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उद्योग जारी, सप्लाई ठप, उद्यमियों के साथ ग्रामीण महिलाओं की कमाई बंद
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मनियर। वैसे तो बलिया जिला उत्पाद शून्य है। यहां लघु या मध्यम ऑन रिकॉर्ड कोई भी उद्योग नहीं है। हां, जिले के मनियर नगर पंचायत में बिंदी बनाने का काम कुटीर उद्योग की तर्ज पर होता है। यहां के उद्यमी बाहर से कच्चा माल लाते हैं उसकी काट-छांट करते हैं। इसके बाद महिलाओं के घर दे आते हैं। अपने दैनिक कार्य निपटाने के बाद महिलाएं बिंदी के पत्ते तैयार करती हैं और उद्यमी बाद में आकर उन्हें ले जाते हैं। फिर संख्या के आधार पर महिलाओं को पैसे दिए जाते हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक समस्या भी दूर होती है। लेकिन कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लगे लाकडाउन के कारण यह उद्योग भी ठप पड़ा हुआ है। माल की सप्लाई और कच्चा माल ना मिलने से उद्यमियों की कमर टूट गई है। उद्योग ठप पड़ने के कारण महिलाओं को होने वाली आर्थिक मदद भी पूरी तरह से बंद हो गई है।
जिला उद्योग विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस कार्य में लगभग 500 से 650 महिलाएं लगी हुई हैं। इसके लिए उन्हें एक दिन की मजदूरी के रूप में 100-150 रुपये तक प्राप्त हो जाते हैं। महिलाएं इसे पार्ट टाइम जॉब के तौर पर करती हैं।
1950 बिंदी उद्योग की शुरूआत
मनियर कस्बा दशकों से बिंदी (टिकुली) उद्योग के लिए मशहूर है। बिंदी के बहुत से कुटीर उद्योग यहां पर वर्षों से चल रहे हैं। इस उत्पाद का व्यापार स्थानीय बाजारों के अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में भी होता है। यह उद्योग जनपद के लिए आय का एक बहुत बड़ा स्रोत है। बताया जाता है कि मनियर में बिंदी उद्योग की शुरुआत 1950 के करीब हुई थी। तब शीशे को गला कर बिंदी बनती थी। उस पर सोने और चांदी का पानी चढ़ाकर खूबसूरत बिंदी बनाने का काम किया जाता था।
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इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए मुस्लिम परिवार के लोग कोलकाता और अन्य जगहों पर जाकर नई डिजाइन की बिंदी बनाने के गुर भी सीखते थे और उसे यहां के कारीगरों से बनवाते थे। 1975 के आसपास शीशे की बिंदी का चलन समाप्त हुआ और बाजारों में नए किस्म की बिंदी आने लगी। हालांकि बदलते समय के अनुसार मनियर का बिंदी उद्योग तरक्की की राहों में इसलिए पीछे रह गया कि क्योंकि इस ओर कारीगर अपना पांव ही आगे नहीं बढ़ाना चाहते। वे इस ओर प्रयास करें तो वे भी आधुनिक तरीके से बिंदी का निर्माण कर सकते हैं।
यह सही है कि लाकडाउन ने कई उद्योगों की कमर तोड़ी है। उसमें मनियर का बिंदी उद्योग भी शामिल है। पहले लाकडाउन में वाहनों के नहीं चलने के कारण दिक्कत हुई थी। अब उद्यमियों को जरूरत के अनुसार विभाग की ओर से पास बनवा कर दिया जा रहा है। वे देश में कहीं भी अपने माल की सप्लाई कर सकते हैं और कच्चा माल ला सकते हैं।
- राजीव मिश्रा, उपायुक्त, जिला उद्योग केंद्र, बलिया
पहले की अपेक्षा अब कुछ बिंदी उद्योग अच्छा है। लाकडाउन में छुट के बाद उद्योग को पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन लाकडाउन ने उद्योग को कई साल पीछे कर दिया है। इस समय ग्राहक बिंदी की मांग ही नहीं कर रहे हैं।
शेराज शमशिद, बिंदी उद्यमी
