिद्ध होने पर धारा-8 के अधीन एक माह की सजा या पांच हजार रुपए जुर्माना का प्रावधान है। दूसरी बार पकड़े जाने पर माल के जब्तीकरण के साथ छह माह की सजा या फिर 10 हजार रुपए जुर्माना का कानून है। 20 माइक्रोन से कम मोटाई के प्लास्टिक कैरीबैगों का उपयोग प्रतिबंधित है। 50 कैरी बैगों का भार 105 ग्राम से कम नहीं होना चाहिए।
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-खुलेआम हो रहा प्रतिबंधित पॉलिथीन का प्रयोग
-गठित की गईं समितियों ने साध ली चुप्पी
-निकाय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी खामोश
बांदा। बढ़ते प्रदूषण पर प्रभावी अंकुश लगानेे के लिए वर्ष 2010 में लागू प्लास्टिक निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम व सुप्रीम कोर्ट का आदेश फाइलों में कैद हो गया। प्रतिबंधित प्लास्टिक थैलों का चलन मवेशियों और मनुष्यों दोनों को ही जानलेवा नुकसान पहुंचा रहा है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन मंडल, जिला व नगर पंचायत स्तर पर गठित की गई टीमें निष्क्रिय हैं। पॉलिथीन से परहेज का आम लोगों में न तो शौक है न कार्रवाई का खौफ है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को इस पर सख्ती से प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए थे। नगर पालिका में अधिशासी अधिकारी, सफाई निरीक्षक व स्वास्थ्य अधिकारी की तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। सहयोग में वार्ड सदस्यों को लगाया गया। इसी तरह नगर पंचायत स्तर पर ईओ की अगुवाई में पंचायत कर्मियों की समिति बनाई गई। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधीन काम करने वाली ये समितियां कुछ दिन तो सक्रिय रहीं, पर अब पूरी तरह निष्क्रिय हैं। जहरीले रंगों से बनी पॉलिथीन धड़ल्ले से उपयोग हो रही हैं। इसका उपयोग करने वाले इसके कुप्रभावों से अनजान हैं। प्रशासन व जिम्मेदार लोग उच्चतम न्यायालय व शासन के आदेश को दरकिनार कर इसकी अनदेखी कर रहे हैं। उधर, सिटी मजिस्ट्रेट रमेशचंद्र तिवारी का कहना है कि पहली अक्तूबर से शुरू हुए स्वच्छता पखवारा में प्रतिबंधित पॉलिथीन के विरुद्ध भी अभियान चलेगा। इसके लिए पूर्व में गठित की गईं समितियों को सक्रिय और प्रभावी किया जाएगा।
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बांदा। प्लास्टिक निर्माण विक्रय व उपयोग अधिनियम के तहत दोष सिद्ध होने पर धारा-8 के अधीन एक माह की सजा या पांच हजार रुपए जुर्माना का प्रावधान है। दूसरी बार पकड़े जाने पर माल के जब्तीकरण के साथ छह माह की सजा या फिर 10 हजार रुपए जुर्माना का कानून है। 20 माइक्रोन से कम मोटाई के प्लास्टिक कैरीबैगों का उपयोग प्रतिबंधित है। 50 कैरी बैगों का भार 105 ग्राम से कम नहीं होना चाहिए।
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-खुलेआम हो रहा प्रतिबंधित पॉलिथीन का प्रयोग
-गठित की गईं समितियों ने साध ली चुप्पी
-निकाय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी खामोश