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हाईकोर्ट : रेलवे हादसे में मुआवजे की 90 फीसदी राशि रोकना गलत, पूरी जारी करें
Wed, 16 Sep 2026 09:29 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Wed, 16 Sep 2026 09:29 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटना में मौत या घायल होने पर रेलवे दावा अधिकरण (आरसीटी) की ओर से मुआवजे की 90 फीसदी राशि बैंक में एफडी करने और केवल 10 फीसदी राशि जारी करने की व्यवस्था को गलत माना है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटना में मौत या घायल होने पर रेलवे दावा अधिकरण (आरसीटी) की ओर से मुआवजे की 90 फीसदी राशि बैंक में एफडी करने और केवल 10 फीसदी राशि जारी करने की व्यवस्था को गलत माना है। कोर्ट ने वयस्क दावेदार को पूरी मुआवजा राशि जारी करने का आदेश दिया।
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यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने वाराणसी के राम नरेश सिंह और अन्य की याचिका के साथ संलग्न 17 याचिकाओं पर दिया। याची रामनरेश की मां की रेल हादसे में मौत हो गई थी। रेलवे दावा अधिकरण ने उनके पक्ष में आठ लाख रुपये का मुआवजा घोषित किया था। इसमें से उन्हें 10 प्रतिशत का भुगतान कर दिया गया था और बाकी रुपये पांच साल के लिए एफडी कर दिए गए थे। इसके खिलाफ इन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
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रेलवे की दलील...शोषण से बचाने के लिए किया जाता है एफडी
याचिकाओं में रेलवे दुर्घटना एवं अप्रिय घटनाएं (मुआवजा) नियम-1990 के नियम 5.1 और 5.4.1 को चुनौती दी गई थी। रेलवे की ओर से अधिवक्ता गौरव विशेन ने दलील दी कि रेलवे हादसे में स्वीकृत मुआवजे का 10 प्रतिशत राशि पीड़ितों को दे दी जाती थी। बाकी 90 प्रतिशत राशि बैंक में एफडी करा दी जाती थी। इसकी मुख्य वजह थी कि ज्यादातर पीड़ित अशिक्षित, आर्थिक रूप से अक्षम और सीधे-साधे होते हैं। ऐसे में उन्हें बिचौलियों व दलालों के शोषण से बचाने के लिए एफडी किया जाता है। याची की ओर से दलील दी गई कि मुआवजे की राशि जारी करने में साक्षरता और आर्थिक स्थिति के आधार पर दावेदारों के बीच अंतर नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने कहा-कोई गरीब या निरक्षर अपनी राशि का प्रबंधन नहीं कर पाएगा यह तर्क अनुचित
कोर्ट ने कहा कि साक्षरता या आर्थिक आधार पर दावेदारों के बीच मुआवजे में अंतर करना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। इस दौर में यह अनुचित है कि कोई गरीब या निरक्षर व्यक्ति अपनी राशि का प्रबंधन नहीं कर पाएगा। कोर्ट ने मुआवजे का 10 प्रतिशत जारी करना बाकी एफडी में रखने को तर्कहीन करार दिया। कोर्ट ने कहा कि बालिग अपने पैसों के उपयोग का निर्णय लेने के स्वतंत्र होता है अधिकरण या राज्य शर्तें नहीं थोप सकता। इसी के साथ कोर्ट ने अधिकरण को मुआवजा राशि दावेदार के सत्यापित खाते में जारी करने का आदेश दिया। पहले से एफडी में रखी गई राशि भी तत्काल जारी करने के लिए कहा।