तैयार माल बाहर ले जाने में परेशानी हो रही है। पास नहीं बनने के कारण हम लोगों का माल बाहर नहीं जा पा रहा है। एडीएम के यहां गुहार लगाई गई फिर भी पास नहीं बन रहा है, इससे माल रुका हुआ है। जब तक माल की डिलीवरी नहीं करेंगे, नया माल कहां से लाएंगे।
इफ्तेखार अहमद, बिंदी उद्यमी
प्रदेश व अन्य जगहों पर माल नहीं जा पा रहा है। यह दिक्कत वाहनों का पास नहीं बनने के कारण आ रही है। पास नहीं बनने से हमें माल को बेचने में समस्या उत्पन्न हो रही है। वहीं देहात में भी लोग काम करने से कतरा रहे हैं।
इरफान अहमद, बिंदी उद्यमी
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सरकार की तरफ से बिंदी बनाने वाले को किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल रही है। खुद से उद्योग को पटरी पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, फिर भी माल सप्लाई नहीं हो पा रही है। एक जनपद एक उत्पाद के नाम पर बलिया को बिंदी उद्योग को शामिल करने के बाद भी कोई लाभ समझ में नहीं आ रहा है।
प्रिंस खान, बिंदी उद्यमी
लाकडाउन के चलते घरों में रहने पर परेशानी तो है, लेकिन सबसे पहले अपने आपको और परिवार को सुरक्षित रखते हुए भी बिंदी का काम करने जाने पर कहते हैं की माल की सप्लाई ही नहीं हो रही तो हम काम कहां से दें।
चांदमुनी देवी, बिंदी कारीगर
लाकडाउन के चलते बिंदी उद्योग का कार्य नियमित नहीं चल रहा है। इसलिए इस धंधे को छोड़ कर रोजी रोटी के लिए हम लोग अन्य धंधे की सोच रहे हैं। यदि ऐसा नहीं किया गया, अब लगता है कि परिवार का भरण पोषण भी मुश्किल हो जाएगा।
लालती देवी, बिंदी कारीगर
----------------लाकडाउन के चलते तैयार माल पर धूल जम रही है। माल खराब हो रहा है। माल की सप्लाई नहीं हो पाने से अब काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अब तो यही लग रहा है कि इस काम से किनारा करना पड़ेगा। हालांकि इससे काफी राहत हो जाती थी और घर का खर्च चलाने में आसानी होती थी।
तारा देवी, बिंदी कारीगर
परिवार चलाने में लाकडाउन में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते हम लोग बिंदी चिपकाने का कार्य नहीं कर पा रही हैं। चर्चा है कि कोरोना वायरस काफी समय तक कपड़ा, मेटल अन्य वस्तुओं पर सक्रिय रहता है। इधर तो माल भी नहीं मिल रहा है।
कौशल्या देवी, बिंदी कारीगर
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जिला उद्योग विभाग के आंकड़ों के अनुसार इस कार्य में लगभग 500 से 650 महिलाएं लगी हुई हैं। इसके लिए उन्हें एक दिन की मजदूरी के रूप में 100-150 रुपये तक प्राप्त हो जाते हैं। महिलाएं इसे पार्ट टाइम जॉब के तौर पर करती हैं।
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1950 बिंदी उद्योग की शुरूआत
मनियर कस्बा दशकों से बिंदी (टिकुली) उद्योग के लिए मशहूर है। बिंदी के बहुत से कुटीर उद्योग यहां पर वर्षों से चल रहे हैं। इस उत्पाद का व्यापार स्थानीय बाजारों के अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में भी होता है। यह उद्योग जनपद के लिए आय का एक बहुत बड़ा स्रोत है। बताया जाता है कि मनियर में बिंदी उद्योग की शुरुआत 1950 के करीब हुई थी। तब शीशे को गला कर बिंदी बनती थी। उस पर सोने और चांदी का पानी चढ़ाकर खूबसूरत बिंदी बनाने का काम किया जाता था।
