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संन्यासियों को सजा के लिए अखाड़े में अदालत

Fri, 11 Jan 2019 01:36 AM IST
देव कश्यप अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: देव कश्यप Updated Fri, 11 Jan 2019 01:36 AM IST
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The court in the arena for the punishment of the sannyasins
akhada parishad - फोटो : amar ujala
सभी को संयम और अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले साधु-संन्यासी भी अगर कोई अपराध करते हैं, तो उन्हें भी सजा मिलेगी। हालांकि अखाड़ों के साधु-संतों, संन्यासियों के लिए उनकी अपनी ही अदालत है, जहां उन्हें धर्म विधान के मुताबिक दंड दिया जाता है। अपराध किया है तो दंड भी अवश्य मिलेगा, फिर चाहे कोई छोटा हो या बड़ा, धर्मध्वजा के नीचे सभी एक समान हैं। शैव पंचायती अखाड़ों में यही व्यवस्था आरंभ हो गई है।
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वस्तुत: धर्मध्वजा की स्थापना के साथ ही अखाड़े की छावनी में आराध्य की सत्ता सर्वोच्च हो जाती है। इसीलिए अखाड़ों की इस अदालत में बार-बार तारीखें नहीं बल्कि जल्द से जल्द फैसला लिया जाता है। जैसे ही किसी साधु-संन्यासी पर कोई अपराध या आरोप तय होगा, उसे प्रधानीय व्यवस्था के तहत ‘चेहरा-मोहरा’ पर उपस्थित होकर अपनी सफाई देनी होगी। जैसा अपराध हुआ, सजा भी उसी के मुताबिक तय की जाएगी।
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निरंजनी अखाड़े के प्रधान श्रीमहंत दिनेश गिरि कहते हैं, अपराध के मुताबिक ही दंड दिया जाता है लेकिन यह आर्थिक नहीं बल्कि धार्मिक दंड होता है। सजा जितनी गंभीर हुई, गंगा में डुबकी से लेकर अखाड़े से निष्कासन तक दंड भी वैसा ही मिलेगा। दंड के तहत दोषी साधु को अखाडे़ में सेवा करने से लेकर बर्तन, भंडारा, छावनी में काम करने के साथ संतों को दातून तक उपलब्ध कराना तक  है। कोशिश इतनी ही कि उसे अपनी भूल का अहसास हो जाए।
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निरंजनी की ही बात करें तो मेले की पूरी अवधि को चार भागों में बांट कर आठ प्रधानों को उसकी जिम्मेदारी दे दी गई है। इसी तरह प्रत्येक चरण के लिए दो-दो कोतवालों की नियुक्ति की गई है। आमतौर पर दो प्रधान 11 दिनों के लिए जज होते हैं। इन्हीं दोनों के पास अखाड़े के कोतवाल अपराधियों को पकड़कर लाते हैं। फिर पंच उनके बारे में फैसला करते हैं।
अखाड़े के कोतवाल के साथ गंगा में पांच से लेकर 108 डुबकी लगाने सहित भीगे कपड़े में ही देवस्थान पर आक र भूल स्वीकार करनी होती है। ब्रह्मजली से जल देकर उन्हें शुद्ध किया जाता है और तब वह फिर से अखाड़े में शामिल हो सकेगा। लेकिन यदि विवाह, हत्या या दुष्कर्म जैसे मामलों में उसे अखाड़े से निष्कासित कर दिया जाता है।


छावनी से परे अखाड़े के मुख्यालय में न्याय पाने के लिए पीड़ित कोई भी साधु किसी भी समय परिसर में लगा ‘दशनामी घंटा’ बजाता है। सायरन की तरह इसके बजते ही सभी एक जगह एकत्र होते हैं और तब पंच फैसला देते हैं।
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