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सहकारी समितियों पर नहीं ले रहे पुराने नोट

Wed, 23 Nov 2016 11:45 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/अंबेडकरनगर
अमर उजाला ब्यूरो/अंबेडकरनगर Updated Wed, 23 Nov 2016 11:45 PM IST
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Cooperatives are not taking old currency
पुराने नोट - फोटो : symbolic

सरकार ने किसानों को राहत दिलाने के लिए अब तक घोषणाएं तो कई की लेकिन जमीनी हकीकत यह कि किसानों को अभी भी खाद व बीज के लिए भटकना ही पड़ रहा हैै। 13 नवंबर के बाद से जिले की सभी 91 साधन सहकारी समितियों पर 500 रुपये के पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं। कोई नया आदेश भी अभी तक जिले में नहीं पहुंच सका है।

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इसका खामियाजा सीधे रबी फसल की तैयारी में जुटे किसानों को भुगतना पड़ रहा है। उधर, केसीसी से भी सरकार की घोषणा के बावजूद प्रति सप्ताह 25 हजार की निकासी नहीं हो पा रही है। इससे भी किसानों की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। नोटबंदी के बाद से ही जिले में किसानों की मुश्किलें चरम पर हैं।
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इन दिनों रबी की बोआई का दौर चल रहा है। इसमें किसानों को खाद-बीज की जरूरत है। किसान जब अपने पास मौजूद रकम से यह सब तैयारी करने में जुटा था, तभी तीन सप्ताह पहले पुराने बड़े नोट बैन कर दिए गए। किसानों के सामने तब सबसे बड़ी समस्या खाद-बीज की ही आई।
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चारों तरफ हाहाकार मचा, तब सरकार ने एलान किया कि 500 रुपये के पुराने नोट से किसानों को खाद व बीज खरीदने की सुविधा मिल सकेगी। इस सुविधा का लाभ किसानों को 13 नवंबर तक मिला भी लेकिन शुरुआती आदेश चूंकि 13 नवंबर तक के लिए ही मिला था, इसलिए 13 नवंबर के बाद किसानों को इसका लाभ मिलना बंद हो गया। किसान तब से खाद व बीज के लिए भटक रहे हैं।

जिले में कुल 91 साधन सहकारी समितियां हैं। इन सभी पर 500 रुपये के पुराने नोट स्वीकार नहीं किए जा रहे। किसानों को इससे खाद खरीदने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। समितियों से निराश किसान निजी खाद विक्रेताओं का रुख करने को विवश हैं। वहां भी स्थिति उनके लिए सामान्य नहीं। ज्यादातर खाद विक्रेता पुराने नोट स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

जैसे-तैसे ही किसानों को खाद का प्रबंध करना पड़ रहा हैै। जिला मुख्यालय स्थित राजकीय बीज भंडार पर तो 500 रुपये के पुराने नोट स्वीकार किए जा रहे हैं लेकिन निजी बीज दुकानदार आमतौर पर यह नोट ग्राहकों से नहीं ले रहे हैं। इससे किसानों को गेहूं, सरसों, चना व मटर का बीज खरीदने में खासी मुश्किल हो रही।

जिला मुख्यालय स्थित जिला सहकारी बैंक से भुगतान लेने में भी किसानों को पसीने छूट रहे। कारण यह कि बैंक को औसतन दो लाख रुपये ही प्रतिदिन मिल पा रहे हैं जबकि जरूरत लगभग पांच लाख के आसपास है। अब जबकि केंद्र सरकार ने सहकारी बैंकों के लिए 21 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है, तब इससे किसानों में एक नई उम्मीद जगी है।

किसानों का कहना है कि पैकेज देने के साथ ही इसका प्रभावी क्रियान्वयन भी तय करना होगा। जिला सहकारी बैंक के प्रबंधक राममिलन ने बताया कि 13 नवंबर तक ही 500 के पुराने नोट समितियों पर लिए जाने के निर्देश प्राप्त हुए थे।


इसके बाद से कोई नया आदेश नहीं पहुंचा है। इसलिए सभी 91 समितियों पर पुराने नोट नहीं लिए जा रहे हैं। जिला सहकारी बैंक से फिलहाल प्रतिदिन औसतन दो लाख का भुगतान हो रहा है। नाबार्ड के पैकेज का लाभ मिलने के बाद भुगतान में तेजी आने की उम्मीद है।  

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