चुंबक रिव्यू: मोहल्ले में सबको सबकी पड़ी है, लेकिन क्या दर्शक को भी ‘चुम्बक’ में दिलचस्पी रहेगी? पढ़ें रिव्यू
Web Series Chumbak Review: नीना गुप्ता, देवेन भोजानी, सुमित व्यास और अर्जुन बिजलानी जैसे बड़े कलाकारों से सजी वेब सीरीज चुंबक रिलीज हो चुकी है। जानिए कैसी है इसकी कहानी?
विस्तार
मोहल्ले की एक खासियत होती है। आपको अपने घर की खबर हो न हो, बगल वाले घर में क्या चल रहा है, इसकी पूरी जानकारी होती है। किसकी शादी में दिक्कत है, किसका पति नाराज है, किसके बच्चे क्या कर रहे हैं...सब पता रहता है। नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘चुम्बक’ इसी आदत को पकड़कर बनाई गई है। यहां पड़ोसी सिर्फ खबर नहीं रखते। मौका मिलते ही मामला सुलझाने भी पहुंच जाते हैं।
निर्माता जेडी मजेठिया के लिए यह दुनिया नई नहीं है। ‘आर.के. लक्ष्मण की दुनिया’, ‘बड़ी दूर से आए हैं’, ‘भाखरवड़ी’ और ‘वागले की दुनिया’ में अलग-अलग परिवारों और पड़ोसियों की रोजमर्रा की उठापटक देख चुके हैं। ‘चुम्बक’ भी उसी दुनिया में जाती है।
इस बार पांच परिवार एक ही कॉलोनी में रहते हैं। उनकी जिंदगी में कई उलझनें शुरू होती हैं.... लेकिन कुछ सवालों के जवाब पहले सीजन में नहीं मिलते। अब इनका आगे क्या होगा, यह दूसरे सीजन में पता चलेगा।
कहानी: तलाक से शुरू हुआ मामला पहुंच गया पूरे मोहल्ले तक
मुंबई की चुम्बक कॉलोनी में हर कोई अपनी जिंदगी में व्यस्त है। दूसरों के घर में क्या चल रहा है, यह जानने का समय फिर भी सबके पास है।
कहानी रजनी मर्चेंट (नीना गुप्ता) के तलाक के फैसले से शुरू होती है। वह बताती हैं कि शादी से पहले 20 साल भाई और पिता की सेवा में निकल गए। शादी के बाद 22 साल बेटे के पीछे बीते। पिछले एक साल से पति कुकू (देवेन भोजानी) की भूलने की आदत ने उनकी मुश्किल और बढ़ा दी है। अब रजनी तलाक चाहती हैं। अपनी जिंदगी जीना चाहती हैं। उनका फैसला आखिरी है।
बस, यहीं से मामला पूरे मोहल्ले का हो जाता है। कोई रजनी की शादी बचाने में लगा है। किसी की अपनी शादी में दिक्कत है। किसी के रिश्ते में दूरी है। किसी के घर में रोज की खटपट है। दूसरों की शादी बचाने निकले पड़ोसी धीरे-धीरे अपनी परेशानियां भी सामने लाने लगते हैं।
धर्मेंद्र केजरीवाल (सुमित राघवन) एक कॉमेडी शो में महिला का रोल करते हैं। अक्सर उसी गेटअप में नजर आते हैं। किरण केजरीवाल (संदीपा धर) को घर पर भी उनका यही रूप खटकता है। दोनों की नोकझोंक कई जगह हंसाती है।
मिकी-ट्विंकल (अर्जुन बिजलानी-हेली शाह), आदित्य-प्रियंका (सुमित व्यास-मानसी पारेख) और पारसी परिवार के मम्मा गुलशन, फ्रेडी और हटोक्सी (देलनाज ईरानी, अनंत जोशी और अमायरा दस्तूर) की कहानियां भी साथ चलती हैं।
शुरुआत में इतने किरदार थोड़े उलझाते हैं। बाद में सबकी कहानी समझ आने लगती है। मगर कहानी एक घर से दूसरे घर इतनी जल्दी जाती है कि किसी एक रिश्ते से गहराई से जुड़ाव नहीं बन पाता।
अभिनय: नीना-देवेन की नोकझोंक में सबसे ज्यादा दम
