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बाढ़ तो गुजर गई, बालू अभी मुसीबत बनी
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यमुना किनारे खेत में जमा बालू दिखाता विनोद कुमार
- फोटो : AURAIYA
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अयाना(औरैया)। यमुना में आई बाढ़ के बाद खेतों में जमा हुई रेत (बालू) किसानों के लिए मुसीबत बन कर रह गई है। एक वर्ष बीतने के बाद भी प्रशासन यमुना किनारे स्थित खेतों से बालू नहीं हटवा सका। इस वजह से किसान खेत में होने वाली लाही, बाजरा, सिहुआ आदि की फसल भी नहीं बो पाए। कई परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। ऐसा नहीं है कि किसानों ने प्रशासनिक अधिकारियों से बालू की नीलामी कराने की गुहार नहीं लगाई पर उनकी गुहार पर ध्यान नहीं दिया गया।
पिछले वर्ष अगस्त-सितंबर माह में यमुना में आई बाढ़ से अजीतमल और औरैया तहसील के करीब 26 गांव प्रभावित हुए थे। कई परिवार घर से बेघर हुए तो कुछ की गृहस्थियां उजड़ गईं। सीएम से लेकर तमाम मंत्रियों व जनप्रतिनिधियों ने दौरे कर पीड़ितों को आर्थिक मदद दिलाई, लेकिन कुछ समस्याओं पर प्रशासन ने कतई ध्यान नहीं दिया।
यमुना किनारे के गांव गूंज, ततारपुर, जुहीखा के करीब दो सौ बीघा एतमाली (यमुना के किनारे की जमीन) में बाढ़ के दौरान बालू बह कर आ गई, अधिकतर जमीन उन किसानों की थी जिन्हें पट्टा दिया गया था। किसान श्याम सिंह, जगदीश, ओमप्रकाश, विनोद कुमार आदि ने बताया कि इस जमीन पर वह लाही, बाजरा, सिहुआ, अंडी के साथ सब्जी की फसलें बो लेते थे।
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बालू की वजह से इस बार लाही, बाजरा व अन्य फसलें नहीं बो सके। इससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। बाढ़ के बाद न तो बालू हटाई गई और न ही मुआवजा मिला। एसडीएम, अजीतमल अखिलेश कुमार ने कहा कि यमुना किनारे जिन खेतों में बालू है। इसको लेकर किसी भी तरह की तहसील में शिकायत व जानकारी नहीं दी गई है। यदि ऐसा है तो जानकारी कर तत्काल इस पर अमल किया जाएगा और किसानों की मदद की जाएगी।
बालू हटवाने के लिए लेनी पड़ती है अनुमति
जिन किसानों के नाम पट्टे की जमीन है, उन्होंने बताया कि बाढ़ के दौरान बह कर आई बालू के संबंध में शुरुआत में ही लेखपालों व तहसील प्रशासन को जानकारी दी गई। इस पर कुछ ने परमीशन लेकर बालू स्वयं से हटवाने की सलाह दी, लेकिन किसान असमर्थ रहे। इससे आज तक बालू नहीं हट पाई और फसल न बो पाने से आर्थिक संकट गहरा गया है।
पशुओं के सामने चारे का संकट
यमुना किनारे की जमीन पर तमाम किसान फसली पैदावार करने के साथ पशुओं के चारे के लिए प्रबंध करते हैं, लेकिन बालू जमा होने से इस बार चारे का भी संकट रहा। एक वर्ष से इसी आस में किसान रहे कि प्रशासन जल्द इसका समाधान कराएगा।
बालू हटाने के लिए होती नीलामी
जिस तरह यमुना घाट पर बालू खनन के लिए नीलामी की जाती है। ठीक उसी प्रकार खेतों में बह कर आई बालू हटाने की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के फेर में किसान फंसे रहे और आज तक उनकी समस्या का निदान नहीं हो सका। कानूनगो कृष्णवीर सिंह ने बताया कि बाढ़ के दौरान बह कर खेतों तक पहुंची बालू को हटाने के लिए टेंडर प्रक्रिया की जाती है। यदि किसान स्वयं खेतों से बालू उठवाना चाहे तो उसे खनन विभाग से अनुमति लेकर मानक के आधार पर रायॅल्टी जमा करनी होगी। इसके बाद किसान खेतों से बालू उठवा सकते हैं।
