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Bahraich News: जंगल के डर ने छीन ली गांवों की बेफिक्र शाम

Mon, 28 Sep 2026 12:35 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 28 Sep 2026 12:35 AM IST
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The fear of the forest has snatched away the carefree evenings of the villages.
बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।
घनश्याम सिंह, बहराइच। कतर्नियाघाट के जंगल से सटे गांवों में शाम अब सिर्फ दिन ढलने का समय नहीं, बल्कि घरों में सिमट जाने का संकेत बन गई है। खेतों में फसल खड़ी है, लेकिन बाघ और तेंदुए के डर से किसान अकेले खेत जाने से बच रहे हैं। बच्चों को स्कूल भेजने से लेकर महिलाओं के चारा लेने और जरूरी काम से बाहर निकलने तक हर कदम अब डर के साये में है। कई परिवार घर छोड़ने की सोच रहे हैं, तो कई बच्चों को बाहर भेजने से भी डरते हैं। कभी गांव की पगडंडियों पर देर शाम तक आवाजाही रहती थी, अब सूरज ढलते ही सन्नाटा छा जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि तेंदुए के हमलों ने सिर्फ लोगों की सुरक्षा नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी, कामकाज और बेफिक्र शामें तक छीन ली हैं।
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शाम ढलते ही बस सुबह का इंतजार
सुजौली रेंज के बाजपुर बनकटी में नहर पट्टी के पास सीतारामपुरवा में 18 सितंबर की रात 86 साल की बुजुर्ग महिला अपनी झोपड़ी में अकेली सो रही थीं। तभी तेंदुए ने हमला कर उन्हें मार डाला। घटना के बाद आसपास के परिवारों में डर और गहरा गया है। किशन और राकेश कुमार निषाद बताते हैं कि बुजुर्ग की जान लेने के बाद भी रात में आसपास तेंदुए के गुर्राने की आवाजें सुनाई देती हैं। वन विभाग ने पिंजरा लगाया है, लेकिन खौफ कम नहीं हुआ। मुरली और सुदामा देवी डर के कारण अपना घर उजाड़ने को मजबूर हैं। कहते हैं, नहर किनारे रहना अब जान जोखिम में डालना है। कहीं और घर बसाएंगे, जहां हमले का डर न हो। पास ही मालती कहती हैं, सूरज ढलते ही बच्चों को लेकर घर में बंद हो जाते हैं। अब सुबह होने का इंतजार ही जिंदगी का हिस्सा है।
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घर के भीतर सिमटी जिंदगी
बड़खड़िया ग्राम पंचायत के आनंदपुरवा में 7 सितंबर की रात करीब आठ बजे नौ साल का राजवीर घर के बाहर नल से पानी लेने गया था। मां कंसीला की आंखों के सामने तेंदुए ने उस पर हमला कर दिया और उसकी जान चली गई। राजवीर के घर पहुंचे तो दरवाजे पर मां गुमसुम बैठी थीं। आवाज दी, लेकिन वह कुछ नहीं बोलीं। उनकी चुप्पी में बेटे को खोने का पूरा दर्द था। राजवीर की बुआ संजू कहती हैं पहले शाम क्या रात में भी कहीं आते जाते थे, बाहर भी सो जाते थे, लेकिन अब तो शाम ढलते ही बच्चों को लेकर घर के अंदर बंद हो जाते हैं। बच्चे से लेकर बड़े तक घर के अंदर शौचालय आदि करते हैं, सुबह फेंक देते हैं। लेकिन बाहर नहीं निकलते। संजू बताती हैं कि घर के बाहर खंभे पर लाइट लगाने की मांग पहले से की जा रही थी। लाइट होती तो शायद तेंदुआ नहीं आता। घटना के बाद लाइट लगा दी गई, लेकिन अब तो नुकसान हो गया।
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बाजार से लौटते समय लगता है डर
अलग अलग गांवों के बाजारों में सब्जी बेचने वाले चफरिया बाजार के रवींद्र बताते हैं कि पहले तेंदुओं का ऐसा खौफ नहीं था। जंगल से आते-जाते कभी-कभार दिख जाते थे, लेकिन हमला नहीं करते थे। अब वे गांव और घरों तक पहुंच रहे हैं। शाम को बाजार से लौटते समय डर लगा रहता है। सूरज ढलने के बाद बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलने देते। पहले जहां बाजार से लौटना रोजमर्रा की बात थी, अब हर शाम घर पहुंचने तक डर बना रहता है।


शाम को जाने से पहले सोचना पड़ता है
जमुनहा मोड़ पर बाघ मित्र संदीप सिंह कहते हैं कि तेंदुओं के बढ़ते हमलों ने ग्रामीणों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। तीन-चार साल पहले तक इलाके में तेंदुओं का इतना आतंक नहीं था। लोग बेखौफ खेतों में काम करते और कहीं भी आते-जाते थे। अब अंधेरा होते ही डर सताने लगता है। तेंदुए के हमलों ने गांवों की शामें बदल दी हैं। हालात ऐसे हैं कि शाम के बाद कहीं जाने से पहले लोगों को कई बार सोचना पड़ता है।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

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बहराइच में हालात की जानकारी देते ग्रामीण।

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