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बच्चों को बचाने के लाले, दो माह में 50 की मौत
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50 chiled deth in two months
- फोटो : BANDA
बांदा। कोटा, राजकोट और अहमदाबाद जैसे महानगराें में हाईटेक चिकित्सा व्यवस्था के बावजूद बड़ी तादाद में मासूमों की मौत हो गई तो बुंदेलखंड के पिछड़े जिले बांदा में मौतों पर कैसे लगाम लगे? दो माह के ताजा आंकड़े इसके गवाह हैं। इस अवधि में यहां करीब 50 बच्चों की जान चली गई हैं। इनमें 20 बच्चे प्रसव के कुछ क्षणों बाद ही चल बसे। 20 अन्य की दो माह के अंदर मौत हो गई। बाहर से यहां भर्ती किए गए 21 नवजातों में 8 की जान नहीं बची। यह वे आंकडे़ हैं जो मंडल मुख्यालय के सरकारी अभिलेखों/अस्पतालों में दर्ज हैं। वास्तविक आंकड़े इससे और ज्यादा हो सकते हैं।
नवंबर और दिसंबर माह की बात की जाए तो महिला अस्पताल में 1099 प्रसव दर्ज हैं। इनमें 20 शिशुओं की जन्म के कुछ क्षणों बाद ही मौत हो गई, जो आंख भी नहीं खोल सके। 210 बच्चों को प्रसव के बाद चिल्ड्रेन वार्ड (एसएनसीयू) में भर्ती किया गया। यहां इलाज के दौरान 19 बच्चों की मौत हो गई।
इनके अलावा घरों या प्राइवेट अस्पतालों में हुए प्रसव के बाद यहां एसएनसीयू में भर्ती किए गए बच्चों में 9 की मौत हो गई। इनके अलावा जिला अस्पताल पुरुष अस्पताल, ट्रामा सेंटर समेत जनपद के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विभिन्न बीमारियों के चलते भर्ती हुए 255 बच्चों में 8 को नहीं बचाया जा सका। बच्चों की मौत का यह आंकड़ा पिछले वर्ष भी कमोवेश इतना ही था।
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तीन की जगह एक डाक्टर, छुट्टी जाने पर इलाज ठप
महिला अस्पताल में तीन डाक्टरों के स्थान पर सिर्फ एक बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एचएन सिंह हैं। इन पर ओपीडी के साथ बच्चा वार्ड की भी जिम्मेदारी है। इमरजेंसी काल पर रात को भी आना होता है। इनके अवकाश पर जाने से बच्चों की इलाज व्यवस्था ठप्प हो जाती है। पुरुष जिला अस्पताल में भी पिछले वर्ष सितंबर से बाल रोग विशेषज्ञ का पद खाली है। बच्चों का इलाज फिजीशियन कर रहे हैं।
नवजातों की मौत की कई वजहें
महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एचएन सिंह का कहना है कि बच्चों की मौत की अलग-अलग वजह हैं। इनमें समय के पूर्व प्रसव, वजन कम होना या गर्भ में ही बच्चे के मुंह में गंदा पानी चला जाना इत्यादि वजहें शामिल हैं। उधर, मंडल मुख्यालय के जिला अस्पताल में एनआईसीयू, इक्यूबेटर, रेडिंट वार्मन की सुविधा न होने से भी बच्चों का उचित इलाज नही हो पाता।
लोगों में जागरूकता का अभाव
प्रभारी सीएमओ डॉ. आरएन प्रसाद का कहना है कि बच्चों की मौत की मुख्य वजह जागरूकता की कमी है। गर्भ में बच्चे के आने पर समय-समय पर जांच व जच्चा का टीकाकरण होना चाहिए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता है। तबीयत बिगड़ने पर ही गर्भवती अस्पताल आती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अक्सर नवजात को परिवार के लोग खुशी में चाय, मीठा आदि चटा देते हैं। यह खतरनाक साबित होता है।
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नवंबर और दिसंबर माह की बात की जाए तो महिला अस्पताल में 1099 प्रसव दर्ज हैं। इनमें 20 शिशुओं की जन्म के कुछ क्षणों बाद ही मौत हो गई, जो आंख भी नहीं खोल सके। 210 बच्चों को प्रसव के बाद चिल्ड्रेन वार्ड (एसएनसीयू) में भर्ती किया गया। यहां इलाज के दौरान 19 बच्चों की मौत हो गई।
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इनके अलावा घरों या प्राइवेट अस्पतालों में हुए प्रसव के बाद यहां एसएनसीयू में भर्ती किए गए बच्चों में 9 की मौत हो गई। इनके अलावा जिला अस्पताल पुरुष अस्पताल, ट्रामा सेंटर समेत जनपद के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विभिन्न बीमारियों के चलते भर्ती हुए 255 बच्चों में 8 को नहीं बचाया जा सका। बच्चों की मौत का यह आंकड़ा पिछले वर्ष भी कमोवेश इतना ही था।
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तीन की जगह एक डाक्टर, छुट्टी जाने पर इलाज ठप
महिला अस्पताल में तीन डाक्टरों के स्थान पर सिर्फ एक बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एचएन सिंह हैं। इन पर ओपीडी के साथ बच्चा वार्ड की भी जिम्मेदारी है। इमरजेंसी काल पर रात को भी आना होता है। इनके अवकाश पर जाने से बच्चों की इलाज व्यवस्था ठप्प हो जाती है। पुरुष जिला अस्पताल में भी पिछले वर्ष सितंबर से बाल रोग विशेषज्ञ का पद खाली है। बच्चों का इलाज फिजीशियन कर रहे हैं।
नवजातों की मौत की कई वजहें
महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एचएन सिंह का कहना है कि बच्चों की मौत की अलग-अलग वजह हैं। इनमें समय के पूर्व प्रसव, वजन कम होना या गर्भ में ही बच्चे के मुंह में गंदा पानी चला जाना इत्यादि वजहें शामिल हैं। उधर, मंडल मुख्यालय के जिला अस्पताल में एनआईसीयू, इक्यूबेटर, रेडिंट वार्मन की सुविधा न होने से भी बच्चों का उचित इलाज नही हो पाता।
लोगों में जागरूकता का अभाव
प्रभारी सीएमओ डॉ. आरएन प्रसाद का कहना है कि बच्चों की मौत की मुख्य वजह जागरूकता की कमी है। गर्भ में बच्चे के आने पर समय-समय पर जांच व जच्चा का टीकाकरण होना चाहिए, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता है। तबीयत बिगड़ने पर ही गर्भवती अस्पताल आती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अक्सर नवजात को परिवार के लोग खुशी में चाय, मीठा आदि चटा देते हैं। यह खतरनाक साबित होता है।