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अब नहीं रहा तीज को वो उल्लास
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बुजुर्ग महिलाएं बोली, अब और पहले के सावन में जमीन-आसमान का अंतर
कुछेक परिवार और संगठन ही निभा रहे परंपरा
बड़ौत। सावन मास को लेकर बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि तीजोत्सव का वो उल्लास अब नहीं रहा। आज ना तो महिलाएं झूला झूलती है और ना ही सावन के गीत गाए जाते हैं। बस कुछेक परिवार और संगठन ही इस परंपरा को निभा रहे है। कहा कि हमें अपने पर्व उल्लास के साथ मनाने चाहिए।
जीवन के 85 वसंत देख चुकी जयदेवी का कहना है कि सावन मास के पर्वों को लेकर लोगों में इतना उल्लास नहीं रहा। ना तो सावन के गीत गाए जाते हैं और ना ही कहीं झूला दिखाई देते हैं। पहले महिलाएं एकत्र होकर झूल झूलने जाती थी। सामूहिक रूप में गीत गाती थी।
90 वर्षीय रत्नकौर का कहना है कि सावन पर्व पर इस बार कोरोना महामारी का भी असर पड़ा है। थोड़ा बहुत सावन का उल्लास होता था वह भी इस बार नहीं रहा। महिलाओं को चाहिए कि वे अपनी संस्कृति के संरक्षण पर ध्यान दें। हमारे जमाने में तो एक माह पहले ही पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते थे और कई घरों की महिलाएं एकत्रित होकर एक साथ झूला करती थी। लेकिन अब पहले जमाने जैसी बात कहा।
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88 वर्षीय कांता देवी का कहना है कि सावन मास इस बार फीका रहा है। कोरोना महामारी के कारण ज्यादा असर पड़ा है। सावन में हरिद्वार से कांवड़ भी इस बार नहीं पहुंची। सावन पर्व को लेकर पहले ही उल्लास कम था। त्योहारों को उनकी नैसर्गिकता से मनाना चाहिए।
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कुछेक परिवार और संगठन ही निभा रहे परंपरा
बड़ौत। सावन मास को लेकर बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि तीजोत्सव का वो उल्लास अब नहीं रहा। आज ना तो महिलाएं झूला झूलती है और ना ही सावन के गीत गाए जाते हैं। बस कुछेक परिवार और संगठन ही इस परंपरा को निभा रहे है। कहा कि हमें अपने पर्व उल्लास के साथ मनाने चाहिए।
जीवन के 85 वसंत देख चुकी जयदेवी का कहना है कि सावन मास के पर्वों को लेकर लोगों में इतना उल्लास नहीं रहा। ना तो सावन के गीत गाए जाते हैं और ना ही कहीं झूला दिखाई देते हैं। पहले महिलाएं एकत्र होकर झूल झूलने जाती थी। सामूहिक रूप में गीत गाती थी।
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90 वर्षीय रत्नकौर का कहना है कि सावन पर्व पर इस बार कोरोना महामारी का भी असर पड़ा है। थोड़ा बहुत सावन का उल्लास होता था वह भी इस बार नहीं रहा। महिलाओं को चाहिए कि वे अपनी संस्कृति के संरक्षण पर ध्यान दें। हमारे जमाने में तो एक माह पहले ही पेड़ों पर झूले डाल दिए जाते थे और कई घरों की महिलाएं एकत्रित होकर एक साथ झूला करती थी। लेकिन अब पहले जमाने जैसी बात कहा।
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88 वर्षीय कांता देवी का कहना है कि सावन मास इस बार फीका रहा है। कोरोना महामारी के कारण ज्यादा असर पड़ा है। सावन में हरिद्वार से कांवड़ भी इस बार नहीं पहुंची। सावन पर्व को लेकर पहले ही उल्लास कम था। त्योहारों को उनकी नैसर्गिकता से मनाना चाहिए।