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इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए मुस्लिम परिवार के लोग कोलकाता और अन्य जगहों पर जाकर नई डिजाइन की बिंदी बनाने के गुर भी सीखते थे और उसे यहां के कारीगरों से बनवाते थे। 1975 के आसपास शीशे की बिंदी का चलन समाप्त हुआ और बाजारों में नए किस्म की बिंदी आने लगी। हालांकि बदलते समय के अनुसार मनियर का बिंदी उद्योग तरक्की की राहों में इसलिए पीछे रह गया कि क्योंकि इस ओर कारीगर अपना पांव ही आगे नहीं बढ़ाना चाहते। वे इस ओर प्रयास करें तो वे भी आधुनिक तरीके से बिंदी का निर्माण कर सकते हैं।
यह सही है कि लाकडाउन ने कई उद्योगों की कमर तोड़ी है। उसमें मनियर का बिंदी उद्योग भी शामिल है। पहले लाकडाउन में वाहनों के नहीं चलने के कारण दिक्कत हुई थी। अब उद्यमियों को जरूरत के अनुसार विभाग की ओर से पास बनवा कर दिया जा रहा है। वे देश में कहीं भी अपने माल की सप्लाई कर सकते हैं और कच्चा माल ला सकते हैं।
- राजीव मिश्रा, उपायुक्त, जिला उद्योग केंद्र, बलिया
पहले की अपेक्षा अब कुछ बिंदी उद्योग अच्छा है। लाकडाउन में छुट के बाद उद्योग को पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है, लेकिन लाकडाउन ने उद्योग को कई साल पीछे कर दिया है। इस समय ग्राहक बिंदी की मांग ही नहीं कर रहे हैं।
शेराज शमशिद, बिंदी उद्यमी
तैयार माल बाहर ले जाने में परेशानी हो रही है। पास नहीं बनने के कारण हम लोगों का माल बाहर नहीं जा पा रहा है। एडीएम के यहां गुहार लगाई गई फिर भी पास नहीं बन रहा है, इससे माल रुका हुआ है। जब तक माल की डिलीवरी नहीं करेंगे, नया माल कहां से लाएंगे।
इफ्तेखार अहमद, बिंदी उद्यमी
प्रदेश व अन्य जगहों पर माल नहीं जा पा रहा है। यह दिक्कत वाहनों का पास नहीं बनने के कारण आ रही है। पास नहीं बनने से हमें माल को बेचने में समस्या उत्पन्न हो रही है। वहीं देहात में भी लोग काम करने से कतरा रहे हैं।
इरफान अहमद, बिंदी उद्यमी
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सरकार की तरफ से बिंदी बनाने वाले को किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल रही है। खुद से उद्योग को पटरी पर लाने का प्रयास किया जा रहा है, फिर भी माल सप्लाई नहीं हो पा रही है। एक जनपद एक उत्पाद के नाम पर बलिया को बिंदी उद्योग को शामिल करने के बाद भी कोई लाभ समझ में नहीं आ रहा है।
प्रिंस खान, बिंदी उद्यमी
लाकडाउन के चलते घरों में रहने पर परेशानी तो है, लेकिन सबसे पहले अपने आपको और परिवार को सुरक्षित रखते हुए भी बिंदी का काम करने जाने पर कहते हैं की माल की सप्लाई ही नहीं हो रही तो हम काम कहां से दें।
चांदमुनी देवी, बिंदी कारीगर
लाकडाउन के चलते बिंदी उद्योग का कार्य नियमित नहीं चल रहा है। इसलिए इस धंधे को छोड़ कर रोजी रोटी के लिए हम लोग अन्य धंधे की सोच रहे हैं। यदि ऐसा नहीं किया गया, अब लगता है कि परिवार का भरण पोषण भी मुश्किल हो जाएगा।
लालती देवी, बिंदी कारीगर
----------------लाकडाउन के चलते तैयार माल पर धूल जम रही है। माल खराब हो रहा है। माल की सप्लाई नहीं हो पाने से अब काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। अब तो यही लग रहा है कि इस काम से किनारा करना पड़ेगा। हालांकि इससे काफी राहत हो जाती थी और घर का खर्च चलाने में आसानी होती थी।
तारा देवी, बिंदी कारीगर
परिवार चलाने में लाकडाउन में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते हम लोग बिंदी चिपकाने का कार्य नहीं कर पा रही हैं। चर्चा है कि कोरोना वायरस काफी समय तक कपड़ा, मेटल अन्य वस्तुओं पर सक्रिय रहता है। इधर तो माल भी नहीं मिल रहा है।
कौशल्या देवी, बिंदी कारीगर