नीना गुप्ता और देवेन भोजानी इस पूरी कॉलोनी में सबसे ज्यादा मजा देते हैं। रजनी की झुंझलाहट नीना चेहरे से ही पकड़ लेती हैं। देवेन का भुलक्कड़ कुकू उनके सामने कॉमेडी का अच्छा साथी बनता है। दोनों की नोकझोंक सीरीज के बेहतर हिस्सों में है।
सुमित व्यास और मानसी पारेख ने आदित्य-प्रियंका की ऊपर से शांत दिखने वाली शादी में छिपी खटास को हावभाव से पकड़ा है। दोनों के बीच की खामोशी भी कई बार बहुत कुछ कहती है।
अर्जुन बिजलानी और हेली शाह के बीच हल्की-फुल्की केमिस्ट्री है। दोनों के किरदारों की थोड़ी फिल्मी मासूमियत उनके साथ वाले सीन में दिखती है।
सुमित राघवन का महिला गेटअप शुरुआत में ही ध्यान खींचता है। उनकी चाल, आवाज और हावभाव से कॉमेडी निकलती है। संदीपा धर भी उनके साथ अच्छी टाइमिंग रखती हैं।
देलनाज ईरानी, अनंत जोशी और अमायरा दस्तूर की तिकड़ी पारसी परिवार के हिस्से में कई मजेदार सीन देती है।
निर्देशन: हंसी थोड़ी आती है, पर सीन कुछ ज्यादा देर चलते हैं
आतिश कपाड़िया ने कॉलोनी को रोजमर्रा की जिंदगी जैसा रखा है। घर, गलियां और पड़ोसियों का एक-दूसरे के घर आना-जाना सब जाना-पहचाना लगता है।
सीरीज की असली दिक्कत सीन की रफ्तार में है। कई बार मजाक निकल चुका होता है, फिर भी सीन चलता रहता है। कुछ जगह कलाकारों के हावभाव ही उस हिस्से को संभालते हैं। सीन थोड़े छोटे और तेज होते तो कॉमेडी ज्यादा अच्छी लगती।
पटकथा और लेखन: पांच कहानियों के बीच कॉमेडी कहीं-कहीं पीछे छूट जाती है
मजाक पहले ही समझ आ जाता है: कई चुटकुले नए नहीं लगते। सीन शुरू होते ही अंदाजा हो जाता है कि अब पंच आने वाला है। ऐसे में हंसी अचानक नहीं आती।
कॉमेडी के नाम पर बढ़ता शोर: पांच परिवारों को साथ लेकर चलने की कोशिश में कई बार एक ही सीन में बहुत सारे किरदार आ जाते हैं। सब अपनी-अपनी बात कहने लगते हैं। इसी शोर में कई बार असली मजाक दब जाता है।
एक सीन में चार लड़कियां बॉलीवुड कॉस्ट्यूम पार्टी में पहुंचती हैं। वहां एंटी-नारकोटिक्स इंस्पेक्टर उन्हें ड्रग डीलर समझ लेता है और मामला गिरफ्तारी तक पहुंच जाता है। बाद में पुलिस स्टेशन में उनके पति पहुंचते हैं। सीन में इतने मोड़ और किरदार जोड़ दिए जाते हैं कि हंसी के बजाय पूरा मामला थकाने लगता है। लगता है, कॉमेडी बढ़ाने के लिए बस शोर बढ़ाया गया है।
किरदार अजीब हैं, मजाक नहीं: कई किरदारों की आदतें और उनका हुलिया अलग है। मगर हर अजीब हरकत मजेदार नहीं बनती। कई जगह सीरीज किरदार की खासियत पर ही हंसी निकालने की जबरदस्ती कोशिश करती है।
एक ही अंदाज को बार-बार दोहराना: जेडी मजेठिया के पुराने शोज में हंसा-प्रफुल्ल जैसे किरदारों की खासियत ही कॉमेडी बन जाती थी। ‘चुम्बक’ में भी कुछ किरदारों की खास आदतों और अंदाज को हंसी का जरिया बनाया गया है। फर्क इतना है कि यहां वही बात बार-बार दोहराने से हंसी कम और दोहराव ज्यादा महसूस होता है।
देखें या नहीं?
‘चुम्बक’ में कुछ किरदार और कुछ सीन जरूर याद रह जाते हैं, मगर पूरी सीरीज का असर उतना नहीं रहता। कॉमेडी पसंद करने वालों के लिए भी इसमें ऐसा बहुत कुछ नहीं है, जो इसे बाकी पड़ोस वाली कॉमेडी से अलग खड़ा करे।
अगर देखने के लिए आपके पास और विकल्प हैं, तो ‘चुम्बक’ को स्किप कर सकते हैं।