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सुखबीर सिंह ने बचाई, इसलिए निरपुड़ा में चहचहा रही गौरेया
Updated Mon, 17 Dec 2018 01:11 AM IST
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बागपत। कभी घर-घर और आंगन-आंगन का अटूट हिस्सा रहने वाली गौरेया अब बातों और यादों तक सिमटने लगी है, लेकिन निरपुड़ा गांव में ऐसा नहीं है। बुजुर्ग सुखबीर सिंह राणा (90) ने मेहनत कर चिड़ियों को आशियाना दिया, जिसकी बदौलत उनके घर और गली में रोजाना गौरेया चहचहाती हैं। चिड़िया गांव के बच्चों के लिए उत्सुकता का केंद्र बन जाती है। बुजुर्ग कहता है कि अगर प्रत्येक व्यक्ति चिड़ियों को बचाने में सहयोग करें तो फिर से इनकी दुनिया आबाद हो जाएगी।
बच्चों के लिए गोरैया अब किताबों और कहानियां की बात ही अधिक लगती है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर ही बच्चों के लिए गौरेया उपलब्ध है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। बागपत के निरपुड़ा गांव में हालांकि इन चिड़ियों की मधुर आवाज अभी भी सुनाई देती हैं। इसकी वजह है बुजुर्ग किसान सुखबीर सिंह राणा का प्रयास। एक या दो दिन नहीं बल्कि पिछले 25 साल से वह गौरेया को बचाने के प्रयास में जुटे हैं। रोज सुबह गौरेया के लिए दाने पानी का इंतजाम करते हैं और यहां तक की रहने के लिए सुरक्षित ठिकाने भी गौरेया को उपलब्ध कराए गए हैं। सुखवीर सिंह बताते हैं कि उन्हें गौरेया बचपन से ही पसंद है। रोज सुबह करीब नौ बजे और शाम को चार बजे गौरेया दाना खाने के लिए उनके घर पर जरूर आती है।
गौरेया को बाज से बचाने के लिए खरीदी एयरगन
बागपत। सुखबीर सिंह राणा बताते हैं कि वह गौरेया को बचाने के लिए पानी का प्रबंध रखते हैं। कई बार देखा कि बाज गौरेया को पकड़कर ले जाता था, इसलिए उन्होंने बाज से गौरेया को बचाने के लिए एयरगन भी खरीदी।
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गौरेया को संरक्षण देना जरूरी
बागपत। किसान सुखबीर सिंह कहते हैं कि पर्यावरण को सहज बनाते हुए और मानवीय जीवन के साथ गौरेया जैसी चिड़िया का अस्तित्व बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम उनके घोंसलों को संरक्षण दें। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करें और चिड़िया को बचाने के लिए आगे आएं, जिससे गौरेया को बचाया जा सके।
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बच्चों के लिए गोरैया अब किताबों और कहानियां की बात ही अधिक लगती है। सोशल मीडिया और इंटरनेट पर ही बच्चों के लिए गौरेया उपलब्ध है, लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं है। बागपत के निरपुड़ा गांव में हालांकि इन चिड़ियों की मधुर आवाज अभी भी सुनाई देती हैं। इसकी वजह है बुजुर्ग किसान सुखबीर सिंह राणा का प्रयास। एक या दो दिन नहीं बल्कि पिछले 25 साल से वह गौरेया को बचाने के प्रयास में जुटे हैं। रोज सुबह गौरेया के लिए दाने पानी का इंतजाम करते हैं और यहां तक की रहने के लिए सुरक्षित ठिकाने भी गौरेया को उपलब्ध कराए गए हैं। सुखवीर सिंह बताते हैं कि उन्हें गौरेया बचपन से ही पसंद है। रोज सुबह करीब नौ बजे और शाम को चार बजे गौरेया दाना खाने के लिए उनके घर पर जरूर आती है।
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गौरेया को बाज से बचाने के लिए खरीदी एयरगन
बागपत। सुखबीर सिंह राणा बताते हैं कि वह गौरेया को बचाने के लिए पानी का प्रबंध रखते हैं। कई बार देखा कि बाज गौरेया को पकड़कर ले जाता था, इसलिए उन्होंने बाज से गौरेया को बचाने के लिए एयरगन भी खरीदी।
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गौरेया को संरक्षण देना जरूरी
बागपत। किसान सुखबीर सिंह कहते हैं कि पर्यावरण को सहज बनाते हुए और मानवीय जीवन के साथ गौरेया जैसी चिड़िया का अस्तित्व बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम उनके घोंसलों को संरक्षण दें। प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करें और चिड़िया को बचाने के लिए आगे आएं, जिससे गौरेया को बचाया जा सके।