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बिना गुरु के ज्ञान भवसागर से पार उतरना मुश्किल

Sat, 08 Jul 2017 11:39 PM IST
Updated Sat, 08 Jul 2017 11:39 PM IST
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बिना गुरु के ज्ञान  भवसागर से पार उतरना मुश्किल
अतरौलिया। अधूरा ज्ञान हमेशा घातक होता है और बिना गुरु के कोई भी पूर्ण ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता है। गुरु की महिमा का वर्णन रामचरित मानस और गीता जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। गुरु को भगवान से भी ऊपर रखा गया है क्योंकि इस संसार रूपी भवसागर से वही ज्ञानरूपी दीपक से नैया को पार लगाता है।
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गुुरु की महिमा का वर्णन करते हुए बाबा बहिरा देव आश्रम के महंत प्रेमदास ने कहा कि बिन गुरु भवनिधि तरय न कोई, जो बिरंचि शंकर सम होई अर्थात बिना गुरु के कोई इस भवसागर को पार नहीं कर सकता है। गुरु भगवान शंकर के समान होता है। बोले जब एकादशी को भगवान विष्णु शयन कर जाते हैं तो सृष्टि संचालन की सारी व्यवस्था गुरुतर व्यवस्था के अंतर्गत हो जाती है। जिसके बाद आने वाली प्रथम पूर्णिमा को ही उस परात्पर गुरुतर व्यवस्था का वंदन, अभिनंदन, पूजन लोग अपनी क्षमता के अनुरूप करते हैं। यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है इस परंपरा की कड़ी में बाबा बहिरादेव आश्रम के प्रथम संत मुसई दास इस आश्रम पर गुरु के रुप में रहे। उनके बाद हरिवंश दास ने गुरू की गद्दी संभाली। महंत प्रेमदास ने कहा कि जहां तक गुरु के महत्व का सवाल है तो इसे वाणी कह नहीं सकती और लेखनी लिख नहीं सकती। क्योंकि कबीरदास ने कहा है कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। लेकिन इस भवसागर रुपी समुद्र की 84 लाख योनि से ऊपर मानव जीवन जो प्राप्त है बिना गुरु के मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता। क्योंकि मानव जीवन के लिए ही शास्त्रों ने चार सीढ़ी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तैयार की है। बिना गुरु के इन सीढ़ियों पर यात्रा नहीं की जा सकती है। महंत प्रेमदास ने कहा कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर भक्तों से और समाज के लोगों से यही अपेक्षा है कि लोग अपने-अपने गुरु की पूजा अर्चना के साथ-साथ उनके बताए मार्ग पर चलकर समाज और देश के लिए कार्य करें। एक आदर्श परिवार के लिए अपने सनातन संस्कृति की मर्यादा का पोषक बनकर निष्ठा से लगें। जिससे सबका कल्याण हो सके। बिना गुरु के जीवन अधूरा होता है।
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