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Auraiya News: मेले की रंगत फीकी, परंपराओं तक सिमटा
Fri, 28 Aug 2026 11:47 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Fri, 28 Aug 2026 11:47 PM IST
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फोटो -30- खिलौने की दुकान पर सामान देखती महिला। संवाद
औरैया। रक्षाबंधन का पावन पर्व एक ओर भाई-बहन के प्रेम और खुशियों की सौगात लेकर आता है, वहीं शहर की पुरानी परंपराएं अब धीरे-धीरे अपने वजूद की जंग लड़ती नजर आ रही हैं। रक्षाबंधन के मौके पर सत्ती तालाब के समीप लगने वाले ऐतिहासिक मेले की रौनक अब पूरी तरह फीकी पड़ चुकी है। करीब एक दशक पहले तक जिस मेले को लेकर पूरे शहर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में भारी क्रेज रहता था, वह अब सिर्फ पुरानी परंपरा को निभाने की एक औपचारिकता बनकर रह गया है।
स्थानीय लोगों के अनुसार रक्षाबंधन पर सत्ती तालाब का विशेष महत्व रहा है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक लोग यहां पहुंचकर अपनी पारंपरिक भुजरियां सिराते हैं। अतीत में भुजरियां विसर्जित करने के बाद लोग अपने परिवारों और बच्चों के साथ घंटों मेले का आनंद उठाया करते थे। तालाब परिसर के आसपास दिनभर चहल-पहल और खिलखिलाहट गूंजती थी लेकिन अब समय बीतने के साथ यह मेला महज एक दिखावा साबित हो रहा है।
कभी बच्चों की पहली पसंद रहने वाला यह मेला अब आधुनिकता और डिजिटल दौर की भेंट चढ़ गया है। मेले में सजने वाली खिलौनों की दुकानें और छोटे-बड़े झूले भी अब बच्चों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। झूले वाले और छोटे व्यापारी दिनभर ग्राहकों का इंतजार करते नजर आए।
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स्थानीय लोगों के अनुसार रक्षाबंधन पर सत्ती तालाब का विशेष महत्व रहा है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक लोग यहां पहुंचकर अपनी पारंपरिक भुजरियां सिराते हैं। अतीत में भुजरियां विसर्जित करने के बाद लोग अपने परिवारों और बच्चों के साथ घंटों मेले का आनंद उठाया करते थे। तालाब परिसर के आसपास दिनभर चहल-पहल और खिलखिलाहट गूंजती थी लेकिन अब समय बीतने के साथ यह मेला महज एक दिखावा साबित हो रहा है।
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कभी बच्चों की पहली पसंद रहने वाला यह मेला अब आधुनिकता और डिजिटल दौर की भेंट चढ़ गया है। मेले में सजने वाली खिलौनों की दुकानें और छोटे-बड़े झूले भी अब बच्चों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। झूले वाले और छोटे व्यापारी दिनभर ग्राहकों का इंतजार करते नजर आए।

फोटो -30- खिलौने की दुकान पर सामान देखती महिला। संवाद
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