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पिछले वर्ष अगस्त-सितंबर माह में यमुना में आई बाढ़ से अजीतमल और औरैया तहसील के करीब 26 गांव प्रभावित हुए थे। कई परिवार घर से बेघर हुए तो कुछ की गृहस्थियां उजड़ गईं। सीएम से लेकर तमाम मंत्रियों व जनप्रतिनिधियों ने दौरे कर पीड़ितों को आर्थिक मदद दिलाई, लेकिन कुछ समस्याओं पर प्रशासन ने कतई ध्यान नहीं दिया।
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यमुना किनारे के गांव गूंज, ततारपुर, जुहीखा के करीब दो सौ बीघा एतमाली (यमुना के किनारे की जमीन) में बाढ़ के दौरान बालू बह कर आ गई, अधिकतर जमीन उन किसानों की थी जिन्हें पट्टा दिया गया था। किसान श्याम सिंह, जगदीश, ओमप्रकाश, विनोद कुमार आदि ने बताया कि इस जमीन पर वह लाही, बाजरा, सिहुआ, अंडी के साथ सब्जी की फसलें बो लेते थे।
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बालू की वजह से इस बार लाही, बाजरा व अन्य फसलें नहीं बो सके। इससे उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया। बाढ़ के बाद न तो बालू हटाई गई और न ही मुआवजा मिला। एसडीएम, अजीतमल अखिलेश कुमार ने कहा कि यमुना किनारे जिन खेतों में बालू है। इसको लेकर किसी भी तरह की तहसील में शिकायत व जानकारी नहीं दी गई है। यदि ऐसा है तो जानकारी कर तत्काल इस पर अमल किया जाएगा और किसानों की मदद की जाएगी।
बालू हटवाने के लिए लेनी पड़ती है अनुमति
जिन किसानों के नाम पट्टे की जमीन है, उन्होंने बताया कि बाढ़ के दौरान बह कर आई बालू के संबंध में शुरुआत में ही लेखपालों व तहसील प्रशासन को जानकारी दी गई। इस पर कुछ ने परमीशन लेकर बालू स्वयं से हटवाने की सलाह दी, लेकिन किसान असमर्थ रहे। इससे आज तक बालू नहीं हट पाई और फसल न बो पाने से आर्थिक संकट गहरा गया है।
पशुओं के सामने चारे का संकट
यमुना किनारे की जमीन पर तमाम किसान फसली पैदावार करने के साथ पशुओं के चारे के लिए प्रबंध करते हैं, लेकिन बालू जमा होने से इस बार चारे का भी संकट रहा। एक वर्ष से इसी आस में किसान रहे कि प्रशासन जल्द इसका समाधान कराएगा।
बालू हटाने के लिए होती नीलामी
जिस तरह यमुना घाट पर बालू खनन के लिए नीलामी की जाती है। ठीक उसी प्रकार खेतों में बह कर आई बालू हटाने की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के फेर में किसान फंसे रहे और आज तक उनकी समस्या का निदान नहीं हो सका। कानूनगो कृष्णवीर सिंह ने बताया कि बाढ़ के दौरान बह कर खेतों तक पहुंची बालू को हटाने के लिए टेंडर प्रक्रिया की जाती है। यदि किसान स्वयं खेतों से बालू उठवाना चाहे तो उसे खनन विभाग से अनुमति लेकर मानक के आधार पर रायॅल्टी जमा करनी होगी। इसके बाद किसान खेतों से बालू उठवा सकते हैं।

बालू दिखाता किसान विनोद सिंह। संवाद- फोटो : AURAIYA

गांव में बालू न हटाए जाने की जानकारी देते किसान। संवाद- फोटो : AURAIYA